कोरोना संक्रमण का असर हमेशा बुखार, खांसी या सांस लेने की परेशानी तक सीमित नहीं रहता। कुछ लोगों के लिए संक्रमण से उबरने के महीनों बाद भी मुश्किलें खत्म नहीं होतीं, बल्कि पहले से मौजूद बीमारियां और गंभीर हो जाती हैं।
अमेरिका में 2,227 वयस्कों पर किए गए एक अध्ययन में 11.8 फीसदी प्रतिभागियों ने बताया कि कोविड संक्रमण के बाद उनकी पुरानी स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ गईं। इनमें सबसे ज्यादा असर सांस संबंधी बीमारियों पर पड़ा।
अस्थमा, सीओपीडी, लगातार खांसी और सांस फूलने जैसी परेशानियों के अलावा थकान, शरीर में दर्द, चिंता और अवसाद के लक्षण भी बढ़ने की बात सामने आई।
अध्ययन ने यह भी उजागर किया कि बीमारी बढ़ने का असर मरीजों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है। उनके लिए लक्षणों को संभालना, सामान्य काम करना और समय पर इलाज हासिल करना मुश्किल हो सकता है।
निष्कर्ष बताते हैं कि लॉन्ग कोविड को केवल संक्रमण के बाद उभरने वाले नए लक्षणों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। पहले से बीमार लोगों की बढ़ती परेशानियों को समझना, नियमित चिकित्सकीय निगरानी सुनिश्चित करना और लंबे समय तक देखभाल उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
कोरोना महामारी भले ही बीत चुकी हो, लेकिन इसका साया कई जिंदगियों पर आज भी बना हुआ है। जब हम लॉन्ग कोविड की बात करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान उन नए लक्षणों पर जाता है जो संक्रमण के बाद शुरू होते हैं।
लेकिन हाल ही में किए एक नए अध्ययन ने ऐसी सच्चाई को उजागर किया है, जो लाखों परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी और उनके संघर्ष से सीधे जुड़ी है। रिसर्च से पता चला है कि कोरोना पुरानी बीमारियों और शारीरिक परेशानियों को भी और ज्यादा गंभीर बना रहा है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक कोविड-19 का असर केवल संक्रमण के दौरान बुखार, खांसी या सांस लेने में तकलीफ तक सीमित नहीं हो सकता। संक्रमण से उबरने के महीनों बाद भी कुछ लोगों को पहले से मौजूद बीमारियों के बढ़ने का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में उनके लिए न केवल लक्षणों को संभालना मुश्किल हो जाता है, बल्कि रोजमर्रा के काम करना और समय पर इलाज हासिल करना भी चुनौती बन सकता है।
अध्ययन में कोविड से संक्रमित हो चुके 2,227 वयस्कों में से 263 (करीब 12 फीसदी) ने बताया कि संक्रमण के बाद उनकी पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ गईं।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, लॉन्ग कोविड को अक्सर संक्रमण के बाद उभरने वाले नए लक्षणों से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन इसकी तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, संक्रमण के बाद पहले से मौजूद बीमारियों या स्वास्थ्य समस्याओं का बिगड़ जाना। यह स्थिति मरीजों के लिए लंबे समय तक परेशानी का कारण बन सकती है।
अध्ययन में शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों से कोविड संक्रमण के तीन, छह और 12 महीने बाद स्वास्थ्य संबंधी सवाल पूछे। इसके लिए जुलाई 2023 से जनवरी 2025 के बीच जुटाए गए आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इस अध्ययन में भाग लेने वाले लोग अमेरिका के एरिजोना, इंडियाना, ब्रोंक्स और फिलाडेल्फिया के उत्तरी व पूर्वोत्तर इलाकों से थे। इनमें से करीब 94 फीसदी लोगों ने बताया कि कोविड से संक्रमित होने से पहले ही उन्हें कम से कम एक स्वास्थ्य समस्या थी।
