मध्य प्रदेश के डिंडोरी जिले के सोनतीरथ गांव के जंगल की खामोशी अचानक पेड़ों पर चलने वाली कुल्हाड़ी की आवाज से भंग होती है। इस घने जंगल में चारों ओर से आती इन आवाजों को सुनकर एक बार तो लगा कि शायद पेड़ों की अवैध कटाई करने वाला कोई गिरोह सक्रिय है। जंगल में कंधे पर कुल्हाड़ी रखकर सुस्ता रहे 70 साल के मजदूर सुकाल ने हमारी यह गलतफहमी मिनटों में दूर कर दी। उन्होंने जानकारी दी कि वह पेड़ काट नहीं रहे हैं बल्कि उनकी पहचान कर रहे हैं। सुकाल कुल्हाड़ी की मदद से साल के पेड़ के तने को छीलकर आयताकार शक्ल दे रहे हैं। इस काम में उन्हें जरा भी खुशी नहीं मिल रही है। माथे पर शिकन लिए सुकाल ने केवल इतना ही कहा, “पूरा जंगल रो रहा है। यह बहुत तेजी से सूख रहा है।”
सुकाल का इशारा साल (शोरिया रोबस्टा) के पेड़ों पर लगने वाले तना छेदक कीट (साल बोरर अथवा होप्लोसिराम्बिक्स स्पाईनिकॉर्निस) की तरफ था। यह साल के जंगल को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाला कीट है। लगभग 30 साल पहले (1996-2001) इसने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के जंगलों में जमकर तबाही मचाई थी। सुकाल के साथ करीब 35 मजदूर थे जो साल के उन पेड़ों को चिन्हित कर रहे थे जिन पर साल बोरर का प्रभाव था। इन्हीं में से एक 45 वर्षीय मजदूर सोहनलाल बैगा ने पेड़ के चारों तरफ फैले क्रीमी बुरादे की ओर उंगली से इशारा करते हुए बताया, “ये सभी पेड़ साल बोरर से सूख रहे हैं।”
सोनतीरथ गांव के इस घने जंगल में 30 नवंबर 2025 से पेड़ों की पहचान और उनकी मार्किंग का काम शुरू हुआ है। एक मजदूर रोजाना साल बोरर प्रभावित करीब 100 पेड़ों की छाल निकालकर उन्हें मार्किंग के लिए तैयार कर रहा है। इस काम में लगे मजदूर एकसुर में स्वीकार करते हैं कि इस वर्ष साल बोरर ने जंगल को काफी नुकसान पहुंचाया है। उनके अनुसार, पिछले 4-5 वर्षों से साल बोरर का हल्का असर था, लेकिन इस वर्ष हालात ज्यादा ही खराब हैं। उन्होंने माना कि मार्किंग किए गए पेड़ों को काटा जा सकता है क्योंकि साल बोरर पेड़ों का रस चूसकर सुखा देता है और इन पेड़ों को काटना ही पड़ता है।
वन विभाग ने गांव के इस 119.25 हेक्टेयर जंगल को एससीआई (सिलेक्शन कम इंप्रूवमेंट) कूप संख्या 776 में सूचीबद्ध किया है। 3 दिसंबर 2025 तक केवल 3 हेक्टेयर में ही मार्किंग का काम हुआ था और तब तक साल बोरर प्रभावित 3,113 पेड़ों को गिना गया था। मजदूरों ने बताया कि पूरे 119.25 हेक्टेयर जंगल की मार्किंग में एक महीना तक लग सकता है और केवल इसी गांव के जंगल में प्रभावित पेड़ों की संख्या 1 लाख तक पहुंच सकती है। हालांकि 14 नवंबर को मार्किंग के काम में लगे एक मजदूर ने डाउन टू अर्थ को बताया कि बाद में पहुंचे वन विभाग के अधिकारियों ने साल बोरर प्रभावित बहुत से पेड़ों को गणना से बाहर कर दिया है। इसके बावजूद सोनतीरथ के 119.25 हेक्टेयर के जंगल में साल बोरर प्रभावित पेड़ों की संख्या करीब 5,000 पहुंच गई।
