स्वास्थ्य

बढ़ती उम्र में दिमाग पर भारी पड़ रहे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स, याददाश्त पर भी मंडरा रहा खतरा

वैज्ञानिकों को नए अध्ययन में अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड और डिमेंशिया, अवसाद, मस्तिष्क के सिकुड़ने व याददाश्त में गिरावट के बीच संबंध मिले हैं

Lalit Maurya

  • पैकेट बंद स्नैक्स, मीठे पेय, इंस्टेंट नूडल्स और तैयार भोजन भले ही हमारी व्यस्त जिंदगी को आसान बनाते हों, लेकिन बढ़ती उम्र में इनका असर दिमाग पर पड़ सकता है।

  • एनुअल रिव्यू ऑफ न्यूट्रिशन में प्रकाशित एक व्यापक समीक्षा में अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड के अधिक सेवन और डिमेंशिया, अवसाद, मस्तिष्क के आकार में कमी तथा सोचने-समझने की क्षमता में गिरावट के बीच संबंध के संकेत मिले हैं।

  • ब्राजील, इजराइल और ब्रिटेन समेत कई देशों में हुए अध्ययनों में अल्ट्राप्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की अधिक खपत के साथ संज्ञानात्मक क्षमता में तेज गिरावट और डिमेंशिया के अधिक जोखिम का संबंध सामने आया।

  • मस्तिष्क की इमेजिंग से जुड़े कुछ अध्ययनों में भी छोटे मस्तिष्क आकार और व्हाइट मैटर को नुकसान के संकेत मिले हैं। वहीं जानवरों पर हुए प्रयोगों ने आंतों के बैक्टीरिया और ब्लड-ब्रेन बैरियर में बदलाव जैसी संभावित वजहों की ओर इशारा किया है।

  • हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि ये निष्कर्ष सिर्फ संबंध दिखाते हैं, कारण साबित नहीं करते। यह भी अभी स्पष्ट नहीं है कि संभावित नुकसान प्रोसेसिंग से होता है या अधिक चीनी, नमक और वसा से। इसलिए विशेषज्ञ लंबे और बेहतर नियंत्रित अध्ययनों की जरूरत पर जोर दे रहे हैं।

  • तब तक ताजे और कम प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों को भोजन में अधिक जगह देना समझदारी भरा कदम हो सकता है।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में पैकेट बंद स्नैक्स, मीठे पेय, इंस्टेंट नूडल्स, फ्रोजन फूड और पहले से तैयार पैकेट बंद खाद्य पदार्थ तेजी से हमारी थाली का हिस्सा बनते जा रहे हैं। इन्हें खाना आसान है, स्वाद भी अच्छा लगता है और समय भी बचता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सुविधा उम्र बढ़ने के साथ हमारे दिमाग पर भारी पड़ सकती है?

प्रतिष्ठित जर्नल एनुअल रिव्यू ऑफ न्यूट्रिशन में प्रकाशित अध्ययन ने इस सवाल को लेकर चिंता बढ़ा दी हैं। वैज्ञानिकों को अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड और अवसाद, डिमेंशिया, मस्तिष्क के आकार में कमी और सोचने-समझने की क्षमता में गिरावट के बीच संबंध के संकेत मिले हैं।

हालांकि शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया है कि अभी तक उपलब्ध प्रमाण यह साबित नहीं करते कि अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड सीधे तौर पर दिमाग को नुकसान पहुंचाता है।

लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी में पेनिंगटन बायोमेडिकल रिसर्च सेंटर से जुड़े वैज्ञानिक ओवेन कारमाइकल के नेतृत्व में 26 अन्य शोधकर्ताओं ने दुनिया भर में हुए अध्ययनों की समीक्षा की है। इस टीम में अमेरिका, यूरोप, एशिया, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिक शामिल थे।

विश्लेषण में शोधकर्ताओं ने इंसानों पर हुए अध्ययनों, मस्तिष्क की स्कैनिंग और जानवरों पर किए गए प्रयोगों के नतीजों को एक साथ रखकर यह समझने की कोशिश है की कि इस विषय में अब तक विज्ञान क्या जानता है और किन सवालों के जवाब अभी बाकी हैं।

क्या होता है अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड?

