भारत में करोड़ों लोगों के लिए पैदल चलना रोजमर्रा की मजबूरी है, लेकिन सुरक्षित चल पाना अब तक उनकी किस्मत पर निर्भर रहा है। कहीं फुटपाथ ही नहीं, कहीं अतिक्रमण का कब्जा है, तो कहीं तेज रफ्तार गाड़ियों के बीच जान जोखिम में डालकर सड़क पार करनी पड़ती है।
अब सुप्रीम कोर्ट ने इस हकीकत को केवल यातायात की समस्या नहीं, बल्कि संविधान, गरिमा और जीवन के अधिकार से जुड़ा प्रश्न मानते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि सुरक्षित और बाधा रहित फुटपाथ पर चलना हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, जिसे मोटर वाहनों की सुविधा से पहले संरक्षण मिलना चाहिए।
इसके साथ ही सरकारों को हर सड़क के किनारे सुरक्षित फुटपाथ उपलब्ध कराने, उनका रखरखाव करने और अतिक्रमण से मुक्त रखने की संवैधानिक जिम्मेदारी सौंपी गई है। इतना ही नहीं, यदि इस अधिकार का उल्लंघन होता है तो नागरिक अदालत से मुआवजा और अन्य कानूनी राहत भी मांग सकते हैं।
यह फैसला केवल सड़कों के डिजाइन को नहीं, बल्कि शासन की प्राथमिकताओं को बदलने वाला है। यह उन करोड़ों भारतीयों के सम्मान, सुरक्षा और बराबरी के अधिकार की संवैधानिक घोषणा है, जिनकी आवाज अब तक ट्रैफिक के शोर में दब जाती थी।
हर दिन करोड़ों भारतीय अपनी जान हथेली पर रखकर सड़कों पर उतरते हैं। वैसे भी हमारे शहरों में पैदल चलना किसी जानलेवा चुनौती से कम नहीं, कहीं फुटपाथ का नामोनिशान नहीं, कहीं हैं भी तो उन पर रसूखदारों का कब्जा है, तो कहीं पैदल चलने की जगह गाड़ियां सीना ताने दौड़ रही हैं। यह एक ऐसी कड़वी हकीकत है जिससे आम आदमी हर दिन रूबरू होता है।
लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने बरसों की इस लाचारी को केवल यातायात की समस्या नहीं, बल्कि सीधे इंसान के आत्मसम्मान और संविधान से जुड़ा सवाल मानते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। यह एक ऐसा फैसला है जो भारतीय सड़कों की पूरी परिभाषा को हमेशा के लिए बदल देगा।
फैसले में दो-टूक कहा गया है कि सुरक्षित और साफ फुटपाथ पर चलना कोई सरकारी कृपा नहीं, बल्कि हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। इतना ही नहीं, पैदल यात्रियों का यह अधिकार मोटर वाहनों की आवाजाही से पहले माना जाएगा। अब इस अधिकार की रक्षा करना सरकारों की संवैधानिक जिम्मेदारी होगी।
पीठ ने स्पष्ट किया कि सड़कों पर पैदल चलने वालों का अधिकार मोटर वाहनों की आवाजाही से पहले है और सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे हर सड़क के किनारे सुरक्षित, चिन्हित और अच्छी तरह से रखरखाव वाले फुटपाथ उपलब्ध कराएं।
अब सड़क पर सबसे पहले पैदल यात्री का अधिकार
19 जून, 2026 को न्यायमूर्ति पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल शरच्चंद्र चंदुरकर की पीठ ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि पैदल चलने का अधिकार संविधान के भाग-3 में दिए गए मौलिक अधिकारों का हिस्सा है। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(डी) (आवागमन की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 19(1)(ए), 19(1)(बी), 19(1)(सी) तथा अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) से जुड़ा है।
निर्णय में यह भी रेखांकित किया गया कि चलने के अधिकार का अर्थ केवल सड़क पर चलना नहीं, बल्कि सुरक्षित और स्पष्ट रूप से चिन्हित फुटपाथ पर चलने का अधिकार भी है। इसलिए पैदल यात्रियों के अधिकार को मोटर वाहनों की सुविधा से ऊपर रखा जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि सड़क है तो उसके साथ सुरक्षित फुटपाथ होना भी अनिवार्य है। यह जिम्मेदारी शहरी विकास प्राधिकरणों, नगर निगमों, नगरपालिकाओं और पंचायतों की है। इन संस्थाओं को फुटपाथों का निर्माण, रखरखाव और अतिक्रमण से सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी, क्योंकि पैदल चलना सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन का अभिन्न हिस्सा है।
