तनाव, खराब खानपान, नींद की कमी और बदलती जीवनशैली के बीच हाई ब्लड प्रेशर अब दुनिया के लिए एक खामोश महामारी बन चुका है।
हालात इतने गंभीर हैं कि आज दुनिया का हर तीसरा वयस्क हाइपरटेंशन का शिकार है, जबकि यह बीमारी हर साल करीब एक करोड़ लोगों की जान ले रही है।
तुलाने यूनिवर्सिटी के नए वैश्विक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि पिछले 20 वर्षों में इसका सबसे ज्यादा असर उन गरीब और विकासशील देशों में बढ़ा है, जहां स्वास्थ्य व्यवस्थाएं पहले से कमजोर हैं।
अध्ययन के मुताबिक दुनिया में हाई ब्लड प्रेशर के नए मरीजों में करीब 90 फीसदी हिस्सेदारी निम्न और मध्यम आय वाले देशों की है। चिंता की बात यह भी है कि दुनिया भर में 20 फीसदी से भी कम मरीजों का रक्तचाप नियंत्रित है।
भारत की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार देश में 21 करोड़ से ज्यादा वयस्क हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित हैं, लेकिन इनमें से बड़ी आबादी को अपनी बीमारी का पता तक नहीं है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते जागरूकता, सस्ती दवाओं, बेहतर जांच और स्वस्थ जीवनशैली पर जोर नहीं दिया गया, तो यह “साइलेंट किलर” आने वाले वर्षों में और भयावह रूप ले सकता है।
कहने को तो हाई ब्लड प्रेशर यानी हाइपरटेंशन एक ऐसी बीमारी है जिसकी जांच आसान है, और सस्ती दवाओं या जीवनशैली में थोड़ा सा बदलाव कर काबू में किया जा सकता है। लेकिन हकीकत इसके उलट बेहद डरावनी है।
तुलाने यूनिवर्सिटी के एक नए वैश्विक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि यह 'साइलेंट किलर' एक ऐसी खामोश महामारी बन चुका है, जो पिछले 20 सालों में और ज्यादा जानलेवा हुई है। यह समस्या खासकर उन कमजोर और विकासशील देशों के लिए कहीं ज्यादा गंभीर है जिनके पास इससे लड़ने के पर्याप्त साधन नहीं हैं।
चिंता की बात यह है कि हाइपरटेंशन का बोझ खासतौर पर उन देशों में तेजी से बढ़ा है, जहां स्वास्थ्य व्यवस्थाएं पहले से ही कमजोर हैं। इस अध्ययन के नतीजे जर्नल ऑफ द अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं।
नतीजे दर्शाते हैं कि एक ओर जहां दुनिया के अमीर देशों में तो पिछले दो दशकों में हाई ब्लड प्रेशर के मामलों में थोड़ी कमी आई है, लेकिन कमजोर और मध्यम आय वाले देशों में इसका ग्राफ बहुत तेजी से भागा है। हैरान कर देने वाली बात है कि पूरी दुनिया में जितने नए मरीज बढ़े हैं, उनमें से करीब 90 फीसदी मामले इन्हीं पिछड़े देशों में दर्ज किए गए हैं।
उच्च रक्तचाप आज दुनिया में असमय होने वाली मौतों की सबसे बड़ी वजह है, जिसे थोड़ी सी सतर्कता से रोका जा सकता है। आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर बेहद डरावनी है, दुनिया के 33 फीसदी वयस्क यानी करीब 170 करोड़ लोग इसकी चपेट में हैं। स्थिति कितनी डरावनी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह खामोश बीमारी हर साल करीब एक करोड़ जिंदगियां निगल रही है।
दिल, दिमाग और किडनी पर भारी पड़ रहा हाई ब्लड प्रेशर
अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता सामंथा ओ'कोनेल के मुताबिक, सबसे चिंताजनक बात यह है कि लोगों में बीमारी के प्रति जागरूकता, इलाज और नियंत्रण, तीनों ही बेहद कमजोर हैं। यह समस्या केवल गरीब देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि विकसित देशों में भी स्थिति संतोषजनक नहीं है।
आज हाइपरटेंशन हार्ट अटैक, स्ट्रोक, किडनी फेलियर और डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) का सबसे बड़ा कारण है। लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि ज्यादातर मामलों में इसके शुरुआती लक्षण दिखाई नहीं देते। इंसान अंदर ही अंदर बीमार होता रहता है और उसे पता तब चलता है जब पानी सिर से ऊपर गुजर जाता है।
यहां तक कि जांच के बाद भी इसे नियंत्रित करना आसान नहीं होता। कई बार डॉक्टर इलाज से जुड़े नवीनतम दिशानिर्देशों का पालन नहीं कर पाते, जबकि मरीज नियमित रूप से दवाएं लेने और लंबे समय तक जीवनशैली में बदलाव बनाए रखने में संघर्ष करते हैं।