विशेषज्ञों के मुताबिक हर पैकेटबंद या प्रसंस्कृत भोजन अल्ट्राप्रोसेस्ड नहीं होता। ये वे खाद्य पदार्थ होते हैं जिन्हें औद्योगिक स्तर पर कई प्रक्रियाओं से तैयार किया जाता है और जिनमें अक्सर रिफाइंड सामग्री, अतिरिक्त चीनी, वसा और नमक के साथ-साथ रंग, कृत्रिम मिठास, इमल्सीफायर और प्रिजर्वेटिव जैसे पदार्थ मिलाए जाते हैं।

इस प्रक्रिया में भोजन के प्राकृतिक फाइबर, विटामिन और पौधों से मिलने वाले कई उपयोगी तत्व कम हो सकते हैं। ऐसे खाद्य पदार्थों में चीनी युक्त सॉफ्ट ड्रिंक, पैकेज्ड स्नैक्स, इंस्टेंट और तैयार भोजन, प्रोसेस्ड मीट तथा कई तरह के पैक किए गए खाद्य उत्पाद शामिल हो सकते हैं।

रिसर्च दर्शाती है कि अल्ट्राप्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की खपत दुनिया के अलग-अलग देशों में काफी अलग है। ऑस्ट्रेलिया में लोगों की रोजाना कैलोरी का करीब 42 फीसदी हिस्सा इन खाद्य पदार्थों से आता है, जबकि ब्राजील में यह करीब 21.5 फीसदी है।

वहीं अमेरिका में स्थिति और ज्यादा गंभीर है। वहां रोजाना मिलने वाली कुल कैलोरी में करीब 55 से 58 फीसदी हिस्सा अल्ट्राप्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का होता है। इसी तरह भारत में भी इन खाद्य पदार्थों का चलन तेजी से बढ़ रहा है।

यानी कई लोगों के लिए पैकेट और डिब्बा बंद भोजन अब कभी-कभार खाई जाने वाली चीज नहीं, बल्कि रोजमर्रा की डाइट का बड़ा हिस्सा बन चुका है।

डिमेंशिया और याददाश्त को लेकर क्या कुछ आया सामने?

शोधकर्ताओं ने इंसानों पर हुए कई अध्ययनों का विश्लेषण किया है। इनमें सबसे ज्यादा शोध अवसाद और चिंता पर हुए थे। हालांकि सोचने और याददाश्त से जुड़े अध्ययनों की संख्या अभी कम है।

उदाहरण के लिए ब्राजील में 10,775 वयस्कों पर हुए एक अध्ययन में लोगों का करीब आठ साल तक अनुसरण किया गया। जिन लोगों की रोजाना कैलोरी में अल्ट्राप्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी 19.9 फीसदी से ज्यादा थी, उनमें योजना बनाने और सामान्य सोचने-समझने की क्षमता में अपेक्षाकृत तेज गिरावट देखी गई।

हालांकि यह संबंध उन लोगों में स्पष्ट नहीं था जो 'माइंड' डाइट का पालन कर रहे थे। यह डाइट मुख्य रूप से पौधों से मिलने वाले खाद्य पदार्थों पर आधारित होती है और मस्तिष्क को स्वास्थ्य रखने के लिए सुझाई जाती है।

इसी तरह इजराइल में टाइप-2 डायबिटीज वाले 568 बुजुर्गों पर हुए एक अध्ययन में भी अल्ट्राप्रोसेस्ड मीट, तेल और स्प्रेड जैसे खाद्य पदार्थों की अधिक खपत और सोचने-समझने की क्षमता में तेज गिरावट के बीच संबंध पाया गया।

प्रोसेस्ड मीट पर भी उठे सवाल

डिमेंशिया के मामले में ब्रिटेन के यूके बायोबैंक के आंकड़े खासे महत्वपूर्ण हैं। इसमें करीब पांच लाख लोगों के स्वास्थ्य संबंधी आंकड़े शामिल हैं। विश्लेषण में पाया गया कि रोजाना 25 ग्राम प्रोसेस्ड मीट अतिरिक्त खाने के साथ डिमेंशिया का जोखिम करीब 44 से 52 फीसदी अधिक होने का संबंध था।

एक अन्य विश्लेषण में अनुमान लगाया गया है कि अगर अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड से मिलने वाली कुल कैलोरी का 10 फीसदी हिस्सा कम करके उसकी जगह बिना या कम प्रसंस्कृत भोजन लिया जाए, तो डिमेंशिया के जोखिम में करीब 19 फीसदी की कमी आ सकती है। लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये संबंध हैं, कारण साबित नहीं करते।

