'हर्बल', '100 फीसदी नेचुरल' और 'तंबाकू-मुक्त' जैसे आकर्षक दावों के पीछे छिपे खतरे को आईआईटी गांधीनगर के वैज्ञानिकों ने उजागर किया है।
जर्नल ऑफ हैजर्ड्स मैटेरियल्स में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक हर्बल सिगरेट न केवल सामान्य सिगरेट जितनी नुकसानदेह हैं, बल्कि कई मामलों में उनसे भी अधिक खतरनाक साबित हो सकती हैं।
शोध में पाया गया कि हर्बल सिगरेट के धुएं में 500 नैनोमीटर से छोटे सूक्ष्म कणों की मात्रा तंबाकू वाली सिगरेट की तुलना में करीब 20 फीसदी अधिक थी, जो हृदय और फेफड़ों की गंभीर बीमारियों से जुड़े हैं।
वहीं तेंदू पत्तों में लिपटी हर्बल सिगरेटों का ऑक्सीडेटिव पोटेंशियल 49 फीसदी तक ज्यादा पाया गया, जो शरीर में सूजन, ऊतक क्षति और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ा सकता है। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि 'केमिकल-फ्री' और '100 फीसदी प्राकृतिक' बताई जा रही एक हर्बल सिगरेट में जहरीली धातु लेड की मात्रा सबसे अधिक मिली।
यह अध्ययन चेतावनी देता है कि पैकेट पर लिखे दावों से ज्यादा खतरनाक वह धुआं है जो फेफड़ों तक पहुंचता है, इसलिए हर्बल सिगरेट को भी सख्त नियमन के दायरे में लाने की जरूरत है।
अगर आप सोचते हैं कि तंबाकू मुक्त या 'हर्बल' सिगरेट पीना सेहत के लिए सुरक्षित है, तो सावधान हो जाइए। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने इस भ्रम को पूरी तरह तोड़ दिया है।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), गांधीनगर और अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनोइस से जुड़े वैज्ञानिकों के एक साझा अध्ययन में खुलासा हुआ है कि हर्बल सिगरेट से निकलने वाला धुआं साधारण तंबाकू युक्त सिगरेट जितना ही, या कुछ मामलों में उससे भी कहीं ज्यादा खतरनाक हो सकता है।
जर्नल ऑफ हैजर्ड्स मैटेरियल्स में प्रकाशित यह स्टडी रिपोर्ट इसलिए आंखें खोलने वाली है क्योंकि भारत सहित दुनिया के कई देशों में हर्बल सिगरेट को 'प्राकृतिक', 'तंबाकू-मुक्त' और यहां तक कि 'सेहत के लिए फायदेमंद' बताकर धड़ल्ले से बाजार में बेचा जा रहा है।
अध्ययन में पुष्टि हुई है कि हर्बल सिगरेट से निकलने वाला धुआं सामान्य तंबाकू युक्त सिगरेट जितना, बल्कि कई मामलों में उससे भी अधिक हानिकारक हो सकता है।
डराने वाले आंकड़े और नतीजे
अपने इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने भारत में सबसे ज्यादा बिकने वाले तंबाकू के दो प्रमुख ब्रांडों और चार लोकप्रिय हर्बल सिगरेटों की तुलना की है। इन हर्बल सिगरेटों में तुलसी, लौंग, दालचीनी, पुदीना, ग्रीन टी, वाटर लिली और बबूने के फूल जैसे तत्वों का इस्तेमाल किया गया था। इनमें से दो हर्बल ब्रांड्स में बीड़ी की तरह 'तेंदू के पत्तों' का इस्तेमाल किया गया था।
इसके साथ ही वैज्ञानिकों ने मानव के धूम्रपान व्यवहार की नकल करने वाली विशेष प्रयोगशाला प्रणाली में इन सिगरेटों को जलाकर उनके धुएं का विश्लेषण किया। उन्होंने धुएं में मौजूद कणों के आकार, रासायनिक संरचना और उनकी विषाक्तता से जुड़े गुणों की जांच की।
इस जांच के नतीजे बेहद चौंकाने वाले रहे। आईआईटी गांधीनगर में सिविल और केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के सहायक प्रोफेसर समीर पटेल का कहना है, "नतीजे इस आम धारणा को गलत साबित करते हैं कि तंबाकू-मुक्त उत्पाद जोखिम-मुक्त भी होते हैं।"
