खाना तैयार करने के लिए चावल को भूसी से अलग करती मध्य प्रदेश के मंडला जिले की एक गोंड महिला; फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) 
स्वास्थ्य

भारत में शहरीकरण से बदल रही आंत की दुनिया, मिजो से गोंड तक हर समुदाय की अपनी अलग जैविक पहचान

भारत के विविध समुदायों पर किए अध्ययन से पता चला है कि गांवों से शहरों की ओर बढ़ते कदम जीवनशैली के साथ-साथ शरीर में सूक्ष्मजीवों की दुनिया भी बदल रहे हैं, लेकिन पारम्परिक भोजन और संस्कृति अब समुदाय की अलग जैविक पहचान को बनाए हुए हैं

Lalit Maurya

  • भारत के विभिन्न समुदायों पर हुए एक बड़े अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में सामने आया है कि तेजी से बढ़ता शहरीकरण केवल हमारी जीवनशैली ही नहीं, बल्कि आंत (गट) में रहने वाले अरबों सूक्ष्मजीवों की दुनिया को भी बदल रहा है।

  • 'गट माइक्रोब्स' जर्नल में प्रकाशित इस स्टडी में हिमालय के स्पीति, मध्य भारत के गोंड, कोलम और कोया, दक्षिण भारत के काणी तथा पूर्वोत्तर के मिजो और पोचुरी नागा सहित भारत के विविध समुदायों का अध्ययन किया गया।

  • वैज्ञानिकों ने पाया कि शहरीकरण का असर सभी पर समान नहीं पड़ता। किसी समुदाय का पारंपरिक भोजन, संस्कृति और स्थानीय पर्यावरण उसकी अलग जैविक पहचान को आज भी मजबूत बनाए हुए हैं।

  • अध्ययन में यह भी सामने आया कि दही-छाछ जैसे पारंपरिक डेयरी उत्पाद और पोचुरी समुदाय का किण्वित सोयाबीन व्यंजन 'अखुनी' आंत के लाभकारी बैक्टीरिया को बढ़ावा देते हैं।

  • वहीं शहरी जीवनशैली के साथ आंत में सूक्ष्मजीवों की विविधता घट रही है और ऐसे बैक्टीरिया बढ़ रहे हैं, जिनका संबंध मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग जैसी बीमारियों से है।

  • वैज्ञानिकों का मानना है कि चिकित्सा विज्ञान हमारी सेहत को पश्चिमी देशों के चश्मे से देखता आया है, जबकि हमारी थाली, हमारी आबो-हवा और हमारी जीवनशैली दुनिया से बिल्कुल जुदा है। ऐसे में भविष्य की स्वास्थ्य तकनीकों और उपचारों को भारत की जैविक, सांस्कृतिक और खाद्य विविधता को आधार बनाकर विकसित करना होगा।

क्या शहरों में रहने से सिर्फ हमारी जीवनशैली बदल रही है, या हमारे शरीर के भीतर रहने वाले अरबों सूक्ष्मजीव भी बदल रहे हैं? भारत के स्पीति लोगों से लेकर गोंड, कोलम, कोया, काणी, मिजो और पोचुरी नागा तक विभिन्न स्थानीय समुदायों पर हुए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन ने इस सवाल का बेहद दिलचस्प जवाब दिया है।

अध्ययन के मुताबिक भारत तेजी से शहरीकरण की राह पर है। इसके साथ ही गांवों और पारंपरिक जीवनशैली से शहरों की ओर बढ़ते कदम केवल रहन-सहन का तौर-तरीका ही नहीं बदल रहे, बल्कि हमारे खानपान, पर्यावरण और यहां तक की शरीर के भीतर मौजूद अरबों सूक्ष्मजीवों (गट माइक्रोबायोम) की दुनिया को भी नया आकार दे रहे हैं।

बदलती जीवनशैली का जैविक सच

गौरतलब है कि यह सूक्ष्मजीव हमारे पाचन, इम्युनिटी और स्वास्थ्य के लिए बेहद मायने रखते हैं। हालांकि, साथ ही वैज्ञानिकों ने यह भी खुलासा किया है कि यह बदलाव पूरे देश में एक जैसा नहीं। हर समुदाय अपनी संस्कृति, भोजन और भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार अपनी अलग जैविक और सांस्कृतिक पहचान बनाए हुए है।

गौरतलब है कि भारत दुनिया के सबसे विविध खानपान और तेजी से शहरों की ओर रुख करने वाले देशों में से एक है। यहां अक्सर चिकित्सा क्षेत्र में किए शोध बड़े शहरों तक सीमित रह जाते हैं, लेकिन इस अध्ययन ने भारत के दूरदराज और पारंपरिक समुदायों की जड़ों तक पहुंच बनाई है।

इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने हिमालय की ठंडी वादियों में रहने वाले स्पीति लोगों से लेकर मध्य भारत के गोंड, कोलम और कोया (कोइतुर) समुदाय, दक्षिण के काणी के साथ-साथ पूर्वोत्तर के मिजो और पोचुरी नागा तक हर जीवनशैली का गहराई से अध्ययन किया है। साथ ही इनकी तुलना श्रीलंका के आदिवासी और शहरी समुदायों से भी की गई है।