अध्ययन में एक और चिंताजनक पहलु यह सामने आया है कि 2020 में दुनिया भर में हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित 20 फीसदी से भी कम लोगों का रक्तचाप नियंत्रित था। अमीर देशों में नियंत्रण की दर 40.2 फीसदी रही, जबकि निम्न और मध्यम आय वाले देशों में स्थिति कहीं ज्यादा बदतर है, जहां महज 13.6 फीसदी मरीज ही इसे कंट्रोल कर पा रहे हैं।
अध्ययन की वरिष्ठ शोधकर्ता कैथरीन मिल्स का कहना है भले ही इस दिशा में कुछ प्रगति हुई हो, लेकिन वैश्विक स्तर पर रक्तचाप पर अभी भी बेहद कम नियंत्रण है। विडम्बना यह है कि प्रभावी दवाएं और इलाज मौजूद होने के बावजूद दुनिया इस बीमारी को काबू में नहीं कर पा रही।
एशिया और अफ्रीका सबसे ज्यादा प्रभावित
119 देशों के 60 लाख से ज्यादा वयस्कों के आंकड़ों पर आधारित यह अध्ययन अब तक के सबसे व्यापक विश्लेषणों में से एक माना जा रहा है। नतीजे दर्शाते हैं कि 2020 तक दक्षिण अमेरिका, कैरिबियन और उप-सहारा अफ्रीका में हाइपरटेंशन की दर सबसे अधिक थी। वहीं कुल मरीजों की संख्या के लिहाज से पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र पहले स्थान पर रहे, जबकि दक्षिण एशिया दूसरे स्थान पर रहा।
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि कमजोर और समृद्ध देशों के बीच असमानता लगातार बढ़ रही है। 2000 में अनियंत्रित हाई ब्लड प्रेशर वाले 70 फीसदी लोग निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रह रहे थे, जो 2020 तक बढ़कर 83 फीसदी हो गए हैं।
उच्च रक्तचाप से जूझ रहे हैं भारत में 30 फीसदी से ज्यादा वयस्क
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा जारी रिपोर्ट 'ग्लोबल रिपोर्ट ऑन हाइपरटेंशन 2025' से पता चला है कि भारत में 21 करोड़ से ज्यादा वयस्क उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं। मतलब की देश की 30 फीसदी से ज्यादा वयस्क आबादी इस समस्या से जूझ रही है।
इससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि इनमें से महज 39 फीसदी (8.22 करोड़) ही जानते हैं कि वो इस समस्या से पीड़ित हैं, जबकि करीब 83 फीसदी मरीजों यानी 17.3 करोड़ से ज्यादा का रक्तचाप नियंत्रित नहीं है। मतलब कि देश में हाई ब्लड प्रेशर के 17 फीसदी मरीजों में ही रक्तचाप नियंत्रित है।
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने इसपर किए अध्ययन में खुलासा किया है कि देश में करीब 34 फीसदी लोग प्री-हाइपरटेंशन का शिकार हैं। वहीं यदि देश में जिलों के आधार पर देखें तो यह आंकड़ा 15.6 फीसदी से 63.4 फीसदी दर्ज किया गया है।
सच कहें तो देश में जिस तरह से खानपान की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है और जीवनशैली बदल रही है, उसके चलते स्वास्थ्य से जुड़ी अनगिनत समस्याएं पैदा हो रही हैं, ऊपर से तनाव यह सभी मिलकर भारतीयों को अंदर ही अंदर घुन की तरह खाए जा रहे हैं।
कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था पर बढ़ता आर्थिक बोझ
विशेषज्ञों के मुताबिक हाई ब्लड प्रेशर अब महज स्वास्थ्य से जुड़ा संकट नहीं रहा, बल्कि यह आर्थिक चुनौती भी बनता जा रहा है।
कमजोर देशों में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को पहले ही संक्रामक रोगों, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य जैसी समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। ऐसे में लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों की देखभाल के लिए संसाधन जुटाना और कठिन हो जाता है।
प्रोफेसर मिल्स का कहना है, "यह सिर्फ मरीज की लापरवाही का मामला नहीं है। मरीज के स्तर पर दवा समय से खाना और खान-पान बदलना तो चुनौती है ही, डॉक्टरों और हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था के स्तर पर भी बड़ी खामियां हैं।"
ऐसे में शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि इस संकट से निपटने के लिए सस्ती दवाओं की उपलब्धता बढ़ाने, सही तरीके से रक्तचाप मापने, इलाज को सरल बनाने और ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है, जो मरीजों को लंबे समय तक सहयोग दे सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक मरीज, डॉक्टर और पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था, तीनों स्तरों की बाधाओं को एक साथ दूर नहीं किया जाएगा, तब तक इस ‘साइलेंट किलर’ पर काबू पाना मुश्किल रहेगा।