ट्रेकोमा एक संक्रामक आंखों की बीमारी है, जो क्लैमाइडिया ट्रैकोमैटिस नामक बैक्टीरिया से फैलती है। यह दुनिया में अंधेपन का सबसे बड़ा संक्रामक कारण माना जाता है।  फोटो साभार: आईस्टॉक
स्वास्थ्य

'ट्रेकोमा' से जूझ रहे हैं एक अरब लोग, ऑस्ट्रेलिया 30वां देश बना जिसने इस पर विजय पाई

ऑस्ट्रेलिया ट्रेकोमा मुक्त घोषित, डब्ल्यूएचओ ने की पुष्टि, आदिवासी समुदायों के प्रयासों और स्वच्छता सुधार से बड़ी स्वास्थ्य उपलब्धि हासिल हुई।

Dayanidhi

  • आदिवासी और टोरेस स्ट्रेट समुदायों के नेतृत्व में वर्षों के प्रयासों से स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं में महत्वपूर्ण सुधार हुआ।

  • डब्ल्यूएचओ की साफी रणनीति के जरिए सर्जरी, एंटीबायोटिक्स, साफ-सफाई और पर्यावरण सुधार ने ट्रेकोमा नियंत्रण में निर्णायक भूमिका निभाई।

  • ट्रेकोमा, जो अंधेपन का प्रमुख संक्रामक कारण है, अब ऑस्ट्रेलिया में व्यापक स्तर पर स्वास्थ्य खतरा नहीं रहा।

  • यह उपलब्धि वैश्विक उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों के खिलाफ लड़ाई में महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जा रही है।

ट्रेकोमा क्या है और क्यों है खतरनाक? ट्रेकोमा आंखों की एक संक्रामक बीमारी है, जो क्लैमाइडिया ट्रैकोमैटिस नामक बैक्टीरिया से फैलती है। यह दुनिया में अंधेपन का सबसे बड़ा संक्रामक कारण माना जाता है। यह बीमारी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने, गंदे हाथों, दूषित सतहों और मक्खियों के जरिए फैलती है। अगर इसका समय पर इलाज न किया जाए तो बार-बार संक्रमण होने से पलकों के अंदर की तरफ मुड़ने लगती हैं, जिससे आंखों को नुकसान पहुंचता है और अंत में अंधापन हो सकता है

ऑस्ट्रेलिया को मिली बड़ी सफलता

हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने ऑस्ट्रेलिया को ट्रेकोमा को एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में खत्म करने के लिए मान्यता दी है। इसका मतलब है कि अब यह बीमारी देश में व्यापक स्तर पर लोगों के लिए खतरा नहीं रही। यह उपलब्धि न केवल ऑस्ट्रेलिया के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक प्रेरणा है।

ऑस्ट्रेलिया अब उन देशों की सूची में शामिल हो गया है जिन्होंने इस बीमारी को सफलतापूर्वक नियंत्रित कर लिया है। यह वैश्विक स्तर पर उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों (नेग्लेक्टेड ट्रॉपिकल डिसीसिस) को खत्म करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

आदिवासी समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका

रिपोर्ट के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया में ट्रेकोमा मुख्य रूप से दूर-दराज के आदिवासी इलाकों में पाया जाता था। जहां देश के अन्य हिस्सों से यह बीमारी पहले ही खत्म हो चुकी थी, वहीं इन समुदायों में यह लंबे समय तक बनी रही। इस चुनौती से निपटने के लिए सरकार और स्थानीय संगठनों ने मिलकर काम किया।

आदिवासी समुदायों और स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने इस अभियान में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने लोगों को जागरूक किया, इलाज उपलब्ध कराया और स्वच्छता को बढ़ावा दिया। यह सफलता इस बात का उदाहरण है कि जब समुदाय खुद आगे आकर काम करता है तो बड़े बदलाव संभव होते हैं।

सरकारी योजनाओं और रणनीतियों का योगदान

रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑस्ट्रेलिया ने 2006 में राष्ट्रीय ट्रेकोमा प्रबंधन कार्यक्रम शुरू किया। इस कार्यक्रम के तहत डब्ल्यूएचओ की साफी रणनीति अपनाई गई। इसमें सर्जरी, एंटीबायोटिक दवाएं, चेहरे की साफ-सफाई और पर्यावरण सुधार जैसे उपाय शामिल थे।

इसके अलावा खतरे वाले क्षेत्रों में नियमित जांच की गई। स्वास्थ्य टीमों ने गांव-गांव जाकर लोगों की आंखों की जांच की और जरूरत पड़ने पर तुरंत इलाज किया। स्वच्छ पानी, बेहतर घर और साफ-सफाई की सुविधाएं बढ़ाने पर भी जोर दिया गया। इन सभी प्रयासों के कारण धीरे-धीरे बीमारी के मामलों में कमी आई और अंततः इसे नियंत्रित कर लिया गया।

वैश्विक स्तर पर इसका महत्व

ट्रेकोमा उन 21 बीमारियों में से एक है जिन्हें उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोग कहा जाता है। ये बीमारियां आमतौर पर गरीब और पिछड़े इलाकों में ज्यादा पाई जाती हैं, जहां साफ पानी, स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी होती है।

दुनिया भर में अब भी एक अरब से ज्यादा लोग इन बीमारियों से प्रभावित हैं। ऐसे में ऑस्ट्रेलिया की यह सफलता दिखाती है कि सही योजना, लगातार प्रयास और मजबूत साझेदारी से इन बीमारियों को खत्म किया जा सकता है।

आगे की चुनौती और सावधानी

हालांकि ट्रेकोमा अब ऑस्ट्रेलिया में बड़ी समस्या नहीं रहा, लेकिन इसे पूरी तरह खत्म मानना सही नहीं होगा। बीमारी के दोबारा फैलने का खतरा हमेशा बना रहता है। इसलिए जरूरी है कि निगरानी जारी रहे, लोगों को जागरूक किया जाए और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत रखा जाए। सरकार और स्वास्थ्य संगठनों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में यह बीमारी फिर से न फैले।

ऑस्ट्रेलिया की यह उपलब्धि केवल एक देश की जीत नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया के लिए एक उम्मीद है। यह दिखाती है कि अगर सरकार, समाज और स्वास्थ्य संस्थाएं मिलकर काम करें तो सबसे कठिन बीमारियों को भी हराया जा सकता है। अब जरूरत है कि अन्य देश भी इससे सीख लें और ट्रेकोमा जैसी बीमारियों को जड़ से खत्म करने की दिशा में कदम बढ़ाएं।