उनके मुताबिक लगभग हर पैमाने पर हर्बल सिगरेट का धुआं तंबाकू सिगरेट जितना या उससे अधिक खतरनाक पाया गया। अध्ययन में पाया गया कि हर्बल सिगरेट से निकलने वाले धुंए में 500 नैनोमीटर से छोटे सूक्ष्म कणों की मात्रा तंबाकू युक्त सिगरेट की तुलना में करीब 20 फीसदी अधिक थी।
ऐसे महीन कण हृदय और फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं।
संदेह के घेरे में 100 फीसदी प्राकृतिक के दावे
अध्ययन में यह भी सामने आया कि धुएं का 'ऑक्सीडेटिव पोटेंशियल' (ओपी) यानी शरीर के अंदर सूजन और फेफड़ों को नुकसान पहुंचाने की क्षमता हर्बल सिगरेट में काफी ज्यादा थी। खासकर तेंदू के पत्तों वाली सिगरेट में यह क्षमता कागज में लिपटी सिगरेट की तुलना में करीब 49 फीसदी अधिक थी।
यह माप दर्शाती है कि धुआं शरीर में कितनी मात्रा में प्रतिक्रियाशील ऑक्सीजन कण (आरओएस) पैदा कर सकता है। ये कण सूजन, फेफड़ों के ऊतकों को नुकसान और हृदय रोगों से जुड़े बदलावों के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं।
सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि '100 फीसदी नेचुरल' और 'केमिकल फ्री' का दावा करने वाली एक तुलसी-युक्त हर्बल सिगरेट में 'लेड' (एक बेहद जहरीली धातु) की मात्रा सबसे अधिक पाई गई।
अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनोइस के पर्यावरण इंजीनियरिंग विशेषज्ञ प्रोफेसर विशाल वर्मा का कहना है यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बहुत से लोग निकोटीन-मुक्त उत्पादों को कम नुकसानदेह मान लेते हैं।
विज्ञापनों का जाल और अधूरी सच्चाई
अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर आलोक कुमार ठाकुर के अनुसार, कई हर्बल सिगरेट कंपनियां दावा करती हैं कि उनका उत्पाद खांसी ठीक करता है, अच्छी नींद लाता है या तनाव कम करता है। हालांकि इन उत्पादों से निकलने वाले धुंए और विषैले प्रभावों का मूल्यांकन करने वाले वैज्ञानिक प्रमाण बेहद सीमित हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन सीधे तौर पर बीमारी के जोखिम का आकलन नहीं करता, बल्कि धुएं में मौजूद कणों और उनकी जैविक प्रतिक्रिया पैदा करने की क्षमता को मापता है। अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता डॉक्टर गणेश सुब्रमण्यन कहते हैं कि "डिब्बे पर क्या लिखा है, इससे फर्क नहीं पड़ता, असल बात यह है कि जब कोई चीज जलती है, तो उसके जलने पर कौन से कण, धातुएं और रसायन निकलते हैं।"
कानून के दायरे से बाहर हैं हर्बल सिगरेट
इस समय भारत में तंबाकू उत्पादों को नियंत्रित करने के लिए 'सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम (सीओटीपीए), 2003' लागू है, जिसके तहत सिगरेट के पैकेटों पर चेतावनी छापना और विज्ञापनों पर रोक लगाना जरूरी है। लेकिन तंबाकू-मुक्त बताकर बेचे जाने वाले हर्बल उत्पाद अक्सर इन नियमों के दायरे से बच जाते हैं।
अक्सर युवा और पहली बार धूम्रपान करने वाले लोग 'वेलनेस' या 'हर्बल' जैसे लुभावने शब्दों के झांसे में आकर इसकी तरफ आकर्षित होते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि अब समय आ गया है जब सरकार को जनता के स्वास्थ्य की रक्षा के लिए हर्बल सिगरेट को भी कड़े नियमों और कानूनों के दायरे में लाना चाहिए।