जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण से गर्मी और प्रदूषण के कारण होने वाले 1.89 अरब स्वस्थ जीवन-वर्षों का नुकसान टाला जा सकता है। फोटो साभार: आईस्टॉक
स्वास्थ्य

भारत समेत दुनिया में साल 2100 तक सेहत पर मंडराएंगे 17 बड़े खतरे, आज के फैसले तय करेंगे भविष्य

साल 2100 तक मानवता पर मंडराएंगे 17 बड़े खतरे, मोटापा, जलवायु परिवर्तन, महामारियां और एआई का दुरुपयोग रोकने के लिए आज से तैयारी जरूरी

Dayanidhi

  • मोटापा सबसे बड़ा खतरा बनकर उभर रहा है, प्रभावी उपायों से 2100 तक 23.1 अरब स्वस्थ जीवन-वर्षों का नुकसान रोका जा सकता है।

  • जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण से गर्मी और प्रदूषण के कारण होने वाले 1.89 अरब स्वस्थ जीवन-वर्षों का नुकसान टाला जा सकता है।

  • आय में बढ़ती असमानता से 2100 तक 13.8 अरब स्वस्थ जीवन-वर्षों का नुकसान होने का अनुमान है, जो वैश्विक चिंता बढ़ाता है।

  • परमाणु युद्ध और एआई के दुरुपयोग को रोककर करोड़ों जानें बचाई जा सकती हैं और भविष्य की पीढ़ियों को गंभीर संकटों से सुरक्षित रखा जा सकता है।

  • भारत को स्वास्थ्य व्यवस्था मजबूत करने, नई तकनीकों में निवेश बढ़ाने और वैश्विक सहयोग के जरिए भविष्य के खतरों से निपटने की तैयारी करनी होगी।

दुनिया आज विकास की तेज रफ्तार पर सवार है। विज्ञान नई ऊंचाइयां छू रहा है, तकनीक जीवन को आसान बना रही है और चिकित्सा के क्षेत्र में लगातार नई खोज हो रही हैं। लेकिन इस चमकती तस्वीर के पीछे कुछ ऐसे खतरे भी छिपे हैं, जो आने वाली पीढ़ियों की सेहत और जिंदगी पर गहरा असर डाल सकते हैं।

द लैंसेट की एक नई आयोग रिपोर्ट ने ऐसे ही 17 बड़े खतरों की पहचान की है। रिपोर्ट के मुताबिक, आज लिए जाने वाले फैसले तय करेंगे कि साल 2100 तक दुनिया के लोगों को कितने स्वस्थ साल मिलेंगे और कितने बीमारी, विकलांगता या असमय मौत की भेंट चढ़ जाएंगे।

मोटापा बना बड़ी चिंता

बर्लिन में विश्व स्वास्थ्य शिखर सम्मेलन के दौरान सामने आए इस अध्ययन में 204 देशों और क्षेत्रों का आकलन किया गया है। इसमें बताया गया है कि मोटापा भविष्य में स्वास्थ्य पर सबसे भारी बोझ डालने वाले खतरों में शामिल है। प्रभावी कदम उठाकर साल 2100 तक मोटापे से जुड़े करीब 23.1 अरब स्वस्थ जीवन-वर्षों के नुकसान को टाला जा सकता है।

रिपोर्ट में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस यानी रोगाणुओं पर दवाओं का बेअसर होना, मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं, उच्च रक्तचाप, बच्चों में कुपोषण, धूम्रपान और बढ़ती उम्र से जुड़ी समस्याओं को भी गंभीर खतरा बताया गया है। इसके अलावा आय में असमानता और शिक्षा की कमी भी लोगों की सेहत पर लंबे समय तक असर डाल सकती हैं।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ेंगी मुश्किलें

जलवायु परिवर्तन केवल मौसम का मामला नहीं है, बल्कि यह सीधे इंसानों की सेहत से जुड़ा सवाल है। बढ़ती गर्मी, वायु प्रदूषण, खाद्य संकट और विस्थापन जैसी समस्याएं पहले से कमजोर लोगों को और मुश्किल में डाल सकती हैं।

आयोग के अनुमान के मुताबिक, यदि दुनिया तापमान में वृद्धि को 1.8 डिग्री सेल्सियस के आसपास सीमित रखती है, तो 4.4 डिग्री तक गर्म होने की स्थिति की तुलना में करीब 1.89 अरब स्वस्थ जीवन-वर्षों का नुकसान रोका जा सकता है। इसका मतलब साफ है कि आज पर्यावरण की रक्षा के लिए उठाए गए कदम कल करोड़ों लोगों की जिंदगी बेहतर बना सकते हैं।

असमानता और युद्ध का भी खतरा

रिपोर्ट ने आय की असमानता को भी एक बड़ा खतरा माना है। अनुमान है कि इसके कारण 2100 तक 13.8 अरब स्वस्थ जीवन-वर्षों का नुकसान हो सकता है। यह बोझ करीब 25 कोविड-19 महामारियों के बराबर बताया गया है।

परमाणु युद्ध और कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई के दुर्भावनापूर्ण इस्तेमाल की आशंका भले ही दूसरे खतरों से कम हो, लेकिन इनके परिणाम बेहद विनाशकारी हो सकते हैं। आयोग के अनुसार, परमाणु संघर्ष को रोकने से करीब 13.3 करोड़ मौतों और 9.35 अरब स्वस्थ जीवन-वर्षों के नुकसान को टाला जा सकता है। वहीं, एआई के गलत इस्तेमाल का जोखिम घटाने से 10.4 अरब स्वस्थ जीवन-वर्षों का नुकसान रोकने की संभावना है।

भारत के लिए क्या है संदेश?

शोध में कहा गया है कि सरकारों को केवल आज की समस्याओं तक सीमित रहने के बजाय भविष्य के खतरों के लिए भी तैयारी करनी होगी। भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सुरक्षा, महामारी से बचाव और वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़े अंतरराष्ट्रीय विमर्श में बड़ी भूमिका निभानी चाहिए।

भारत जैसे विशाल देश के लिए यह चुनौती और भी अहम है। यहां कुपोषण, प्रदूषण, मोटापा और मानसिक स्वास्थ्य जैसी समस्याएं एक साथ मौजूद हैं। ऐसे में स्वास्थ्य नीतियों को केवल अस्पतालों और इलाज तक सीमित नहीं रखा जा सकता। बेहतर आंकड़ों, नई तकनीक, स्थानीय जरूरतों और कमजोर वर्गों की भागीदारी के आधार पर लंबी अवधि की योजना बनानी होगी।

तैयारी, नई खोज और लगातार निगरानी जरूरी

आयोग ने तीन प्रमुख रास्ते सुझाए हैं। पहला, ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था तैयार करना जो बीमारियों की रोकथाम और आपात स्थितियों से निपटने में सक्षम हो। दूसरा, टीकों, एंटीबायोटिक दवाओं, मोटापे के इलाज और जलवायु तकनीकों में निवेश बढ़ाना। तीसरा, संभावित खतरों का नियमित और स्वतंत्र आकलन करना।

संदेश साफ है-भविष्य के संकटों का इंतजार करने के बजाय आज ही तैयारी करनी होगी। क्योंकि सेहत, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और तकनीक अलग-अलग मुद्दे नहीं हैं। इनका रिश्ता गहरा है। दुनिया ने यदि समय रहते मिलकर कदम उठाए, तो आने वाली पीढ़ियों को केवल लंबी उम्र ही नहीं, बल्कि स्वस्थ और बेहतर जीवन भी दिया जा सकता है।