साल के पेड़ पारिस्थितिकी और आर्थिक दृष्टि से सागौन के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण वृक्ष है। जबलपुर स्थित उष्णकटिबंधीय वन अनुसंधान संस्थान (टीएफआरआई) के एक दस्तावेज के अनुसार, भारत में साल वन लगभग 1,05,790 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। इसमें 28,800 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के हिस्से में है। यह पूरे देश में साल वन क्षेत्र का 25 प्रतिशत है (देखें, साल का फैलाव)।
वनों में पाए जाने वाले अन्य वृक्षों की तुलना में साल में सबसे अधिक कीट पाए जाते हैं। इनमें लगने वाली करीब 339 कीट प्रजातियों की पहचान की गई है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के साल वनों में वृक्ष की सभी अवस्थाओं में साल बोरर का सर्वाधिक प्रकोप पाया जाता है जो वृक्ष को बहुत ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। यह कीट साल के तने को भेदकर उसे खाता और अंदर सुरंग बनाकर रहता है।
टीएफआरआई के एक वैज्ञानिक ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर बताया कि इस कीट ने बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है। उन्हें मध्य प्रदेश के डिंडोरी और अमरकंटक के अलावा छत्तीसगढ़ के चिल्पी, गरियाबंद और नारायणपुर क्षेत्र में इसके फैलने की सूचनाएं मिल रही हैं। डिंडोरी के डिवीजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (डीएफओ) पुनीत सोनकर डाउन टू अर्थ से बातचीत में स्वीकार करते हैं कि पिछले दो वर्षों से साल बोरर प्रभावित पेड़ों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
पिछले वर्ष भी साल बोरर प्रभावित लगभग 5,000 से 6,000 पेड़ों को चिन्हित किया गया था। उनका कहना है, “इस वर्ष अभी चिन्हांकन की प्रक्रिया जारी है। जब आंकड़े आ जाएंगे, तब हम निश्चित रूप से कह पाएंगे कि कितने प्रतिशत की वृद्धि हुई है। सोनकर के अनुसार, “स्थानीय स्टाफ और ग्रामीण पूर्व करंजिया रेंज, पश्चिम करंजिया रेंज और दक्षिण समनापुर क्षेत्र में इसके प्रभाव की बात कर रहे हैं।
हालांकि जब तक आंकड़े नहीं आ जाते, तब तक इसे गंभीर या चिंताजनक नहीं कहा जा सकता। लेकिन हां, साल के पेड़ मध्यम स्तर पर प्रभावित हैं। पेड़ों के नीचे लगातार बुरादा मिल रहा है।” वह आगे कहते हैं, “पूर्व और पश्चिम करंजिया, दक्षिण समनापुर, उत्तरी समनापुर, बजाग, अमरपुर, डिंडोरी और शाहपुर रेंज में साल के जंगल अधिक हैं। इसलिए सभी जगह गणना की जा रही है।” साल बोरर का पहला संकेत गांवों से मिलता है। ये कीट घरों की रोशनी के पास जमा होने लगते हैं। सोनकर के अनुसार, इससे हमें पता चलता है कि संख्या बढ़ रही है। पांच साल पहले ऐसा नहीं होता था। इसका मतलब है कि संख्या में वृद्धि हो रही है।
डिंडोरी जिले के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल में 40.45 प्रतिशत हिस्सेदारी अधिसूचित वन क्षेत्र की है। जिले के 80,263 हेक्टेयर क्षेत्र में साल के जंगल हैं। इनमें 76,230.60 हेक्टेयर में साल के सघन वन और 4,032.42 हेक्टेयर में विरल वन हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि साल बोरर में वन क्षेत्र को तहस-नहस करने की क्षमता है। अगर शीघ्र ही इसके फैलाव को नियंत्रित नहीं किया गया तो यह बहुत जल्द साल वनों के बड़े हिस्से को अपनी जद में ले सकता है।
