प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
स्वास्थ्य

सावधान! आपकी हड्डियों को कमजोर कर सकता है अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का ज्यादा सेवन

1.6 लाख से अधिक लोगों पर किए गए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का ज्यादा सेवन हड्डियों में मिनरल डेंसिटी को घटा सकता है और इससे कूल्हे की हड्डी टूटने का खतरा करीब 10.5 फीसदी तक बढ़ सकता है

Lalit Maurya

फ्लेवर दही, फ्रोजन पिज्जा, ब्रेकफास्ट सीरियल और इंस्टेंट ओट्स जैसे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड आजकल लोगों की रोजमर्रा की थाली का हिस्सा बनते जा रहे हैं। ये खाने में आसान, जल्दी तैयार होने वाले और अक्सर सस्ते भी होते हैं। लोग झटपट पेट भरने के लिए इन पर तेजी से निर्भर होते जा रहे हैं।

गौरतलब है कि हाल के वर्षों में कई शोधों ने चेतावनी दी है कि इनका ज्यादा सेवन मधुमेह, हृदय रोग और कुछ मामले में कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के खतरे को बढ़ा सकता है।

लेकिन अब एक नए अध्ययन ने चेतावनी दी है कि इनका अधिक सेवन हड्डियों की सेहत को भी नुकसान पहुंचा सकता है।

अमेरिका के तुलाने विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए इस अध्ययन में पाया गया है कि जो लोग ज्यादा मात्रा में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का सेवन करते हैं, उनकी हड्डियों का खनिज घनत्व (बोन मिनरल डेंसिटी) कम हो सकता है और इसकी वजह से उनमें कूल्हे की हड्डी के टूटने (हिप फ्रैक्चर) का खतरा बढ़ जाता है।

इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित द ब्रिटिश जर्नल ऑफ न्यूट्रिशन में प्रकाशित हुए हैं।

1.6 लाख से अधिक लोगों पर हुआ अध्ययन

इस अध्ययन में यूके बायोबैंक डेटाबेस से जुड़े 1.6 लाख से अधिक लोगों के स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है।

अध्ययन के मुताबिक, स्टडी में शामिल लोग रोजाना औसतन करीब आठ सर्विंग अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खा रहे थे। शोधकर्ताओं ने पाया कि यदि कोई व्यक्ति रोजाना करीब 3.7 सर्विंग से अधिक ऐसे खाद्य पदार्थ खाता है, तो उसके कूल्हे की हड्डी टूटने का खतरा करीब 10.5 फीसदी तक बढ़ जाता है।

हालांकि अलग-अलग खाद्य पदार्थों में एक सर्विंग का आकार अलग होता है, लेकिन मोटे तौर पर इसे एक फ्रोजन डिनर, एक कुकी और एक सोडा के बराबर माना जा सकता है।

रीढ़ और जांघ की हड्डियों पर असर

अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता लू क्वी के अनुसार, 12 वर्षों से अधिक समय तक लोगों का अनुसरण करने के बाद यह स्पष्ट हुआ कि जो लोग अधिक मात्रा में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड खाते हैं, उनकी जांघ की ऊपरी हड्डी (फीमर) और रीढ़ (लम्बर स्पाइन) जैसे अहम हिस्सों में बोन मिनरल डेंसिटी कम पाई गई।

उनके मुताबिक, हाल के वर्षों में कई अध्ययनों ने ऐसे खाद्य पदार्थों को स्वास्थ्य समस्याओं से जोड़ा है, लेकिन इंसानों में हड्डियों पर इसके प्रभाव का सीधा विश्लेषण पहली बार किया गया है।

क्यों नुकसानदेह हैं ये खाद्य पदार्थ

अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड आमतौर पर फैक्ट्रियों में तैयार किए जाते हैं और इनमें नमक, चीनी, कृत्रिम मिठास और हानिकारक वसा जैसे पदार्थों की मात्रा अधिक होती है। इनमें ऊर्जा तो अधिक होती है, लेकिन प्राकृतिक और पोषक तत्वों से भरपूर असली खाद्य पदार्थों की मात्रा बहुत कम या बिल्कुल न के बराबर होती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे खाद्य पदार्थों का सेवन कम और मध्यम आय वाले परिवारों में अधिक देखा जाता है। 2023 तक उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, युवाओं और वयस्कों द्वारा ली जाने वाली कुल कैलोरी का करीब 55 फीसदी हिस्सा इन्हीं खाद्य पदार्थों से आता है।

