हिमाचल प्रदेश के सेराज विधानसभा क्षेत्र में वन संरक्षण कानून के कथित उल्लंघन के तहत 55 सड़कें बनाए जाने का मामला सामने आने के बाद हाईकोर्ट ने वन क्षेत्रों में सड़क निर्माण और डामरीकरण पर अगले आदेश तक रोक बरकरार रखी है।
अदालत में न्याय मित्र देवेन खन्ना की ओर से पेश सूची के मुताबिक, ज्यादातर मामलों में संबंधित एजेंसियों के जरूरी प्रस्ताव प्राप्त होने से पहले ही सड़कें बना दी गई थीं। पांच सड़कों का निर्माण अधूरा है, जबकि करीब 10.16 किलोमीटर लंबी एक सड़क का काम स्वीकृत होने के बावजूद जारी है।
मामले में वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत दी गई मंजूरियों और उनसे वनवासियों को होने वाले वास्तविक लाभ पर भी सवाल उठाए गए हैं। अदालत के समक्ष पेश दस्तावेजों में सेराज क्षेत्र में 16 हेलीपैड होने का उल्लेख भी किया गया।
सड़क निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर हरे पेड़ों की कटाई और इससे वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताई गई है। हाईकोर्ट ने 8 अक्टूबर, 2026 को अपने 17 अगस्त के आदेश को दोहराते हुए वन क्षेत्रों में निर्माण और डामरीकरण पर रोक जारी रखी। मामले की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को होगी।
यह मामला केवल सड़कों के निर्माण और मंजूरियों तक सीमित नहीं है। यह जंगलों के संरक्षण, वन्यजीवों के सुरक्षित आवास और वनवासियों के अधिकारों से भी जुड़ा है। अब अहम सवाल यह है कि विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाने से पहले वन कानूनों और जरूरी मंजूरी प्रक्रियाओं का कितना पालन किया गया।
जंगल केवल पेड़ों का समूह मात्र नहीं, बल्कि वन्यजीवों का घर और प्रकृति के संतुलन का आधार भी हैं। लेकिन जब विकास के नाम पर जंगलों के भीतर सड़कें बनाई जाती हैं और हरे-भरे पेड़ काटे जाते हैं, तो इसका असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने वन क्षेत्रों में सड़क निर्माण से जुड़े ऐसे ही एक मामले में सख्त रुख अपनाया है।
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने 8 अक्टूबर, 2026 को अपने पहले के आदेश को दोहराते हुए स्पष्ट किया कि अगले आदेश तक वन क्षेत्रों में सड़कों का निर्माण और उन पर डामर नहीं डाला जाएगा। अदालत ने यह निर्देश 17 अगस्त, 2026 को दिए आदेश के संदर्भ में दोहराया। इस मामले में अब अगली सुनवाई 2 दिसंबर, 2026 को होगी।
मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायमूर्ति बिपिन चंद्र नेगी की पीठ ने यह निर्देश तब दिए, जब मामले में न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) देवेन खन्ना ने अदालत के सामने एक विस्तृत सूची पेश की।
इस लिस्ट के अनुसार, हिमाचल प्रदेश के सेराज विधानसभा क्षेत्र के नाचन वन मंडल में कथित तौर पर वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 का उल्लंघन कर 55 सड़कें बनाई गई हैं।
अदालत में पेश दस्तावेजों से पता चला कि इनमें से अधिकांश सड़कों के मामले में संबंधित एजेंसी की ओर से जरूरी प्रस्ताव तक प्राप्त नहीं हुआ था, जबकि सड़कें पहले ही बनाई जा चुकी थीं। यानी, जिन प्रक्रियाओं के तहत वन भूमि का इस्तेमाल करने की अनुमति ली जानी चाहिए थी, उनका पालन किए बिना ही निर्माण किए जाने के आरोप सामने आए हैं।
लिस्ट के अनुसार, क्रम संख्या 51 से 55 तक दर्ज सड़कों का काम पूरा नहीं हुआ था। वहीं, क्रम संख्या 11 पर दर्ज बगसैड़–राहिधार–कथियाली–धरवार–धनसाल सड़क, जिसकी लंबाई 10.165 किलोमीटर है, का काम स्वीकृत होने के बावजूद प्रगति पर बताया गया।
न्याय मित्र ने सेराज विधानसभा क्षेत्र में 19 अगस्त, 2026 के बाद वन अधिकार अधिनियम के तहत स्वीकृत सड़कों की एक अन्य सूची भी अदालत में पेश की है।
मामले में अदालत के सामने यह मुद्दा भी उठाया गया कि वन भूमि पर सड़क निर्माण की अनुमति देने के लिए किन कानूनी प्रावधानों का पालन जरूरी है और किस तरह वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत कथित तौर पर गलत तरीके से अनुमतियां दी गईं। याचिका में सवाल उठाया गया है कि इन मंजूरियों का लाभ वास्तव में वनवासियों या जंगलों को मिल रहा है या नहीं।
दस्तावेजों में सेराज क्षेत्र में 16 हेलीपैड होने का भी उल्लेख है। वन क्षेत्रों में इस तरह की सुविधाओं से वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवास पर पड़ने वाले संभावित असर का आकलन किए जाने की जरूरत बताई गई है। सड़क निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर हरे पेड़ों की कटाई का मुद्दा भी सामने आया है।
अब इस मामले में हाईकोर्ट की अगली सुनवाई 2 दिसंबर को होगी। तब तक वन क्षेत्रों में सड़क निर्माण और डामरीकरण पर रोक जारी रहेगी। देखा जाए तो इस मामले का महत्व केवल सड़कों के निर्माण तक सीमित नहीं।
यह सवाल भी उतना ही अहम है कि विकास से जुड़ी योजनाएं बनाते समय जंगलों, वन्यजीवों और वनवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनों का कितना पालन किया जा रहा है।