अधिकारों के उल्लंघन पर मिलेगी कानूनी राहत
फैसले की एक बड़ी विशेषता यह है कि यदि किसी नागरिक को सुरक्षित फुटपाथ उपलब्ध नहीं कराया जाता या उसके इस अधिकार का उल्लंघन होता है, तो वह संविधान और अन्य कानूनों के तहत अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।
ऐसे मामलों में नागरिक मुआवजा और अन्य कानूनी राहत पाने का भी हकदार होगा। यह अधिकार मोटर वाहन अधिनियम, 1988 के तहत मिलने वाले उपायों से अलग और स्वतंत्र होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 कभी भी पैदल चलने के मौलिक अधिकार को मान्यता देने वाला कानून नहीं रहा। अदालत ने कहा कि कई मामलों में यह कानून पैदल यात्रियों के अधिकारों को कमजोर करने वाला साबित हुआ है। सुरक्षित और आरामदायक फुटपाथों का अभाव तथा जहां फुटपाथ हैं, वहां भी उनका मोटर वाहनों के हित में इस्तेमाल होना लंबे समय से एक गंभीर सामाजिक और शहरी समस्या रही है।
पैदल यात्रियों के लिए अलग कानून बनाने की जरूरत
अदालत का मानना है कि मौजूदा समय में देश में ऐसा कोई विशेष कानून नहीं है जो फुटपाथ पर चलने के अधिकार को स्पष्ट रूप से मान्यता देता हो।
इसलिए अब समय आ गया है कि संसद एक व्यापक कानून बनाए, जिसमें इस अधिकार को कानूनी दर्जा दिया जाए, संबंधित सरकारी एजेंसियों की जिम्मेदारियां तय हों, उल्लंघन पर जल्द से जल्द न्याय मिले और इस अधिकार के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए एक स्वतंत्र नियामक संस्था भी बनाई जाए।
इस फैसले की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह आम जनता को लाचार नहीं छोड़ता। अगर किसी शहर या गांव में फुटपाथ की बदहाली के कारण किसी नागरिक के चलने के अधिकार का हनन होता है, तो वह सीधे अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। नागरिक न सिर्फ अपने हक के लिए लड़ सकते हैं, बल्कि लापरवाह प्रशासन और अधिकारियों से भारी मुआवजा भी वसूल सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को सिर्फ कागजी नहीं रहने दिया। अदालत ने अपने फैसले की प्रति आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय तथा सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय को भेजने का निर्देश दिया है, ताकि वे इस संबंध में आवश्यक कानूनी ढांचा तैयार कर सकें। साथ ही, विधि आयोग से भी कहा गया है कि वह पैदल यात्रियों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए नए कानून का मसौदा तैयार करने, जिम्मेदार संस्थाओं की पहचान करने और प्रभावी कानूनी उपाय सुझाने पर विचार करे।
करोड़ों कदमों को मिला संविधान का सहारा
अदालत ने यह भी कहा कि संवैधानिक अदालतों का दायित्व है कि वे इस मौलिक अधिकार की स्पष्ट रूप से रक्षा करें और यह सुनिश्चित करें कि नागरिकों को न्याय पाने के लिए प्रभावी संवैधानिक और कानूनी उपाय उपलब्ध हों।
सच कहें तो हर सड़क की असली पहचान उस पर दौड़ती गाड़ियों से नहीं, बल्कि सुरक्षित चलते इंसानों से होती है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन करोड़ों कदमों को आवाज देता है जो अब तक ट्रैफिक के शोर में दब जाते थे।
यह उस मां के लिए भरोसा है जो हर सुबह अपने बच्चे को स्कूल भेजते समय उसकी सुरक्षित वापसी की दुआ करती है। उस बुजुर्ग के लिए सुकून है जो खुली हवा में कुछ कदम चलने का हक चाहता है और उस मजदूर के लिए न्याय है जो हर शाम थके कदमों से पैदल घर लौटता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया है पैदल चलना मजबूरी नहीं, हर नागरिक का मौलिक अधिकार है।