नए अध्ययन में पाया गया कि मासिक धर्म के फॉलिक्युलर चरण में कोविड वैक्सीन लगवाने पर दुष्प्रभावों की आशंका अधिक रही।
फॉलिक्युलर चरण में टीकाकरण कराने वाली महिलाओं में किसी भी दुष्प्रभाव की रिपोर्ट करने की संभावना 35 प्रतिशत अधिक पाई गई।
शोधकर्ताओं को दुष्प्रभावों की गंभीरता या कुल संख्या में फॉलिक्युलर और ल्यूटियल चरणों के बीच बड़ा अंतर नहीं मिला।
फॉलिक्युलर चरण में वैक्सीन लेने वालों में संक्रमण होने तक का समय अधिक दिखा, लेकिन निष्कर्ष अभी शरुआती हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि हार्मोनल बदलाव और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया के संबंध को समझने के लिए और अधिक अध्ययन की आवश्यकता है।
महिलाओं के स्वास्थ्य पर किए गए एक नए अध्ययन में यह पता चलता है कि कोविड-19 वैक्सीन लगवाने का समय, यानी माहवारी चक्र का कौन-सा चरण चल रहा है, वैक्सीन के बाद होने वाले दुष्प्रभावों को प्रभावित कर सकता है। यह अध्ययन हाल ही में वैज्ञानिक पत्रिका "एनपीजे विमेंस हेल्थ" नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन महिलाओं ने अपने मासिक चक्र के शुरुआती चरण, यानी फॉलिक्युलर फेज में कोविड वैक्सीन लगवाई, उनमें दुष्प्रभावों की शिकायत अधिक देखने को मिली। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि यह शुरुआती निष्कर्ष हैं और इन्हें पक्का मानने से पहले बड़े स्तर पर और शोध की जरूरत है।
कैसे किया गया अध्ययन
यह अध्ययन लोकप्रिय पीरियड-ट्रैकिंग ऐप क्लू के आंकड़ों पर आधारित था। शोधकर्ताओं ने 13 हजार से अधिक लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण किया। कई मानकों के आधार पर चयन करने के बाद अंतिम विश्लेषण में 1,474 महिलाओं को शामिल किया गया।
अध्ययन में केवल 18 से 44 साल की उन महिलाओं को शामिल किया गया जिनका मासिक धर्म चक्र नियमित था। हार्मोनल गर्भनिरोधक इस्तेमाल करने वाली महिलाओं, हाल ही में गर्भवती रही महिलाओं और अनियमित चक्र वाली महिलाओं को अध्ययन से बाहर रखा गया।
शोधकर्ताओं ने प्रतिभागियों को दो समूहों में बांटा। पहला समूह उन महिलाओं का था जिन्हें फॉलिक्युलर फेज में वैक्सीन लगी थी। दूसरे समूह में वे महिलाएं थीं जिन्हें ल्यूटियल फेज में वैक्सीन लगी थी।
क्या कहते हैं परिणाम?
अध्ययन में पाया गया कि फॉलिक्युलर फेज में वैक्सीन लगवाने वाली 75.9 प्रतिशत महिलाओं ने किसी न किसी दुष्प्रभाव की सूचना दी। वहीं ल्यूटियल फेज में वैक्सीन लगवाने वाली महिलाओं में यह आंकड़ा 70.3 प्रतिशत था।
विश्लेषण से पता चला कि फॉलिक्युलर फेज में वैक्सीनेशन कराने वाली महिलाओं में दुष्प्रभावों की रिपोर्ट करने की आशंका 35 प्रतिशत अधिक थी। खासतौर पर 18 से 24 वर्ष की युवा महिलाओं में यह संबंध और अधिक मजबूत दिखाई दिया।
हालांकि अध्ययन में यह नहीं पाया गया कि किसी एक चरण में दुष्प्रभाव अधिक गंभीर थे। दोनों समूहों में दुष्प्रभावों की गंभीरता और कुल संख्या लगभग समान रही।
हार्मोन की भूमिका पर ध्यान
वैज्ञानिकों का मानना है कि मासिक धर्म चक्र के दौरान शरीर में हार्मोन के स्तर में लगातार बदलाव होते रहते हैं। फॉलिक्युलर फेज में एस्ट्रोजन हार्मोन का प्रभाव अधिक होता है, जबकि ल्यूटियल फेज में प्रोजेस्टेरोन प्रमुख भूमिका निभाता है।
पिछले शोधों से पता चला है कि एस्ट्रोजन कुछ परिस्थितियों में प्रतिरक्षा प्रणाली को अधिक सक्रिय बना सकता है। दूसरी ओर प्रोजेस्टेरोन अपेक्षाकृत शांत प्रभाव डाल सकता है। इसी कारण वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि वैक्सीन के समय मौजूद हार्मोनल स्थिति शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकती है।
संक्रमण से सुरक्षा पर भी मिला संकेत
अध्ययन में कोविड संक्रमण के समय का भी विश्लेषण किया गया। आंकड़ों के अनुसार फॉलिक्युलर फेज़ में वैक्सीन लगवाने वाली महिलाओं में संक्रमण होने तक का औसत समय थोड़ा अधिक था। इस समूह में संक्रमण औसतन 200 दिनों बाद दर्ज किया गया, जबकि दूसरे समूह में यह समय 165 दिन था।
हालांकि इस हिस्से में केवल 82 मामलों का डेटा उपलब्ध था। शोधकर्ताओं ने स्पष्ट कहा कि यह परिणाम बहुत सीमित आंकड़ों पर आधारित है और इससे कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
अध्ययन की सीमाएं
वैज्ञानिकों ने माना कि इस अध्ययन की कई सीमाएं हैं। मासिक धर्म के चरण का अनुमान कैलेंडर के आधार पर लगाया गया था, हार्मोन की सीधी जांच नहीं की गई। इसके अलावा वैक्सीन के दुष्प्रभाव और संक्रमण से जुड़ी जानकारी प्रतिभागियों ने स्वयं दी थी, जिससे त्रुटि की संभावना बनी रहती है।
अध्ययन में शामिल महिलाएं एक विशेष मोबाइल ऐप की उपयोगकर्ता थीं, इसलिए परिणाम सभी महिलाओं पर समान रूप से लागू हों, यह जरूरी नहीं है।
आगे और शोध की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि यह अध्ययन एक नई दिशा दिखाता है। इससे यह संभावना सामने आई है कि महिलाओं के मासिक धर्म चक्र का समय वैक्सीन की प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकता है। लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि महिलाओं को किसी विशेष चरण में ही वैक्सीन लगवानी चाहिए।
वैज्ञानिकों का मानना है कि बड़े और अधिक सटीक अध्ययनों से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि हार्मोनल बदलाव वास्तव में वैक्सीन के प्रभाव और सुरक्षा को किस हद तक प्रभावित करते हैं।