जिन 263 लोगों ने संक्रमण के बाद अपनी पुरानी स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ने की बात कही, उनमें सबसे ज्यादा असर सांस संबंधी परेशानियों पर दिखा। करीब 32 फीसदी लोगों ने बताया कि उनका अस्थमा, क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी), लगातार खांसी या सांस फूलने जैसी समस्याएं पहले से ज्यादा गंभीर हो गईं।
इसके अलावा, करीब 20 फीसदी लोगों ने थकान, सिरदर्द, बाल झड़ने और ठंड लगने जैसी परेशानियां बढ़ने की जानकारी दी। करीब 15 फीसदी लोगों ने मांसपेशियों और हड्डियों से जुड़ी समस्याओं, खासकर शरीर में दर्द बढ़ने की बात कही।
मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका असर दिखाई दिया। करीब 12 फीसदी लोगों ने बताया कि कोविड के बाद उनकी चिंता और अवसाद से जुड़ी समस्याएं बढ़ गईं। वहीं, कुछ लोगों ने डायबिटीज और थायरॉइड से जुड़ी परेशानियां बढ़ने की जानकारी दी। हालांकि, इन दोनों श्रेणियों में ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम थी।
अध्ययन में सामने आया कि पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं के बिगड़ने का असर केवल शारीरिक तकलीफों तक सीमित नहीं रहा। प्रभावित लोगों ने लक्षणों को संभालने, रोजमर्रा के काम पूरे करने और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचने में भी कठिनाइयों का जिक्र किया।
इसका मतलब है कि संक्रमण से उबरने के बाद भी कुछ लोगों के लिए सामान्य जीवन में लौटना आसान नहीं होता। लगातार थकान, सांस फूलने या शरीर में दर्द जैसी समस्याएं कामकाज, सामाजिक गतिविधियों और व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसी परिस्थितियों में मरीजों को न केवल चिकित्सा सहायता, बल्कि लंबे समय तक निगरानी और देखभाल की भी जरूरत पड़ सकती है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि कोविड के बाद सामने आने वाली नई बीमारियों पर अब तक काफी ध्यान दिया गया है, लेकिन पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं के बिगड़ने के अनुभवों को भी समझना जरूरी है।
इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि मरीजों को किन तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और उनकी देखभाल में कहां कमी रह जाती है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, पहले से मौजूद बीमारियों और लॉन्ग कोविड के बीच संबंध को समझना इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका असर लक्षणों के प्रबंधन से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं के इस्तेमाल और रोजमर्रा के कामों तक पड़ सकता है।
अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि कोविड संक्रमण के बाद जिन लोगों की पुरानी स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ जाती हैं, उनके लिए डॉक्टरों के साथ नियमित संपर्क और उचित चिकित्सकीय देखभाल उपयोगी हो सकती है। हालांकि, इस अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कोविड ने ही हर मामले में बीमारी को बिगाड़ा या सभी मरीजों पर इसका असर एक जैसा होता है।
शोधकर्ताओं ने जोर दिया कि सार्स-कोव-2 वायरस का संक्रमण और दोबारा संक्रमण जारी रहने के कारण इसके दीर्घकालिक प्रभावों की निगरानी भी जरूरी है। खासकर उन लोगों पर ज्यादा ध्यान देने की आवश्यकता है, जिनके संक्रमण के बाद लक्षण बढ़ जाते हैं।
यह अध्ययन याद दिलाता है कि कोविड से उबरने का मतलब हमेशा यह नहीं होता कि शरीर पहले जैसी स्थिति में लौट आया है। कुछ लोगों के लिए संक्रमण के बाद की चुनौती उनकी पुरानी बीमारी के साथ शुरू होती है। इसलिए कोविड के दीर्घकालिक प्रभावों को समझने और मरीजों को समय पर उचित देखभाल उपलब्ध कराने के लिए और अधिक शोध की जरूरत है।