इबोला से 6,207 लोग संक्रमित हुए, 3,009 की मौत हुई, बीमारी छह प्रांतों तक तेजी से फैली।
स्वास्थ्यकर्मियों पर लगातार हमले हुए, कई घायल हुए और कुछ ने इलाज करते हुए अपनी जान भी गंवाई।
अफवाहों और अविश्वास के कारण लोगों ने स्वास्थ्यकर्मियों का विरोध किया, जिससे इबोला रोकने की कोशिशें मुश्किल हुईं।
मृतकों के अंतिम संस्कार को लेकर स्वास्थ्यकर्मियों और परिवारों के बीच तनाव बढ़ा, क्योंकि शव संक्रमण फैला सकते थे।
सुरक्षा उपकरणों की कमी, हिंसा और असुरक्षा ने महामारी के खिलाफ लड़ाई में स्वास्थ्यकर्मियों की मुश्किलें बढ़ा दीं।
कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (डीआरसी) के पूर्वी हिस्से में इबोला का प्रकोप तेजी से फैल रहा है। बीमारी से लड़ने के लिए डॉक्टर, नर्स, रेड क्रॉस के स्वयंसेवक और दूसरे स्वास्थ्यकर्मी दिन-रात काम कर रहे हैं। लेकिन इन लोगों के सामने केवल जानलेवा वायरस का खतरा नहीं है। उन्हें स्थानीय लोगों के गुस्से, डर, अफवाहों और हिंसा का भी सामना करना पड़ रहा है।
कई स्वास्थ्यकर्मी खुद इबोला की चपेट में आ चुके हैं। कुछ की मौत भी हो गई। इसके बावजूद वे संक्रमित लोगों का इलाज करने और बीमारी को फैलने से रोकने में जुटे रहे।
स्वास्थ्यकर्मियों पर बढ़ते हमले
पूर्वी कांगो में स्वास्थ्यकर्मियों और राहत कर्मचारियों पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के मानवीय मामलों के कार्यालय के अनुसार, इटुरी, नॉर्थ किवु और साउथ किवु प्रांतों में इबोला से जुड़े कर्मचारियों और अन्य राहतकर्मियों को निशाना बनाकर कई घटनाएं हुईं। इनमें दर्जनों कर्मचारी घायल हुए।
एक घटना में पड़ोसी देश युगांडा की रेड क्रॉस टीम पर भीड़ ने हमला कर दिया। लोगों ने टीम की गाड़ियों पर पत्थर फेंके और दो एंबुलेंस को नुकसान पहुंचाया। इस हमले में एक स्वयंसेवक गंभीर रूप से घायल हो गया।
इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज के मुताबिक, स्वास्थ्यकर्मी और स्वयंसेवक इस संकट की सबसे आगे की पंक्ति में हैं और उनकी सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
अफवाहों ने बढ़ाई मुश्किल
इबोला के खिलाफ लड़ाई में सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक लोगों का अविश्वास था। कुछ स्थानीय लोगों को लगता था कि इबोला के नाम पर बाहर से आए लोग पैसा कमा रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी ‘इबोला बिजनेस’ और ‘इबोला प्लॉट’ जैसे शब्द फैल रहे थे।
इस अविश्वास के कारण कई लोग स्वास्थ्यकर्मियों की बात मानने को तैयार नहीं थे। कुछ परिवारों के सदस्यों ने इलाज करने वाले कर्मचारियों के साथ बदसलूकी की। कई जगहों पर गुस्साई भीड़ ने स्वास्थ्य केंद्रों को नुकसान पहुंचाया या उन्हें जला दिया।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) समेत स्वास्थ्य संगठनों का कहना था कि अफवाहें बीमारी को रोकने की कोशिशों को कमजोर कर रही थीं।
अंतिम संस्कार बना बड़ी चुनौती