स्पीति से लेकर कोलम तक, क्यों हर समुदाय का अलग है 'गट माइक्रोबायोम'

वैज्ञानिकों ने इन विविध भारतीय जीवनशैलियों का अध्ययन कर यह समझने का प्रयास किया है कि जब कोई समुदाय अपनी पारंपरिक जीवनशैली को छोड़कर शहरी परिवेश में ढलता है, तो इससे उसके स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है।

शोधकर्ताओं के मुताबिक इस शोध की असली खूबसूरती उसका जमीन से जुड़ाव है। अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने न केवल दूर-दराज के भारतीय समुदायों के बीच जाकर आंकड़े जुटाए हैं, बल्कि साथ ही अपनी खोज के नतीजों को उन्हीं की भाषा में उनके साथ साझा भी किया है।

अध्ययन में पाया गया कि शहर जाने पर हर किसी का पेट या गट माइक्रोबायोम एक जैसा प्रतिक्रिया नहीं देते। आपकी जड़ें, परंपराएं और आपका पारंपरिक भोजन यह तय करता है कि आपका माइक्रोबायोम कैसा रहेगा। यही वजह है कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में शहरीकरण के साथ गट माइक्रोबायोम में होने वाले बदलाव भी अलग-अलग दिखाई दिए।

यह अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो, बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (लखनऊ), केलानिया विश्वविद्यालय सहित देश-दुनिया के कई प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है, जिसके नतीजे अंतराष्ट्रीय जर्नल 'गट माइक्रोब्स' में प्रकाशित हुए हैं।

'अखुनी' से लेकर 'दही-छाछ' तक, पारंपरिक खानपान का कमाल

रिसर्च के नतीजे दर्शाते हैं कि हमारे पारंपरिक खानपान और बदलती जीवनशैली का गहरा असर हमारी आंतों की सेहत पर साफ दिखाई देता है।

उदाहरण के लिए, नागालैंड के पोचुरी समुदाय द्वारा सोयाबीन को फर्मेंट करके बनाए जाने वाले पारंपरिक व्यंजन ‘अखुनी’ के सेवन से उनके पेट में ‘बैसिलस’ नाम के विशेष मित्र बैक्टीरिया बहुतायत में पाए गए।

इसी तरह, उत्तर और मध्य भारत के जिन क्षेत्रों में गेहूं, दूध, दही और छाछ उत्पादों का पारंपरिक उपयोग अधिक है, वहां आंतों को मजबूती देने वाले बिफिडोबैक्टीरियम (एक तरह का प्रोबायोटिक) की मौजूदगी काफी समृद्ध मिली।

शहरी परिवेश में घट रही सूक्ष्मजीवों की प्राकृतिक विविधता

हालांकि चिंता की बात है कि जैसे-जैसे लोग ग्रामीण परिवेश को छोड़कर शहरों की ओर शिफ्ट हो रहे हैं, उनके आंतों के सूक्ष्मजीवों की यह प्राकृतिक विविधता धीरे-धीरे घटती जा रही है।

बैगा जनजाति; फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई)

रिसर्च से पता चला है कि शहरी जीवनशैली के कारण अब पेट में 'मेगामोनास' जैसे बैक्टीरिया बढ़ने लगे हैं, जिनका सीधा संबंध मोटापे और पाचन संबंधी बदलावों से है। इसकी वजह से मधुमेह और दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। ऐसे में वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत में तेजी से बढ़ रहे मधुमेह, मोटापा और हृदय रोगों को समझने में यह जानकारी भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

आज जब भारत तेजी से बदल रहा है, तो डायबिटीज, मोटापा और दिल की बीमारियों जैसी चुनौतियां भी हमारे दरवाजे पर आकर खड़ी हो गई हैं।

पहचानें, पुरखों की थाली में छिपा है सेहत का खजाना

अब तक चिकित्सा विज्ञान हमारी सेहत को पश्चिमी देशों के चश्मे से देखता आया है, जबकि हमारी थाली, हमारी आबो-हवा और हमारी जीवनशैली दुनिया से बिल्कुल जुदा है। ऐसे समय में यह समझना बेहद जरूरी हो जाता है कि बदलती दिनचर्या हमारे पेट के उस अनदेखे 'संसार' (गट माइक्रोबायोम) को कैसे प्रभावित कर रही है।

वैज्ञानिकों का भी मानना है कि भविष्य की स्वास्थ्य तकनीकें और इलाज तभी वाकई असरदार होंगे, जब वे किसी विदेशी आंकड़े पर नहीं, बल्कि भारत की इसी अनूठी विविधता और हमारी अपनी जीवनशैली की जरूरतों पर आधारित हों।

देखा जाए तो यह रिसर्च सिर्फ एक वैज्ञानिक अध्ययन भर नहीं है, यह एक आईना है जो हमें याद दिलाता है कि हमारे पूर्वजों की पारंपरिक भोजन शैली में सेहत का कितना बड़ा खजाना छुपा है, जिसे सहेजना आज हमारे लिए कितना जरुरी है।