एआई स्वास्थ्य शोध को तेज कर रही है, लेकिन पारदर्शिता, गोपनीयता, समानता और जवाबदेही सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
डब्ल्यूएचओ ने एआई आधारित स्वास्थ्य शोध के लिए मजबूत नैतिक समीक्षा और प्रभावी निगरानी व्यवस्था की जरूरत बताई।
शोध नैतिकता समितियों को एआई से जुड़े जटिल अध्ययनों की समीक्षा के लिए अतिरिक्त विशेषज्ञता, प्रशिक्षण और संसाधन चाहिए होंगे।
विकासशील देशों में स्थानीय नेतृत्व और शोध क्षमता बढ़ाने से एआई तकनीक के लाभ अधिक समान रूप से पहुंचेंगे।
एआई स्वास्थ्य शोध में जिम्मेदार नवाचार के लिए शोधकर्ताओं, नियामकों, संस्थानों और नीति निर्माताओं के बीच सहयोग जरूरी होगा।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई तेजी से स्वास्थ्य शोध का हिस्सा बन रही है। इससे वैज्ञानिक खोजों को तेज करने, स्वास्थ्य आंकड़ों का बेहतर विश्लेषण करने और नई स्वास्थ्य तकनीकों को विकसित करने में मदद मिल रही है। हालांकि इसके साथ कई नए खतरे भी सामने आ रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कहा है कि एआई आधारित स्वास्थ्य शोध में मानव अधिकारों, समानता, गोपनीयता और सुरक्षा की रक्षा के लिए मजबूत नैतिक व्यवस्था जरूरी है।
डब्ल्यूएचओ ने जारी की नई रिपोर्ट
डब्ल्यूएचओ ने ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस-रिलेटेड हेल्थ रिसर्च: एथिक्स रिव्यू एंड ओवरसाइट’ नाम से नई रिपोर्ट जारी की है। इसमें शोधकर्ताओं, नैतिकता समितियों, नियामकों, शोध को वित्तीय सहायता देने वाली संस्थाओं और नीति निर्माताओं के लिए कई सुझाव दिए गए हैं।
रिपोर्ट का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में एआई का इस्तेमाल जिम्मेदारी से हो और इससे मिलने वाले लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुंचें। रिपोर्ट को डब्ल्यूएचओ के शोध नैतिकता, विज्ञान, डिजिटल स्वास्थ्य और एआई से जुड़े विशेषज्ञों ने मिलकर तैयार किया है।
स्वास्थ्य शोध का तरीका बदल रही एआई
एआई पहले ही स्वास्थ्य शोध के कई क्षेत्रों में बदलाव ला रही है। बड़ी मात्रा में स्वास्थ्य आंकड़ों का विश्लेषण कम समय में किया जा सकता है। शोधकर्ता एआई की मदद से नई तकनीकों और स्वास्थ्य उपकरणों के विकास तथा उनके मूल्यांकन में भी तेजी ला सकते हैं।
लेकिन तकनीक के तेजी से बढ़ते इस्तेमाल के साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है कि एआई से जुड़े शोध में लोगों की निजी जानकारी कितनी सुरक्षित है। इसके अलावा एआई प्रणाली में पक्षपात होने, गलत परिणाम आने और किसी नुकसान की स्थिति में जिम्मेदारी तय करने जैसी चुनौतियां भी सामने आती हैं।
पारदर्शिता और समानता पर जोर
डब्ल्यूएचओ ने एआई स्वास्थ्य शोध से जुड़े कई नैतिक मुद्दों पर ध्यान दिया है। इनमें पारदर्शिता, पक्षपात, निष्पक्षता, जवाबदेही और निजता प्रमुख हैं। एआई आधारित उपकरणों को तेजी से लागू करने से होने वाले संभावित नुकसान पर भी सावधानी बरतने की जरूरत बताई गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा नैतिक निगरानी व्यवस्था हमेशा एआई से जुड़े नए और जटिल जोखिमों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती। इसलिए स्वास्थ्य शोध के साथ नैतिक समीक्षा और निगरानी की व्यवस्था को भी समय के अनुसार मजबूत करना जरूरी है।
