कालाजार को हिंदी में ‘काला बुखार’ भी कहा जाता है। यह बीमारी संक्रमित सैंडफ्लाई (बालू मक्खी) के काटने से फैलती है।  फोटो साभार: आईस्टॉक
स्वास्थ्य

डब्ल्यूएचओ ने कालाजार के इलाज के लिए जारी की नई गाइडलाइन, मरीजों को मिलेगा आसान व सुरक्षित उपचार

डब्ल्यूएचओ की नई गाइडलाइन से कालाजार मरीजों को मिलेगा आसान, सुरक्षित और कम समय वाला इलाज; अफ्रीका और एशिया में बीमारी नियंत्रण की कोशिशों को मिलेगी नई रफ्तार।

Dayanidhi

  • कालाजार की बीमारी दुनिया के करीब 80 देशों में पाई जाती है। हर साल 50 से 90 हजार लोग इससे प्रभावित होते हैं।

  • पूर्वी अफ्रीका में अब एसएसजी मुक्त इलाज को बढ़ावा मिलेगा, जिससे मरीजों को कम इंजेक्शन और कम दुष्प्रभावों से राहत मिलेगी।

  • नई उपचार पद्धतियों से पीकेएलडी मरीजों को फायदा होगा, जिससे लंबी दवा प्रक्रिया घटेगी और बेहतर स्वास्थ्य परिणाम मिल सकेंगे।

  • कालाजार के खिलाफ वैश्विक अभियान को मजबूती मिली, डब्ल्यूएचओ के नए दिशा-निर्देश बीमारी उन्मूलन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।

  • मिल्टेफोसिन और अन्य आधुनिक दवाओं के इस्तेमाल से अफ्रीका तथा दक्षिण-पूर्व एशिया में मरीजों को बेहतर इलाज उपलब्ध होगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कालाजार यानी विसरल लीशमैनियासिस और पोस्ट-काला-आजारा डर्मल लीशमैनियासिस (पीकेएलडी) के इलाज को लेकर नई गाइडलाइन जारी जारी की है। इन नए दिशा-निर्देशों में मरीजों के लिए पहले से अधिक सुरक्षित, कम समय वाला और आसान इलाज सुझाया गया है। खासतौर पर पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में रहने वाले मरीजों को इसका बड़ा फायदा मिलेगा।

डब्ल्यूएचओ का कहना है कि लंबे समय से कालाजार से पीड़ित मरीजों को ऐसे इलाज से गुजरना पड़ता था, जो बीमारी के साथ-साथ खुद भी काफी कठिन और तकलीफ देने वाला था। नई गाइडलाइन का उद्देश्य इलाज को सरल बनाना और बीमारी को खत्म करने की दिशा में तेजी लाना है।

कालाजार एक गंभीर लेकिन इलाज योग्य बीमारी

कालाजार को हिंदी में ‘काला बुखार’ भी कहा जाता है। यह बीमारी संक्रमित सैंडफ्लाई (बालू मक्खी) के काटने से फैलती है। यह दुनिया की सबसे खतरनाक परजीवी बीमारियों में से एक है। मलेरिया के बाद यह सबसे ज्यादा जान लेने वाली परजीवी बीमारियों में शामिल है।

कालाजार होने पर मरीज को तेज बुखार, वजन कम होना, खून की कमी, शरीर में कमजोरी और तिल्ली व लीवर के बढ़ने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। समय पर इलाज न मिलने पर यह बीमारी जानलेवा भी साबित हो सकती है। यह बीमारी दुनिया के करीब 80 देशों में पाई जाती है। हर साल लगभग 50 हजार से 90 हजार लोग इससे प्रभावित होते हैं, हालांकि कई मामले स्वास्थ्य संस्थाओं तक पहुंच नहीं पाते।

पीकेएलडी से जुड़ी सामाजिक परेशानी

कालाजार के इलाज के बाद कुछ मरीजों में पोस्ट-काला-आजारा डर्मल लीशमैनियासिस (पीकेएलडी) नाम की त्वचा संबंधी समस्या हो सकती है। इसमें त्वचा पर दाने या निशान दिखाई देते हैं।

पीकेएलडी जानलेवा नहीं होती, लेकिन यह संक्रमण फैलाने का एक स्रोत बन सकती है। इसके अलावा त्वचा पर दिखने वाले बदलावों के कारण कई मरीजों को समाज में भेदभाव, अकेलापन और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है।

पुराने इलाज की जगह अब नए विकल्प

पहले खासतौर पर अफ्रीका में कालाजार के इलाज के लिए सोडियम स्टिबोग्लुकोनेट (एसएसजी) नाम की दवा का इस्तेमाल किया जाता था। इस दवा के लिए कई दिनों तक रोजाना इंजेक्शन लगवाने पड़ते थे और इसके गंभीर दुष्प्रभाव भी हो सकते थे।

नई डब्ल्यूएचओ गाइडलाइन में पहली बार उन मरीजों के लिए एसएसजी से मुक्त इलाज की सिफारिश की गई है, जो नए उपचार विकल्पों के लिए योग्य हैं। पूर्वी अफ्रीका में अब मिल्टेफोसिन नाम की मुंह से ली जाने वाली दवा को पैरामोमाइसिन इंजेक्शन के साथ इस्तेमाल करने की सलाह दी गई है।

नया इलाज पहले की तुलना में कम समय में पूरा होगा। पूर्वी अफ्रीका में कालाजार का नया उपचार करीब 14 दिनों में पूरा किया जा सकेगा और इसमें पुराने इलाज की तुलना में कम इंजेक्शन और कम विषाक्त प्रभाव होंगे।

पीकेएलडी मरीजों के लिए भी राहत

नई गाइडलाइन में पीकेएलडी मरीजों के लिए भी छोटे और सुरक्षित इलाज की सलाह दी गई है। दक्षिण-पूर्व एशिया में लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन बी और मिल्टेफोसिन जैसी दवाओं के इस्तेमाल को शामिल किया गया है। पहले पीकेएलडी का इलाज कई हफ्तों तक चलता था, जिससे मरीजों को लंबे समय तक अस्पताल और दवाओं की परेशानी झेलनी पड़ती थी। नए उपचार से मरीजों को कम समय में बेहतर सुविधा मिलने की उम्मीद है।

बीमारी खत्म करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

डब्ल्यूएचओ के विशेषज्ञों का मानना है कि नई दवाओं और बेहतर इलाज के तरीकों से कालाजार को खत्म करने के अभियान को मजबूती मिलेगी। इन नए उपचारों से बड़ी संख्या में मरीजों को लाभ मिलने की उम्मीद है।

इन उपचारों के विकास में ड्रग्स फॉर नेग्लेक्टेड डिजीजेज इनिशिएटिव (डीएनडीआई) और कई अन्य संस्थाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब प्रभावित देशों से उम्मीद की जा रही है कि वे अपनी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियों में इन नई सिफारिशों को शामिल करेंगे।

नई गाइडलाइन कालाजार से लड़ाई में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। इससे मरीजों को कम तकलीफ वाला इलाज मिलेगा और दुनिया को इस गंभीर बीमारी के उन्मूलन के लक्ष्य के करीब पहुंचने में मदद मिलेगी।