इबोला से मौत के बाद शव को सुरक्षित तरीके से दफनाना बेहद जरूरी होता है। मृत व्यक्ति का शरीर मौत के बाद भी वायरस फैला सकता है। इसलिए स्वास्थ्यकर्मी परिवारों से सुरक्षित दफन की प्रक्रिया अपनाने की अपील करते थे।
लेकिन स्थानीय परंपराओं के कारण यह काम आसान नहीं था। कई समुदायों में अंतिम संस्कार के दौरान परिवार के लोग शव को छूते, धोते और चूमते हैं। इबोला के मामले में ऐसी परंपराएं संक्रमण फैलाने का बड़ा कारण बन सकती हैं।
जब अस्पताल मृतकों के शव परिवारों को पारंपरिक तरीके से अंतिम संस्कार के लिए देने से मना करते थे, तो कई बार परिवार नाराज हो जाते थे। इससे स्वास्थ्यकर्मियों और स्थानीय लोगों के बीच तनाव और बढ़ जाता था।
सुरक्षा उपकरणों की कमी
बीमारी से लड़ रहे स्वास्थ्यकर्मियों के सामने सुरक्षा उपकरणों की कमी भी एक बड़ी समस्या थी। कई जगहों पर डॉक्टर और नर्स पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के बिना मरीजों की देखभाल कर रहे थे।
महिला संगठनों के एक समूह की राष्ट्रीय समन्वयक ने बताया कि स्थिति पहले से बेहतर हुई थी, लेकिन सुरक्षा उपकरणों की कमी अब भी बनी हुई थी। उनके संगठन के कुछ कर्मचारी भी बीमार हुए। एक कर्मचारी के इबोला से संक्रमित होने की पुष्टि हुई, हालांकि वह इलाज के बाद बच गई।
तेजी से फैल रहा इबोला का प्रकोप
कांगो में इबोला का प्रकोप बेहद तेजी से फैल रहा था। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, बीमारी की आधिकारिक घोषणा के चार महीने से भी कम समय में 6,207 लोगों में संक्रमण की पुष्टि हुई और इनमें से 3,009 लोगों की मौत हो गई। यह आंकड़ा बताता है कि 1976 में इबोला की पहचान होने के बाद कांगो में यह अब तक का सबसे तेजी से फैलने वाला और सबसे घातक प्रकोप था।
कांगो में इससे पहले भी इबोला के मामले सामने आ चुके थे, लेकिन इस बार हालात ज्यादा कठिन थे। पूर्वी कांगो पहले से ही संघर्ष और असुरक्षा से प्रभावित क्षेत्र है। ऐसे माहौल में स्वास्थ्यकर्मियों के लिए गांवों और दूरदराज के इलाकों तक पहुंचना मुश्किल था।
इस बार का प्रकोप 2014 से 2016 के बीच पश्चिमी अफ्रीका में फैले इबोला से भी तेजी से फैल रहा था। पश्चिमी अफ्रीका का वह प्रकोप अब तक का दुनिया का सबसे गंभीर इबोला संकट माना जाता है। करीब तीन साल तक चले उस प्रकोप में 11,310 लोगों की मौत हुई थी।
बीमारी के साथ भरोसे की लड़ाई
इबोला से लड़ाई केवल दवाइयों और अस्पतालों तक सीमित नहीं थी। स्वास्थ्यकर्मियों को लोगों का भरोसा जीतना भी जरूरी था। जब तक लोग बीमारी, उसके संक्रमण और सुरक्षित अंतिम संस्कार की जरूरत को नहीं समझेंगे, तब तक वायरस को रोकना मुश्किल रहेगा।
कांगो का अनुभव यह दिखाता है कि किसी महामारी से लड़ने के लिए डॉक्टर और दवाइयां जितनी जरूरी हैं, उतना ही जरूरी है लोगों का भरोसा, सही जानकारी और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा। जो लोग सबसे आगे रहकर लोगों की जान बचाते हैं, उनकी रक्षा करना भी महामारी से लड़ाई का अहम हिस्सा है।