भारत में स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाला खर्च तेजी से आम लोगों के लिए आर्थिक संकट का कारण बनता जा रहा है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के ताजा सर्वे पारिवारिक सामाजिक उपभोग सर्वेक्षण (स्वास्थ्य) में बताया गया है कि इलाज का खर्च केवल बीमारी की प्रकृति पर नहीं, बल्कि इस बात पर निर्भर करता है कि मरीज सरकारी अस्पताल में जाता है या निजी में। यही अंतर कई मामलों में 5 से 10 गुना तक पहुंच जाता है।
यह रिपोर्ट एनएसएस के 80वें राउंड (जनवरी–दिसंबर 2025) पर आधारित है।
अस्पताल में भर्ती इलाज के आंकड़े इस असमानता को सबसे स्पष्ट रूप से सामने रखते हैं। अस्पताल में भर्ती (इन-पेशेंट) इलाज की बात करें तो देश में एक ही बीमारी में भर्ती के मामले पर औसत खर्च करीब 37,858 रुपए है, जबकि जेब से सीधे होने वाला खर्च (ओओपी) लगभग 34,064 रुपए बैठता है।
सरकारी अस्पतालों में यही खर्च औसतन 6,631 रुपए है, जबकि निजी अस्पतालों में यह बढ़कर 50,508 रुपए तक पहुंच जाता है। यानी निजी अस्पतालों में इलाज सरकारी संस्थानों की तुलना में कई गुना महंगा है। कैंसर, हृदय रोग और किडनी फेल्योर जैसी गंभीर बीमारियों में यह अंतर और भी ज्यादा बढ़ जाता है—कई मामलों में खर्च 1 लाख रुपए से ऊपर तक पहुंच जाता है।
इसका अर्थ है कि निजी अस्पतालों में इलाज सरकारी अस्पतालों की तुलना में 5 से 8 गुना तक महंगा पड़ता है।
गंभीर बीमारियों के मामलों में यह अंतर और भी बढ़ जाता है। कैंसर, हृदय रोग, किडनी फेल्योर जैसी बीमारियों में निजी अस्पतालों का खर्च कई गुना अधिक होता है, जिससे इलाज आम परिवारों की पहुंच से बाहर होने लगता है।
यह धारणा गलत साबित होती है कि केवल बड़े इलाज ही महंगे होते हैं। सामान्य बीमारी के इलाज में भी बड़ा अंतर है। पिछले 15 दिनों में एक उपचार पर औसत खर्च 861 रुपए है, लेकिन सरकारी अस्पतालों में यह केवल 289 रुपए है। वहीं निजी अस्पतालों में यह खर्च 1,447 रुपए तक पहुंच जाता है।
इसका मतलब है कि छोटी बीमारी के इलाज में भी निजी क्षेत्र का खर्च 3 से 5 गुना तक अधिक है। सरकारी अस्पतालों में आधे मामलों में इलाज मुफ्त मिलता है, जबकि निजी क्षेत्र में लगभग हर सेवा के लिए भुगतान करना पड़ता है।
प्रसव के मामलों में खर्च का अंतर सबसे ज्यादा दिखाई देता है। सरकारी अस्पतालों में प्रसव पर औसत खर्च लगभग 2,299 रुपए है, जबकि सभी अस्पतालों को मिलाकर यह औसत 14,775 रुपए तक पहुंच जाता है। निजी अस्पतालों में यह खर्च 30 हजार से 40 हजार रुपए या उससे अधिक हो सकता है।
इसका अर्थ है कि प्रसव के मामले में खर्च 10 से 15 गुना तक बढ़ जाता है। शहरी क्षेत्रों में यह बोझ और अधिक है, जहां औसत खर्च 23,670 रुपए है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 11,609 रुपए है।
इलाज के लिए लोगों की पसंद भी खर्च को प्रभावित करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 35 प्रतिशत लोग सरकारी अस्पतालों में जाते हैं, लेकिन 39 प्रतिशत लोग निजी डॉक्टर या क्लिनिक का सहारा लेते हैं। शहरी क्षेत्रों में यह प्रवृत्ति और स्पष्ट हो जाती है, जहां 42 प्रतिशत से अधिक लोग निजी क्लिनिक में इलाज कराते हैं।
यह दिखाता है कि निजी स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और उपयोग तेजी से बढ़ रहा है, और इसके साथ खर्च भी कई गुना बढ़ रहा है।