एआई शोध की तीन प्रमुख श्रेणियां
डब्ल्यूएचओ ने एआई से जुड़े स्वास्थ्य शोध को तीन व्यापक श्रेणियों में रखा है। पहली श्रेणी में ऐसे स्वास्थ्य शोध शामिल हैं, जिनमें आंकड़ों के इस्तेमाल और विश्लेषण के लिए एआई का उपयोग किया जाता है। दूसरी श्रेणी में एआई उपकरणों और तकनीकों के साथ किए जाने वाले शोध आते हैं।
तीसरी श्रेणी में स्वास्थ्य से जुड़े ऐसे शोध शामिल हैं, जिनका मुख्य विषय खुद एआई उपकरण और तकनीक होते हैं। डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि इन सभी प्रकार के शोध में अध्ययन की शुरुआत से लेकर उसके इस्तेमाल तक नैतिक निगरानी जरूरी है।
शोधकर्ताओं और समितियों की जिम्मेदारी
डब्ल्यूएचओ के अनुसार, रिसर्च एथिक्स कमेटियां शोध में शामिल लोगों के अधिकारों और सुरक्षा की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेंगी। लेकिन एआई से जुड़े जटिल अध्ययनों की समीक्षा के लिए इन समितियों को अतिरिक्त विशेषज्ञता, प्रशिक्षण और संसाधनों की जरूरत पड़ सकती है।
शोधकर्ताओं को भी शुरुआत में ही संभावित नैतिक जोखिमों की पहचान करनी होगी। उन्हें इन जोखिमों को कम करने के उपाय करने और एआई के इस्तेमाल के बारे में स्पष्ट तथा पारदर्शी जानकारी देने की जरूरत होगी।
कई संस्थाओं को मिलकर करना होगा काम
एआई स्वास्थ्य शोध की निगरानी केवल शोधकर्ताओं और नैतिकता समितियों की जिम्मेदारी नहीं होगी। डब्ल्यूएचओ ने शोध को वित्तीय मदद देने वाली संस्थाओं, वैज्ञानिक पत्रिकाओं, डेटा से जुड़े संस्थानों, पेशेवर संगठनों और नियामक एजेंसियों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया है।
डब्ल्यूएचओ के डिजिटल स्वास्थ्य और एआई विभाग के निदेशक डॉ. एलेन लैब्रिक के अनुसार, एआई के प्रभावी नियमन के लिए अलग-अलग क्षेत्रों और संस्थानों के बीच सहयोग जरूरी है। तेजी से बदलती तकनीक के साथ निगरानी व्यवस्था भी लचीली और प्रमाण आधारित होनी चाहिए।
विकासशील देशों के लिए भी जरूरी अवसर
रिपोर्ट में कम और मध्यम आय वाले देशों पर भी विशेष ध्यान दिया गया है। एआई इन देशों की स्वास्थ्य संबंधी कई पुरानी समस्याओं से निपटने में मदद कर सकती है। लेकिन वर्तमान में एआई शोध और तकनीक का बड़ा हिस्सा उच्च आय वाले देशों में केंद्रित है।
डब्ल्यूएचओ ने कहा कि विकासशील देशों में स्थानीय नेतृत्व, तकनीकी क्षमता और शोध में भागीदारी को बढ़ाना जरूरी है। इससे एआई के लाभ अधिक समान रूप से पहुंच सकेंगे और नई असमानताओं का खतरा कम किया जा सकेगा।
सुरक्षित और जिम्मेदार एआई की जरूरत
डब्ल्यूएचओ ने रिपोर्ट को एआई के दौर में स्वास्थ्य शोध की नैतिक निगरानी मजबूत करने की दिशा में एक शुरुआत बताया है। तकनीक तेजी से बदल रही है, इसलिए भविष्य में नए मानकों, दिशानिर्देशों और नियामक व्यवस्थाओं की जरूरत पड़ सकती है।
स्वास्थ्य शोध में एआई वैज्ञानिक प्रगति को तेज कर सकती है, लेकिन इसके इस्तेमाल के साथ मानव गरिमा, अधिकारों, गोपनीयता, समानता और सुरक्षा की रक्षा करना भी जरूरी है। डब्ल्यूएचओ का जोर ऐसी व्यवस्था बनाने पर है, जिसमें एआई से होने वाला स्वास्थ्य लाभ सुरक्षित, भरोसेमंद और सभी के लिए समान रूप से उपयोगी हो।