पूर्वी कांगो में इबोला का प्रकोप तेजी से बढ़ा, पिछले एक सप्ताह में 317 लोगों की मौत हुई और हजारों संक्रमित हैं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब तक इबोला के 5,514 मामले सामने आए हैं और 2,642 लोगों की मौत हो चुकी है।
संक्रमण छह प्रांतों के 57 स्वास्थ्य क्षेत्रों तक पहुंच चुका है, जबकि इतुरी प्रांत सबसे ज्यादा प्रभावित बना हुआ है।
डब्ल्यूएचओ ने कहा कि यह कांगो में अब तक का सबसे तेजी से बढ़ता इबोला प्रकोप है, हालात बेहद चिंताजनक हैं।
हिंसा, विस्थापन और स्वास्थ्य केंद्रों पर हमलों के कारण मरीजों तक पहुंचना मुश्किल, इलाज और संक्रमण रोकना बड़ी चुनौती बना हुआ है।
पूर्वी कांगो में इबोला का प्रकोप तेजी से गंभीर होता जा रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक सप्ताह में 300 से अधिक लोगों की मौत हुई है। स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, शनिवार तक इस बीमारी के 5,514 मामले सामने आ चुके थे और 2,642 लोगों की मौत हो चुकी थी। इनमें पिछले सात दिनों में हुई 317 मौतें भी शामिल हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि वास्तविक संख्या सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक हो सकती है। उनका अनुमान है कि यह प्रकोप दर्ज किए गए आंकड़ों से तीन गुना तक बड़ा हो सकता है। अब तक करीब 1,200 मरीज बीमारी से ठीक हो चुके हैं। दर्ज आंकड़ों के आधार पर बीमारी की मृत्यु दर लगभग 47.9 प्रतिशत है।
छह प्रांतों तक पहुंचा प्रकोप
इबोला का संक्रमण अब कांगो के 57 स्वास्थ्य इलाकों तक फैल चुका है। इसका असर इतुरी, उत्तर किवु, दक्षिण किवु, हाउत-उएले, बास-उएले और त्शोपो प्रांतों में देखा जा रहा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, इतुरी इस प्रकोप का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। यहां देश में सामने आए कुल मामलों में करीब 85 प्रतिशत और मौतों में लगभग 79 प्रतिशत दर्ज की गई हैं। इससे साफ है कि इस इलाके में स्वास्थ्य व्यवस्था पर सबसे ज्यादा दबाव है।
डब्ल्यूएचओ ने बताया सबसे तेजी से बढ़ता प्रकोप
डब्ल्यूएचओ ने सोमवार को कहा कि यह कांगो में अब तक का सबसे तेजी से बढ़ने वाला इबोला प्रकोप बन गया है। संगठन ने चेतावनी दी है कि संक्रमण की रफ्तार स्वास्थ्यकर्मियों की रोकथाम की क्षमता से आगे निकल रही है।
प्रेस विज्ञप्ति में डब्ल्यूएचओ के अफ्रीका क्षेत्रीय निदेशक मोहम्मद जनाबी के हवाले से कहा गया है कि यह प्रकोप एक बेहद अहम मोड़ पर पहुंच गया है। उन्होंने कहा कि अभी लिए जाने वाले फैसले यह तय करेंगे कि बीमारी को कितनी जल्दी काबू में किया जा सकता है और कितनी जानें बचाई जा सकती हैं।
अस्पताल पहुंचने से पहले हो रही मौतें
इस प्रकोप की सबसे बड़ी चिंता यह है कि बड़ी संख्या में लोगों की मौत अस्पताल या इबोला उपचार केंद्रों के बाहर हो रही है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, हाल के हफ्तों में दर्ज हुई करीब 60 प्रतिशत मौतें समुदायों के अंदर हुई हैं।
इसका मतलब है कि कई मरीज समय पर बीमारी की पहचान और इलाज तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। देर से इलाज मिलने पर मरीज की हालत तेजी से बिगड़ सकती है। स्वास्थ्यकर्मियों के सामने मरीजों की जल्द पहचान करने और उन्हें उपचार केंद्रों तक पहुंचाने की बड़ी चुनौती है।
हिंसा और संघर्ष बनी बड़ी बाधा
पूर्वी कांगो लंबे समय से हिंसा और संघर्ष से प्रभावित है। इस कारण स्वास्थ्यकर्मियों के लिए कई इलाकों तक पहुंचना मुश्किल हो रहा है। लगातार लड़ाई, लोगों का विस्थापन और स्वास्थ्य केंद्रों पर हमले बीमारी के खिलाफ अभियान को कमजोर कर रहे हैं।
इसके अलावा कुछ समुदायों में स्वास्थ्य टीमों को लेकर भरोसे की कमी भी समस्या पैदा कर रही है। कई दूरदराज के इलाकों में मरीजों तक पहुंचना आसान नहीं है। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि प्रभावित क्षेत्रों में लड़ाई रोकना जरूरी है, ताकि स्वास्थ्यकर्मी सुरक्षित तरीके से लोगों तक पहुंच सकें।
जांच और इलाज की क्षमता बढ़ी
हालांकि बीमारी से निपटने की तैयारी में काफी विस्तार किया गया है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, इबोला की जांच करने वाली प्रयोगशालाओं की संख्या एक से बढ़कर 19 हो गई है। ये प्रयोगशालाएं एक दिन में 3,000 से ज्यादा नमूनों की जांच कर सकती हैं।
इलाज के लिए उपलब्ध बिस्तरों की संख्या भी 10 से कम से बढ़कर 1,300 से ज्यादा हो गई है। संभावित इलाज और वैक्सीन पर भी परीक्षण और मूल्यांकन चल रहा है। डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस एडनॉम घेब्रेयेसस ने कहा है कि इस प्रकोप को नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए प्रभावित समुदायों में बड़े स्तर पर कार्रवाई और लगातार संसाधनों की जरूरत होगी।
आने वाले महीने बेहद अहम
कांगो में इस बीमारी का प्रकोप मई में घोषित किया गया था। अब संक्रमण के तेजी से फैलने के कारण आने वाले महीने बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि बीमारी की रोकथाम के लिए जांच, इलाज और प्रभावित लोगों तक पहुंच बढ़ानी होगी।
साथ ही स्थानीय प्रशासन, स्वास्थ्यकर्मियों, समुदायों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के बीच बेहतर सहयोग जरूरी होगा। विशेषज्ञों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि संक्रमण की रफ्तार को जल्द रोका जाए और मरीजों को समय पर इलाज मिले। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो पूर्वी कांगो में यह संकट और गंभीर रूप ले सकता है।