प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
स्वास्थ्य

ऑटिज्म के इलाज के नाम पर स्टेम सेल थेरेपी पर सख्ती, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगी स्पष्ट गाइडलाइन

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को छह सप्ताह के भीतर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि ऑटिज्म से जुड़े स्टेम सेल शोध और क्लिनिकल ट्रायल के लिए क्या नियम हैं।

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • सुप्रीम कोर्ट ने ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) के इलाज के नाम पर दी जा रही स्टेम सेल थेरेपी को लेकर सख्त रुख अपनाया है।

  • अदालत ने केंद्र सरकार को छह सप्ताह के भीतर इस उपचार से जुड़े शोध और क्लिनिकल ट्रायल के नियमों, जरूरी मंजूरियों और मरीजों की पात्रता के मानदंडों को स्पष्ट करने का निर्देश दिया है।

  • अदालत ने जोर दिया कि परिवारों को गुमराह होने से बचाने के लिए यह बताना जरूरी है कि किन परिस्थितियों में स्टेम सेल थेरेपी की अनुमति है और किन परिस्थितियों में इसे इलाज के रूप में देना गैरकानूनी है।

  • केंद्र ने दो बड़े चिकित्सा केंद्रों में इस उपचार की प्रभावशीलता और सुरक्षा जांचने के लिए वैज्ञानिक परीक्षण का प्रस्ताव रखा था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मरीजों के चयन और पात्रता से जुड़े सवाल उठाए। अदालत ने यह भी कहा कि नए मरीजों को विधिवत स्वीकृत और निगरानी वाले शोध या क्लिनिकल ट्रायल के बाहर यह थेरेपी नहीं दी जानी चाहिए।

  • साथ ही, पहले से उपचार ले रहे मरीजों की सुरक्षा, नियमित चिकित्सकीय निगरानी और फॉलो-अप सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया।

  • अदालत के निर्देश का मकसद वैज्ञानिक प्रमाणों, पारदर्शी नियमों और मरीजों की सुरक्षा के आधार पर यह सुनिश्चित करना है कि बेहतर इलाज की उम्मीद में परिवार अप्रमाणित उपचारों के जाल में न फंसें।

ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (एएसडी) से जूझ रहे बच्चों और उनके परिवारों की उम्मीदों का गलत फायदा उठाकर उन्हें अप्रमाणित इलाज की ओर धकेले जाने की आशंका के बीच सुप्रीम कोर्ट ने स्टेम सेल थेरेपी को लेकर सख्त रुख अपनाया है।

सर्वोच्च अदालत ने 13 अक्टूबर, 2026 को केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को छह सप्ताह के भीतर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी करने का निर्देश दिया है, ताकि लोगों को पता चल सके कि ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर के लिए स्टेम सेल से जुड़े शोध और क्लिनिकल ट्रायल किन नियमों के तहत किए जा सकते हैं और इसके लिए किन अनुमतियों की जरूरत है।

आदेश में अदालत ने कहा कि मौजूदा नियामक व्यवस्था को स्पष्ट रूप से सामने लाना जरूरी है। अदालत का कहना है कि नियमों की स्पष्ट जानकारी से स्टेम सेल उपचार के ऐसे तरीकों को रोकने में मदद मिलेगी, जिन्हें अनुमति नहीं है, लेकिन जिन्हें इसके बावजूद मरीजों को इलाज के नाम पर दिया जा रहा है।

गौरतलब है कि इसके साथ ही अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि इलाज के नाम पर मासूमों की सेहत के साथ खिलवाड़ या अवैध प्रयोग कतई बर्दाश्त नहीं किए जाएंगे।

इसके साथ ही न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को एक विस्तृत प्रोटोकॉल तैयार करने का निर्देश दिया। इसमें चरणबद्ध तरीके से बताया जाना चाहिए कि स्टेम सेल से जुड़े शोध या क्लिनिकल ट्रायल के लिए आवेदन कैसे किया जाए, किन-किन अनुमतियों की जरूरत होगी, प्रत्येक चरण में कितना समय लग सकता है और संबंधित संस्थानों व अन्य पक्षों की क्या जिम्मेदारियां होंगी।

अदालत ने यह भी कहा कि हर प्रक्रिया के लिए लागू कानून या नियमों का आधार और अनुमति देने वाले सक्षम प्राधिकरण का नाम स्पष्ट होना चाहिए। जहां संभव हो, पूरी प्रक्रिया को फ्लोचार्ट के जरिए समझाया जाए, ताकि डॉक्टरों, चिकित्सा संस्थानों और आम लोगों को आसानी से पता चल सके कि किसी प्रस्तावित उपचार के लिए किस नियामक प्रक्रिया का पालन करना होगा।