जबलपुर स्थित राज्य वन अनुसंधान संस्थान (एसएफआरआई) में वरिष्ठ शोध अधिकारी (एसआरओ) एवं एंटोमॉलोजिस्ट (कीटविज्ञानी) उदय होमकर ने डाउन टू अर्थ से हुई लंबी बातचीत में माना कि इस बार हमें सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि संक्रमण अन्य वर्षों की तुलना में थोड़ा ज्यादा है। उन्हें अमरकंटक से रिपोर्ट मिली है। अन्य स्थानों का आकलन अभी पूरा नहीं हुआ है (दिसंबर के दूसरे सप्ताह तक आकलन रिपोर्ट नहीं मिली थी)। उन्होंने कहा, “जब हम अमरकंटक गए तो देखा कि कुछ पुराने क्षेत्र जहां पहले भी संक्रमण था, उसके आसपास के क्षेत्रों में इसका ज्यादा प्रभाव पड़ा है, इसलिए हम कह सकते हैं कि फिलहाल संक्रमण स्थानीय है।”
साल बोरर कीट कोलिओप्टेरा ऑर्डर के सिरंबीसिडी कुल का है। यह वानिकी में शायद सबसे अधिक हानिकारक कीट है। यह फिलीपीन्स एवं बोनिर्यो-सुमात्रा से लेकर भारत तक पाया जाता है। साल बोरर भारत में मुख्य रूप से साल वृक्ष के ऊपर ही अपना जीवन चक्र पूरा करता है। साल के अतिरिक्त यह कीट कुछ अन्य वृक्षों जैसे लामवाली, रबर, पारासेरिया, पेंटाक्मी सुआविस, आसाम साल और सोरिया आवटूजा पर भी अपना जीवन चक्र पूरा करता है और इन वृक्षों को भी हानि पहुंचाता है। यह कीट गहरे भूरे रंग का लंबे एंटीने वाला बीटल है जिसकी लंबाई 3 सेंटीमीटर से 7 सेंटीमीटर तक होती है। वयस्क कीट साल वृक्ष के अंदर रहते हुए जुलाई के महीने में वर्षा प्रारंभ होने पर निकलता है। अन्य कीड़ों की भांति इनके जीवन चक्र में मुख्य रूप से 4 अवस्थाएं- अंडा, लार्वा, प्यूपा और वयस्क होती हैं (देखें, साल बोरर का जीवन चक्र)।
साल बोरर कीट मुख्य रूप से साल की लकड़ियों, गिरे व खड़े वृक्षों में प्राकृतिक रूप से पाए जाते हैं। यदि गिरे वृक्षों को साल वन क्षेत्रों से न हटाया जाए एवं इस कीट के अनुकूल वातावरण बना रहे तो इनकी संख्या बढ़ने लगती है। निरंतर दो-तीन वर्षों के अनुकूल वातावरण में यह इतनी बढ़ जाती है कि प्रकोप महामारी के रूप में दिखने लगता है। 1996-2001 में अविभाजित मध्य प्रदेश में फैली इस महामारी ने 35 लाख से अधिक पेड़ों को प्रभावित किया था। इसकी शुरुआत 1992-93 में हो गई थी लेकिन लापरवाही और समय पर रोकथाम के उपाय न होने पर इसने विकराल महामारी का रूप धारण कर लिया था।
डिंडोरी की कार्य आयोजना (वर्किंग प्लान) 2014-24 के अनुसार, साल बोरर देश के विभिन्न क्षेत्रों में साल के वनों में पाया जाता है। मध्यप्रदेश के बालाघाट, मंडला एवं डिंडोरी क्षेत्र, छत्तीसगढ़ के कवर्धा, धमतरी के साथ ही उत्तराखंड के देहरादून, हल्द्वानी और हिमाचल प्रदेश के नालागढ़ और नाहन में इसके वन हैं। इसके अतिरिक्त बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्से में भी साल के वन हैं जहां साल बोरर का आक्रमण लगभग प्रतिवर्ष छुटपुट रूप में होता रहता है। यदि कुल साल वृक्षों की संख्या के एक प्रतिशत से अधिक वृक्ष साल बोरर कीट के प्रभाव में मरने लगते हैं तो उस क्षेत्र को साल बोरर संक्रमण प्रभावित क्षेत्र माना जाता है।