जो लोग ज्यादा अल्ट्राप्रोसेस्ड भोजन खाते हैं, उनकी पूरी डाइट, शारीरिक गतिविधि, वजन, सामाजिक परिस्थितियां और स्वास्थ्य व्यवहार भी अलग हो सकते हैं। इसलिए यह कहना अभी संभव नहीं है कि डिमेंशिया के लिए अकेले अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड ही जिम्मेदार है।

मस्तिष्क की स्कैनिंग में भी मिले चिंता के संकेत

शोधकर्ताओं ने 15 ऐसे अध्ययनों की भी समीक्षा की जिनमें मस्तिष्क की इमेजिंग की गई थी। इन सभी अध्ययनों में ऐसे वयस्क शामिल थे जिन्हें डिमेंशिया नहीं था। कई अध्ययनों में सॉफ्ट ड्रिंक, प्रोसेस्ड मीट या अधिक वसा वाली डाइट का संबंध मस्तिष्क के छोटे आकार से पाया गया। उम्र बढ़ने के साथ मस्तिष्क के आकार में कमी देखी जा सकती है।

मीठे पेय पदार्थों का संबंध मस्तिष्क के व्हाइट मैटर को होने वाले अधिक नुकसान से भी पाया गया। गौरतलब है कि व्हाइट मैटर मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों के बीच संदेश पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

लेकिन सभी अध्ययन एक जैसे नतीजे नहीं देते। एक अध्ययन में अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड और मस्तिष्क के ऊतकों के सिकुड़ने के बीच कोई संबंध नहीं मिला। अल्जाइमर रोग से जुड़े एमिलॉयड प्रोटीन पर भी अभी बहुत सीमित शोध हुआ है। एक अध्ययन में अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड और एमिलॉयड के बीच कोई संबंध नहीं पाया गया। वहीं अल्जाइमर रोग से जुड़े दूसरे प्रमुख प्रोटीन टाऊ पर अभी तक मस्तिष्क के स्कैन पर आधारित कोई अध्ययन नहीं हुआ है।

जानवरों पर हुए प्रयोगों ने क्या बताया?

अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड दिमाग को किस तरह प्रभावित कर सकता है, इसका बड़ा हिस्सा अभी जानवरों पर हुए प्रयोगों से सामने आया है।

अल्जाइमर जैसी मस्तिष्कीय गड़बड़ियों के लिए चूहों पर हुए प्रयोगों में अधिक वसा, चीनी या नमक वाली डाइट से हिप्पोकैम्पस में एमिलॉयड की मात्रा बढ़ी। बता दें कि हिप्पोकैम्पस दिमाग का वह हिस्सा है जो सीखने और याददाश्त के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। कुछ प्रयोगों में महिलाओं में एमिलॉयड प्लाक का जमाव पुरुषों की तुलना में अधिक पाया गया।

कुछ अन्य जानवरों पर किए गए प्रयोगों में भोजन में इस्तेमाल होने वाले टाइटेनियम डाइऑक्साइड जैसे एडिटिव का संबंध सीखने और याददाश्त में कमी से जुड़ा पाया गया।

इसी तरह चूहों पर किए गए एक अन्य प्रयोग में जंक फूड जैसी डाइट से आंतों में मौजूद बैक्टीरिया की विविधता कम हुई। इसके साथ ब्लड-ब्रेन बैरियर के कमजोर होने के संकेत भी मिले। यह प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र खून में मौजूद चीजों को सीधे मस्तिष्क तक पहुंचने से नियंत्रित करता है। हालांकि वैज्ञानिक सावधान करते हैं कि जानवरों पर मिले नतीजों को सीधे इंसानों पर लागू नहीं किया जा सकता।

इंसानों और प्रयोगशाला में इस्तेमाल होने वाले जानवरों की शारीरिक संरचना और भोजन की परिस्थितियां पूरी तरह समान नहीं होतीं।

असली कारण पता करना इतना मुश्किल क्यों है?