परिवारों को गुमराह होने से बचाने पर जोर

ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के माता-पिता अक्सर अपने बच्चे के विकास और बेहतर भविष्य के लिए हर संभव रास्ता तलाशते हैं। ऐसे में किसी उपचार से बड़े सुधार की उम्मीद दिखाने वाले दावों के बीच सही और प्रमाणित जानकारी तक उनकी पहुंच बेहद जरूरी है।

इसी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को मौजूदा नियमों के बारे में व्यापक जागरूकता फैलाने का निर्देश दिया। लोगों को साफ-साफ बताया जाना चाहिए कि उचित मंजूरी और निगरानी वाले शोध या क्लिनिकल ट्रायल के बाहर ऑटिज्म के इलाज के लिए स्टेम सेल थेरेपी को नियमित चिकित्सा सेवा के रूप में देने की अनुमति नहीं है।

अदालत के निर्देश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी संभावित उपचार को लेकर परिवारों की उम्मीदों का फायदा उठाकर उन्हें ऐसी चिकित्सा सेवा न दी जाए, जिसकी नियामक मंजूरी नहीं है।

क्लिनिकल ट्रायल में शामिल होने के नियम भी स्पष्ट करे सरकार

केंद्र सरकार ने दो बड़े चिकित्सा केंद्रों में ऑटिज्म के लिए स्टेम सेल उपचार की प्रभावशीलता और सुरक्षा जांचने के उद्देश्य से एक साथ वैज्ञानिक परीक्षण (रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल यानी आरसीटी) कराने का प्रस्ताव दिया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस शोध और क्लिनिकल ट्रायल में मरीजों को शामिल करने के लिए तय पात्रता मानदंडों पर भी सवाल उठाए हैं।

गौरतलब है कि इस तरह के परीक्षण में प्रतिभागियों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत अलग-अलग समूहों में बांटा जाता है, ताकि उपचार की प्रभावशीलता और सुरक्षा का वैज्ञानिक आकलन किया जा सके।

सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रस्ताव में मरीजों की पात्रता और चयन प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए। अदालत ने केंद्र से स्पष्ट करने को कहा कि इस परीक्षण में शामिल होने के लिए क्या मानदंड तय किए गए हैं। साथ ही यह भी बताने को कहा कि क्या रैंडमाइजेशन की प्रक्रिया के कारण कुछ पात्र मरीजों को अध्ययन के तहत दिए जाने वाले उपचार से वंचित होना पड़ सकता है। इनमें वे मरीज भी शामिल हैं, जो पहले से ही यह थेरेपी ले रहे हैं।

अदालत ने कहा कि यदि प्रस्तावित परीक्षण की रूपरेखा के कारण कुछ पात्र मरीजों को उपचार नहीं मिल पाता, तो केंद्र सरकार को उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए एक विस्तृत योजना तैयार कर अदालत के सामने रखनी होगी।

इस योजना में ऐसे मरीजों की लगातार निगरानी, चिकित्सकीय देखरेख, नियमित फॉलो-अप और उनकी स्वास्थ्य स्थिति का आकलन शामिल होना चाहिए। जरूरत पड़ने पर उनकी सेहत और कल्याण की रक्षा के लिए अतिरिक्त कदम भी उठाने होंगे। पीठ ने स्पष्ट किया कि ये सभी उपाय लागू वैज्ञानिक, नैतिक और नियामक मानकों के अनुरूप होने चाहिए।

नए मरीजों को स्टेम सेल थेरेपी देने पर रोक बरकरार

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में एक बार फिर स्पष्ट किया कि ऑटिज्म के लिए स्टेम सेल थेरेपी लेने वाले नए मरीजों को किसी विधिवत स्वीकृत और निगरानी वाले शोध या क्लिनिकल ट्रायल के बाहर शामिल नहीं किया जाना चाहिए।

अदालत के इस निर्देश से ऑटिज्म के इलाज के नाम पर स्टेम सेल थेरेपी देने वाली सेवाओं के नियमन, मरीजों की सुरक्षा और परिवारों तक सही जानकारी पहुंचाने की जरूरत एक बार फिर सामने आई है।

देखा जाए तो ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों और उनके परिवारों के लिए यह केवल चिकित्सा का सवाल नहीं, बल्कि भरोसे और सुरक्षित भविष्य का भी सवाल है। ऐसे में स्पष्ट नियम, पारदर्शी प्रक्रिया और वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित जानकारी यह सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभा सकती है कि इलाज की तलाश में परिवार किसी भ्रामक दावे या जाल में न फंसें।