देश के विभिन्न भागों में साल बोरर के आक्रमण की जानकारी पिछले 125 वर्षों से मिलती रही है। सबसे पहले इस कीड़े को वर्ष 1889 में देखा और पहचाना गया और साल वृक्षों में अधिक हानि होने का प्रमुख कारण इस कीड़े को माना गया। तब से आज तक विभिन्न प्रदेशों में साल बोरर के 25 एपिडेमिक (प्रकोप) दर्ज हैं। कुछ अध्ययन 21 एपिडेमिक की बात कहते हैं। इंडियन जर्नल ऑफ एंटोमॉलोजी में 2018 में प्रकाशित नितिन कुलकर्णी, आनंद दास और सुभाष चंदर के अध्ययन में कहा गया है कि साल बोरर को कीट के रूप में पहचाने जाने के बाद से 1977 तक कुल 87 छोटे-बड़े एपिडेमिक सामने आ चुके हैं।
वर्किंग प्लान के अनुसार, मध्यप्रदेश में वर्ष 1905 में बालाघाट के बैहर क्षेत्र के साल वनों में इस कीड़े का प्रकोप सर्वप्रथम देखा गया। वर्ष 1916 में देहरादनू वन मंडल के थानों क्षेत्र के साल वनों में भी इस कीड़े का प्रकोप हुआ। मध्य प्रदेश के मंडला क्षेत्र के आसपास के वनों में 1923-28 के दौरान करीब 70 लाख साल वृक्ष इस कीट से प्रभावित हुए थे। इसके बाद 1950-55, 1959-62, 1979-82 और 1996-2001 की अवधि में यह प्रकोप साल वनों में महामारी के रूप में पाया गया। 1996-2001 के दौरान मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ क्षेत्र में इसके प्रकोप से 3 लाख हेक्टेयर साल वन में लगभग 31.40 लाख साल वृक्ष प्रभावित हुए थे।
1990 के दशक में फैली यह महामारी डिंडोरी वनमंडल के परिक्षेत्र बजाग एवं करंजिया के साल वनों से फैलनी शुरू हुई और धीरे-धीरे तत्कालीन मंडला जिले (तब डिंडोरी मंडला का हिस्सा था) में अधिकांश साल वनों तथा निकटवर्ती जिलों के वनों में फैल गई। वर्किंग प्लान में कहा गया है कि इसका प्रभाव बढ़ने की प्रथम सूचना जून, 1993 में डिंडोरी वनमंडल में मिली। वर्ष 1994-1995 में डिंडोरी वनमंडल में प्रभाव स्पष्ट होने लगा, किंतु कुछ क्षेत्रों में ही संक्रमण के चिह्न दिखाई पड़े थे। डिंडोरी वनमंडल के कुछ क्षेत्रों में प्रभावित वृक्षों की गणना की गई जिसमें 2,646 वृक्ष प्रभावित पाए गए। वर्ष 1996-1997 में मंडला जिले में प्रभावित क्षेत्र में संक्रमित वृक्षों की गणना कराई गई। प्रभावित वृक्षों की गणना का कार्य जनवरी 1997 से जून 1997 तक किया गया। 30 जून 1997 तक 7,11,059 वृक्ष डिंडोरी जिले में प्रभावित हो चुके थे।
वर्ष 1997-98 में वर्ष 1996-97 की अपेक्षा साल बोरर कीटों तथा उनसे प्रभावित वृक्षों की संख्या में लगभग 3 गुना वृद्धि हुई और प्रभावित पेड़ों की संख्या 22 लाख से ऊपर पहुंच गई। 1995 से 2000 तक साल बोरर के प्रकोप से डिंडोरी वनमंडल का 1,47,279 हेक्टेयर रकबा प्रभावित हुआ। मध्य प्रदेश के वन विभाग में डिप्टी वन संरक्षक रहे यू प्रकाशम के अध्ययन “हार्टवुड बोरर एपिडेमिक्स इन सेंट्रल इंडिया: ए थ्रेट टू शोरिया रोबस्टा फॉरेस्ट इकोसिस्टम” के अनुसार, अकेले डिंडोरी और मंडला फॉरेस्ट डिवीजन में 25.6 लाख प्रभावित पेड़ों में से 15.90 लाख पेड़ों को काटा गया।
