विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 विज्ञान के महत्व को दर्शाता है और बेहतर स्वास्थ्य के लिए वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देने का संदेश देता है
भारत में मातृ मृत्यु और बच्चों की मृत्यु दर में कमी आई है, जिसका मुख्य कारण टीकाकरण और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं हैं
विज्ञान और नई तकनीकों जैसे जांच उपकरण और आधुनिक दवाओं ने कई गंभीर बीमारियों को नियंत्रित और इलाज योग्य बना दिया है
भारत में स्वास्थ्य अनुसंधान पर खर्च बहुत कम है, जो जीडीपी का केवल 0.02 प्रतिशत है और यह चिंता का विषय बना हुआ है
बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भारत को अधिक निवेश, पारदर्शिता और वैज्ञानिक सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि भविष्य सुरक्षित हो सके
हर साल सात अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। इस दिन की शुरुआत विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की स्थापना के उपलक्ष्य में हुई थी। साल 2026 की थीम “साथ मिलकर स्वास्थ्य के लिए, विज्ञान का साथ दें” है। इसका उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि विज्ञान और सहयोग से ही बेहतर स्वास्थ्य संभव है।
भारत में स्वास्थ्य सुधार के आंकड़े
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई सुधार किए हैं। मातृ मृत्यु दर में कमी आई है। साल 2000 के बाद इसमें काफी गिरावट दर्ज की गई है। इसी तरह, पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर भी आधी से ज्यादा कम हुई है।
टीकाकरण कार्यक्रमों ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई है। भारत में मिशन इंद्रधनुष जैसे कार्यक्रमों के कारण बच्चों को कई खतरनाक बीमारियों से बचाया गया है। खसरा जैसी बीमारी से होने वाली मौतों में भी भारी कमी आई है।
इसके अलावा, आजकल ब्लड प्रेशर मशीन और कैंसर की जांच जैसी सुविधाएं पहले की तुलना में अधिक उपलब्ध हैं। इससे लोगों को समय पर बीमारी का पता चल जाता है और इलाज आसान हो जाता है।
विज्ञान और तकनीक का योगदान
विज्ञान ने स्वास्थ्य सेवाओं को बहुत आसान और सुरक्षित बना दिया है। पहले सर्जरी करना बहुत कठिन और दर्दनाक होता था, लेकिन आज एनेस्थीसिया के कारण मरीज को दर्द नहीं होता।
नई तकनीकों जैसे एमआरआई, डिजिटल टेस्ट और आधुनिक दवाओं ने इलाज को तेज और प्रभावी बनाया है। एचआईवी, कैंसर और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियां, जो पहले जानलेवा मानी जाती थीं, अब काफी हद तक नियंत्रित की जा सकती हैं। यह सब संभव हुआ है वैज्ञानिकों, डॉक्टरों और सरकारों के आपसी सहयोग से।
भारत में स्वास्थ्य को लेकर चुनौतियां
हालांकि भारत ने प्रगति की है, फिर भी कई चुनौतियां बनी हुई हैं। देश में अभी भी बड़ी संख्या में लोग सरकारी अस्पतालों पर निर्भर हैं, जहां सुविधाएं सीमित हैं। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और बढ़ती जनसंख्या भी स्वास्थ्य पर असर डाल रहे हैं। नई बीमारियों का खतरा भी बढ़ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों और अस्पतालों की कमी एक बड़ी समस्या है। इसके कारण लोगों को समय पर इलाज नहीं मिल पाता।
स्वास्थ्य अनुसंधान पर खर्च
भारत में स्वास्थ्य अनुसंधान पर खर्च एक बड़ी चिंता का विषय है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण संबंधी विभागीय संसदीय स्थायी समिति ने विश्व स्वास्थ्य दिवस से ठीक तीन सप्ताह पहले, 18 मार्च 2026 को संसद में अपनी 173वीं रिपोर्ट प्रस्तुत की। रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपने जीडीपी का केवल 0.02 प्रतिशत ही स्वास्थ्य अनुसंधान पर खर्च करता है। यह आंकड़ा अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से काफी कम है। भारत जैसे बड़े देश के लिए यह निवेश पर्याप्त नहीं माना जाता।
सरकार ने 2026-27 के बजट में स्वास्थ्य अनुसंधान के लिए 4,821 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इसमें से अधिकतर राशि भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) को दी गई है। फिर भी, कुल अनुसंधान बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र की हिस्सेदारी केवल 7.6 प्रतिशत है, जो अन्य क्षेत्रों की तुलना में कम है।
सुधार की आवश्यकता
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को स्वास्थ्य अनुसंधान पर अधिक निवेश करना चाहिए। इससे नई दवाएं, तकनीक और इलाज के तरीके विकसित किए जा सकते हैं। इसके साथ ही, यह भी जरूरी है कि जो पैसा खर्च किया जा रहा है, उसका सही उपयोग हो। पारदर्शिता और बेहतर योजना से ही स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार संभव है। भारत को चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों से सीख लेकर अपने शोध कार्य को मजबूत करना चाहिए।
विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 हमें यह संदेश देता है कि विज्ञान और सहयोग के बिना अच्छा स्वास्थ्य संभव नहीं है। भारत ने कई क्षेत्रों में प्रगति की है, लेकिन अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। यदि सरकार, वैज्ञानिक और समाज मिलकर काम करें, तो आने वाले समय में भारत एक स्वस्थ और मजबूत देश बन सकता है।