अक्टूबर 2023 में द ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में सामने आया है कि दुनिया में करीब 14 फीसदी वयस्क और 12 फीसदी बच्चे अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स की लत का शिकार बन चुके हैं। चिंता की बात है कि लोगों में स्वास्थ्य के नजरिए से हानिकारक इन खाद्य पदार्थों को लेकर जो लगाव है, वो शराब और तम्बाकू जितना ही बढ़ चुका है।

जनवरी 2025 में जर्नल ऑफ ओबेसिटी एंड मेटाबॉलिक सिंड्रोम में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में सामने आया है कि अमेरिका में अल्ट्रा प्रोसेस्ड फ़ूड कुल ऊर्जा सेवन का 57.5 फीसदी, ब्रिटेन में 56.8 फीसदी, कनाडा में 46.8 फीसदी और ऑस्ट्रेलिया में 42 फीसदी योगदान देते हैं।

भारत और अन्य विकासशील देशों में भी इसी तरह की वृद्धि देखी जा रही है। मतलब कि कहीं न कहीं यह खाद्य उत्पाद हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में घर करते जा रहे हैं।

युवाओं और कम वजन वाले लोगों में ज्यादा खतरा

अध्ययन में यह भी सामने आया कि 65 वर्ष से कम उम्र के लोगों और कम वजन (बीएमआई 18.5 से कम) वाले व्यक्तियों में इसका असर और भी ज्यादा स्पष्ट दिखता है। विशेषज्ञों के मुताबिक कम बीएमआई अपने-आप में ही हड्डियों की कमजोरी और फ्रैक्चर के खतरे को बढ़ा देता है।

ऐसे में जब आहार में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की मात्रा अधिक हो जाती है, तो यह खतरा और गहरा सकता है। यानी कमजोर शरीर के साथ ऐसा भोजन मिलकर हड्डियों की सेहत को और तेजी से नुकसान पहुंचा सकता है। गौरतलब है कि इससे पहले 2024 में प्रकाशित एक अध्ययन में भी पाया गया था कि ऐसे खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन ऑस्टियोपोरोसिस यानी हड्डियों के कमजोर होने के खतरे को बढ़ा सकता है।

इसी तरह 2016 में गर्भवती महिलाओं और उनके बच्चों पर किए गए एक अन्य अध्ययन में भी चौंकाने वाला संबंध सामने आया। इसमें पाया गया कि जो महिलाएं फास्ट फूड आउटलेट्स के पास रहती थीं, उनके बच्चों में जन्म के बाद हड्डियों में बोन मिनरल कंटेंट अपेक्षाकृत कम पाया गया।

सीएसई भी खतरे को लेकर करता रहा है आगाह

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) द्वारा भारत में किए गए अध्ययन में भी इस बात का खुलासा हुआ है कि जंक फूड और पैकेटबंद भोजन हमें जाने-अनजाने बीमारियों के भंवरजाल में धकेल रहा है। अध्ययन के नतीजे दर्शाते हैं कि जंक फूड में मौजूद नमक, वसा, ट्रांस फैट की बेहद ज्यादा मात्रा होती है जो मोटापा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह और हृदय की बीमारियों को बढ़ा रहा है।

सीएसई की लैब रिपोर्ट के मुताबिक लोगों के पसंदीदा जंक फूड में जरूरत से ज्यादा नमक पाया गया है। ऐसे में स्नैक्स या मील के तौर पर खाए जाने वाले पैकेटबंद फास्ट फूड का सेवन लोगों को बहुत ज्यादा बीमार बना सकता है। वहीं बड़ों की तुलना में बच्चों में यह खतरा और भी ज्यादा है।

आसान और स्वादिष्ट लगने वाले ये अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ धीरे-धीरे हमारी सेहत की बुनियाद को ही कमजोर कर रहे हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ पेट भरने का नहीं, बल्कि यह भी है कि हम अपनी थाली में क्या चुन रहे हैं—सुविधा या सेहत। ऐसे में अगर अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता चलन इसी तरह जारी रहा, तो आने वाले समय में कम उम्र में हड्डियों की कमजोरी और फ्रैक्चर की समस्या और बढ़ सकती है।

ऐसे में विशेषज्ञों का कहना है कि हड्डियों की मजबूती के लिए संतुलित और पोषक आहार बेहद जरूरी है, इसलिए अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का सेवन सीमित रखना ही बेहतर है।