गैर-अस्पताल (आउट-पेशेंट) इलाज भी सस्ता नहीं है, भले ही इसे सामान्य माना जाता हो। पिछले 15 दिनों के भीतर एक उपचार पर औसत खर्च 861 रुपए है, जबकि माध्य खर्च 400 रुपए है। सरकारी संस्थानों में औसत खर्च केवल 289 रुपए है और कई मामलों में यह शून्य के करीब है, जो बताता है कि यहां मुफ्त या कम लागत पर सेवाएं मिलती हैं।
इसके विपरीत निजी अस्पतालों में यह खर्च औसतन 1,447 रुपए और निजी क्लिनिक में 958 रुपए तक पहुंच जाता है। यानी छोटी बीमारियों में भी निजी क्षेत्र पर निर्भरता जेब पर असर डालती है।
राज्यवार आंकड़े यह दिखाते हैं कि स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च पूरे देश में एक समान नहीं है, बल्कि इसमें भारी अंतर है। दक्षिण और कुछ विकसित राज्यों में इलाज का खर्च अधिक है। उदाहरण के लिए, तेलंगाना में अस्पताल में भर्ती पर कुल खर्च लगभग 55 हजार रुपए तक पहुंच जाता है, जबकि तमिलनाडु में यह 52 हजार रुपए के आसपास है। केरल और कर्नाटक में भी यह खर्च 40 से 45 हजार रुपए के बीच रहता है।
पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी खर्च ऊंचा है, जहां कुल खर्च 40 हजार रुपए के आसपास या उससे अधिक दर्ज किया गया है। उत्तर प्रदेश और हरियाणा में भी यह स्तर करीब 45 हजार रुपए तक पहुंचता है।
इसके विपरीत, पूर्वोत्तर और कुछ कम विकसित राज्यों में खर्च अपेक्षाकृत कम है। ओडिशा में यह करीब 22 हजार रुपए है, जबकि मिजोरम और मेघालय में यह 25 हजार रुपए के आसपास है। लद्दाख जैसे क्षेत्रों में यह खर्च केवल 8 हजार रुपए तक दर्ज किया गया है।
हालांकि कम खर्च का मतलब यह नहीं है कि स्थिति बेहतर है। कई बार यह स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित उपलब्धता या कम निजीकरण का संकेत भी हो सकता है, जहां लोग कम इलाज कराते हैं या सस्ते विकल्पों तक ही सीमित रहते हैं।
राज्यवार आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि जहां सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत हैं, वहां लोगों का खर्च कम रहता है। लेकिन जैसे-जैसे निजी क्षेत्र का दायरा बढ़ता है, खर्च भी तेजी से बढ़ता है।
उदाहरण के लिए, दक्षिण भारत के राज्यों में निजी अस्पतालों की भूमिका अधिक है और वहीं खर्च भी अधिक दिखाई देता है। इसके विपरीत पूर्वोत्तर राज्यों में सरकारी सेवाओं पर निर्भरता अधिक है, जिससे खर्च अपेक्षाकृत कम रहता है।
इन सभी आंकड़ों से एक स्पष्ट तस्वीर उभरती है कि भारत में स्वास्थ्य सेवाएं अभी भी बड़े पैमाने पर “आउट-ऑफ-पॉकेट” यानी जेब से होने वाले खर्च पर निर्भर हैं। सरकारी अस्पताल आम लोगों के लिए राहत का मुख्य आधार बने हुए हैं, लेकिन उनकी पहुंच और गुणवत्ता में सुधार की जरूरत है। वहीं निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका स्वास्थ्य सेवाओं को महंगा बना रही है, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के लिए इलाज कराना मुश्किल होता जा रहा है।
निजी क्षेत्र की बढ़ती भूमिका स्वास्थ्य सेवाओं को महंगा बना रही है, जिससे आर्थिक असमानता और बढ़ रही है। एक ही बीमारी का इलाज अलग-अलग अस्पतालों में 5 से 10 गुना तक महंगा हो सकता है।
स्वास्थ्य पर बढ़ता खर्च केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय और समान अवसरों से भी जुड़ा हुआ है। यदि सस्ती और सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत नहीं किया गया, तो आने वाले समय में इलाज का खर्च और अधिक परिवारों को आर्थिक संकट में धकेल सकता है।