प्रतीकात्मक तस्वीर 
खनन

राजस्थान: डीडवाना में अवैध खनन पर एनजीटी सख्त, जांच समिति गठित, छह सप्ताह में मांगी रिपोर्ट

एनजीटी के आदेश पर गठित समिति अब यह जांच करेगी कि चरागाह के लिए संरक्षित जमीन पर अवैध खनन से पर्यावरण, ग्रामीणों के स्वास्थ्य और घरों को कितना नुकसान हुआ है।

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने राजस्थान के दो अहम पर्यावरणीय मामलों में सख्ती दिखाते हुए साफ संकेत दिया है कि पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी अब बिना जवाबदेही के नहीं चलेगी। डीडवाना के कोलिया गांव में चरागाह के लिए सुरक्षित जमीन पर कथित अवैध खनन को लेकर ट्रिब्यूनल ने संयुक्त जांच समिति गठित कर छह सप्ताह में रिपोर्ट मांगी है।

  • समिति यह जांच करेगी कि खनन से पर्यावरण, ग्रामीणों के स्वास्थ्य और आसपास के मकानों को कितना नुकसान पहुंचा है। शिकायत में धूल प्रदूषण, बिना मंजूरी खुदाई और विस्फोट से घरों में दरार आने जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं।

  • वहीं जयपुर के टेक्सटाइल प्रिंटिंग उद्योगों से जुड़े प्रदूषण मामले में भी एनजीटी ने राज्य सरकार से विस्तृत स्थिति रिपोर्ट मांगी है।

  • सरकार ने दावा किया है कि कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट चालू है और 907 इकाइयों को इससे जोड़ा जा चुका है, लेकिन ट्रिब्यूनल ने इस मामले की सुप्रीम कोर्ट में लंबित सुनवाई की ताजा स्थिति रिकॉर्ड पर पेश करने को कहा है।

  • इन दोनों आदेशों से स्पष्ट है कि एनजीटी अब राजस्थान में संरक्षित भूमि पर अवैध गतिविधियों और औद्योगिक प्रदूषण पर निगरानी तेज कर रहा है। एक ओर गांव की गोचर भूमि और लोगों की सुरक्षा का सवाल है, तो दूसरी ओर शहरी औद्योगिक विकास के बीच पर्यावरणीय जवाबदेही की परीक्षा।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की केंद्रीय पीठ ने राजस्थान में डीडवाना के कोलिया गांव में हो रहे कथित अवैध खनन पर कड़ा रुख अपनाया है। 13 मई, 2026 को हुई सुनवाई में ट्रिब्यूनल ने एक दो-सदस्यीय संयुक्त समिति गठित कर छह सप्ताह के भीतर तथ्यात्मक रिपोर्ट और क्या कुछ कार्रवाई हुई है उसका ब्यौरा पेश करने का निर्देश दिया है।

समिति को मौके पर जाकर जांच करनी होगी कि गांव में चरागाह के लिए संरक्षित भूमि पर किस तरह खनन किया जा रहा है। राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को इस जांच के लिए नोडल एजेंसी बनाया गया है, जो समन्वय और जरूरी सहयोग सुनिश्चित करेगा।

अवैध खनन और धूल के गुबार से ग्रामीण बेहाल

गौरतलब है कि यह मामला स्थानीय निवासी मेघाराम द्वारा दायर याचिका के बाद सामने आया है। उनका आरोप है कि गांव की गोचर (चरागाह) भूमि पर बिना पर्यावरणीय मंजूरी, प्रशासनिक अनुमति और प्रदूषण नियंत्रण उपायों के धड़ल्ले से खुदाई की जा रही है।

इससे जमीन बंजर हो रही है, साथ ही आसपास के क्षेत्र में धूल का गुबार फैल रहा है। इस उड़ती धूल और प्रदूषण से स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य व पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ रहा है।

साक्ष्यों ने खोली पोल

एनजीटी के समक्ष प्रस्तुत किए गए सबूतों में 16 नवंबर और 22 दिसंबर, 2025 की 'जीपीएस मैप कैमरा' तस्वीरें शामिल हैं, जो स्पष्ट रूप से निरंतर हो रही खुदाई और धूल रोकने के उपायों (जैसे पानी का छिड़काव) के अभाव को दर्शाती हैं।

इसके अलावा, राजस्व रिकॉर्ड और एनआईसी 'भू-नक्शा' भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह जमीन कानूनी रूप से 'गोचर भूमि' के रूप में सुरक्षित है। ऐसे में यहां खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है।

मामला केवल पर्यावरणीय नुकसान तक सीमित नहीं है। शिकायत में यह गंभीर आरोप भी लगाया गया है कि रिहायशी इलाके के पास भारी विस्फोट और खुदाई की जा रही है, जिससे तेज कंपन पैदा हो रही है।

इसकी वजह से मेघाराम के घर की दीवारों में गहरी दरारें आ गई हैं, जिससे मकान अब रहने लायक नहीं बचा है। ऐसे में अब एनजीटी की जांच यह तय करेगी कि संरक्षित जमीन पर हो रही यह गतिविधि कितनी व्यापक है और जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई होगी।

जयपुर के टेक्सटाइल उद्योगों पर पर्यावरणीय जांच तेज, एनजीटी ने सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले की मांगी जानकारी

राजस्थान की राजधानी जयपुर में टेक्सटाइल छपाई उद्योगों द्वारा फैलाए जा रहे प्रदूषण के मामले में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की केंद्रीय पीठ ने कड़ा रुख अपनाया है। 12 मई 2026 को हुई सुनवाई के दौरान पर्यावरण नियमों के उल्लंघन को लेकर राज्य सरकार से जवाब-तलब किया गया।

यह मामला लंबे समय से क्षेत्र में औद्योगिक प्रदूषण और अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर उठ रही चिंताओं से जुड़ा है।

सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार की ओर से पेश वकील ने ट्रिब्यूनल को बताया कि पिछले आदेशों का पालन करते हुए क्षेत्र में कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) अब पूरी क्षमता से काम कर रहा है। यह भी बताया गया कि अब तक करीब 907 औद्योगिक इकाइयों को इस ट्रीटमेंट प्लांट से जोड़ दिया गया है, ताकि फैक्ट्रियों से निकलने वाले जहरीला पानी का उपचार किया जा सके।

राज्य सरकार ने यह भी जानकारी दी कि यह मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। इस पर एनजीटी ने निर्देश दिया कि सुप्रीम कोर्ट में चल रही इस कार्यवाही की वर्तमान स्थिति और वहां से आए नवीनतम आदेशों का पूरा विवरण रिकॉर्ड पर पेश किया जाए।

अब मामले की अगली सुनवाई में यह स्पष्ट हो सकेगा कि सीईटीपी के संचालन और उद्योगों की कनेक्टिविटी के बाद प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में वास्तविकता में कितना सुधार हुआ है। जयपुर के इस औद्योगिक क्षेत्र में प्रदूषण को लेकर पहले भी स्थानीय लोगों और पर्यावरण संगठनों ने गंभीर चिंताएं जताई हैं।