सबसे मजबूत प्रमाण तभी मिलेगा जब वैज्ञानिक बड़ी संख्या में लोगों को लंबे समय तक अलग-अलग तरह की डाइट दें और फिर उनकी याददाश्त तथा सोचने-समझने की क्षमता में होने वाले बदलावों को मापें। लेकिन ऐसा अध्ययन करना बेहद मुश्किल है।

सोचने और याददाश्त की क्षमता में बदलाव वर्षों में दिखाई दे सकते हैं। इतने लंबे समय तक लोगों को नियंत्रित डाइट पर रखना महंगा और व्यावहारिक रूप से कठिन है। इसके अलावा आज अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड करीब-करीब हर जगह आसानी से उपलब्ध है।

कम अवधि के प्रयोगों में शोधकर्ता लोगों को कुछ समय तक पूरा भोजन उपलब्ध करा सकते हैं, लेकिन इतने कम समय में मस्तिष्क की कार्यक्षमता में बदलाव पकड़ना मुश्किल होता है। बार-बार एक ही तरह के मेमोरी टेस्ट देने से लोग अभ्यास के कारण भी बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।

लंबे समय के ज्यादातर अध्ययनों में लोगों से उनकी डाइट के बारे में सवाल पूछे जाते हैं। समस्या यह है कि इनमें से कई प्रश्नावली मूल रूप से अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड की खपत मापने के लिए बनाई ही नहीं गई थीं। इसलिए वैज्ञानिक अब ऐसे नए तरीके तलाश रहे हैं जिनमें कैमरे और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से लोगों के भोजन को दर्ज किया जा सके और यूरिन टेस्ट के जरिए शरीर में मौजूद खाद्य एडिटिव की मात्रा का पता लगाया जा सके।

क्या कम करना चाहिए अल्ट्राप्रोसेस्ड भोजन?

 शोधकर्ताओं का कहना है कि अभी यह दावा करना जल्दबाजी होगी कि अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड कम करने से निश्चित रूप से याददाश्त बचाई जा सकती है या डिमेंशिया का खतरा कम किया जा सकता है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि संभावित नुकसान भोजन को अल्ट्राप्रोसेस करने की प्रक्रिया से होता है या उसमें मौजूद अधिक चीनी, नमक और वसा जैसे घटकों से।

फिर भी विशेषज्ञों के मुताबिक लोगों को अपने भोजन में ताजे फल, सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, मेवे और अन्य कम प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों को अधिक जगह देना समझदारी भरा कदम हो सकता है।

शोधकर्ताओं ने व्यक्तिगत स्तर पर खासकर मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और हृदय रोग से जूझ रहे लोगों के लिए डाइटिशियन की सलाह, खान-पान सम्बन्धी परामर्श और भोजन पर नजर रखने वाले ऐप की मदद का सुझाव दिया है।

तंबाकू नियंत्रण से मिल सकता है सबक

शोधकर्ताओं ने अध्ययन में तंबाकू नियंत्रण का भी उदाहरण दिया है। कई देशों में टैक्स, विज्ञापन पर प्रतिबंध और सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान रोकने जैसे कदमों ने धूम्रपान की दर कम करने में मदद की है।

इसी तरह खाद्य पदार्थों के मामले में भी मीठे पेय पर टैक्स, पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी या पोषण संबंधी लेबल और स्कूलों के आसपास ऐसे खाद्य पदार्थों की बिक्री पर नियंत्रण जैसे उपायों पर विचार किया जा सकता है।

संकेतों को नजरअंदाज करना ठीक नहीं

इस समीक्षा का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि अल्ट्राप्रोसेस्ड फूड और उम्रदराज दिमाग के बीच संबंध के संकेत जरूर मिले हैं, लेकिन कारण और प्रभाव की अंतिम कड़ी अभी जुड़ना बाकी है।

वैज्ञानिकों को यह जानने के लिए लंबे और बेहतर तरीके से नियंत्रित अध्ययनों की जरूरत है कि वर्षों तक ऐसे भोजन का सेवन वास्तव में याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता और डिमेंशिया के जोखिम को कितना प्रभावित करता है। हालांकि तब तक शायद सबसे सुरक्षित रास्ता यही है कि सुविधा और स्वाद के लिए पैकेट बंद भोजन पर पूरी तरह निर्भर होने के बजाय हमारी थाली में ताजा, प्राकृतिक और कम प्रसंस्कृत भोजन की हिस्सेदारी बढ़े।

हमें समझना होगा कि स्वस्थ उम्र सिर्फ लंबे समय तक जीने का नाम नहीं है, याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता और अपने प्रियजनों को पहचानते रहने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।