यू प्रकाशम के अध्ययन के अनुसार, बड़े पैमाने पर वृक्ष कटान के विरुद्ध विभिन्न वर्गों द्वारा आपत्तियां व्यक्त की गईं तथा इस विषय पर जबलपुर उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई। इसके परिणामस्वरूप भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय (एमओईएफ) ने दिसंबर 1997 में एक समिति का गठन किया, जिसमें केंद्र एवं राज्य सरकारों के वरिष्ठ वन अधिकारी, वन कीटविज्ञानी तथा अनुसंधान संस्थानों के विशेषज्ञ शामिल थे। इस समिति का नेतृत्व भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई), देहरादून के महानिदेशक ने किया।
समिति का उद्देश्य महामारी के कारणों, क्षति की सीमा तथा उपचारात्मक उपायों का अध्ययन करना था। प्रभावित क्षेत्रों का निरीक्षण करने के बाद समिति ने मंत्रालय को अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें श्रेणी 1-5 तक के प्रभावित वृक्षों को हटाने की संस्तुति की गई। पेड़ काटने की समिति की सिफारिश पर कुछ लोगों ने सवाल उठाया तो मंत्रालय ने एक टास्क फोर्स तथा एक स्टीयरिंग समिति का गठन किया। टास्क फोर्स ने जनवरी 1998 में अपनी अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें 14 सदस्यीय समिति के बहुमत ने श्रेणी 1-5 तक के सभी वृक्षों को काटने एवं हटाने के पक्ष में अनुशंसा की। हालांकि कुछ लोगों को मत था कि केवल श्रेणी 1 एवं 2 के वृक्षों को ही काटा जाना चाहिए। टास्क फोर्स की संस्तुतियों पर विचार करने के बाद मंत्रालय ने श्रेणी 1, 2, 3 और 6 के वृक्षों की कटाई की अनुमति प्रदान की।
23 फरवरी 1998 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सभी कटान कार्यों पर रोक लगा दी। सुनवाई के पश्चात सर्वोच्च न्यायालय ने प्रभावित वृक्षों की श्रेणी-वार चिन्हांकन का आदेश दिया तथा टीएफआरआई, जबलपुर के निदेशक के नेतृत्व में एक समिति का गठन किया। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने श्रेणी 1, 2 और 6 के प्रभावित वृक्षों की कटाई की अनुमति प्रदान की। साल बोरर प्रभावित वृक्षों को 1-8 श्रेणी में वर्गीकृत किया जाता है।
श्रेणी 1 का वृक्ष पूरी तरह सूखा होता है, श्रेणी 2 वृक्ष की पत्तियां सूखकर भूरे रंग की हो जाती हैं, श्रेणी 3 वृक्ष का ऊपरी हिस्सा अथवा शिखर सूखने लगता है, श्रेणी 4 के वृक्ष के मुख्य तने के पास बुरादे का 7 सेमी से अधिक का ढेर होता है लेकिन शिखर पर नई शाखांए हरी रहती हैं, श्रेणी 5 के वृक्ष शिखर का आधा भाग जीवित तथा शेष भाग मुरझाया रहता है, श्रेणी 6 वृक्ष का केवल ठूंठ मिलता है और उसके चारों ओर बुरादे का ढेर रहता है, श्रेणी 7 के वृक्ष का शिखर जीवित और हरा रहता है और तने से प्रचुर मात्रा में राल निकलती है और श्रेणी 8 का वृक्ष स्वस्थ होता है।
मध्य प्रदेश के सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) राम प्रसाद के अनुसार, 1996-2001 की अवधि में भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) और भारतीय वन प्रबंध संस्थान (आईआईएफएम) जैसे संस्थानों के वानिकी वैज्ञानिकों और वन अधिकारियों के बीच उपयुक्त नियंत्रण उपायों को लेकर अलग-अलग मत सामने आए थे। उस समय लाखों पेड़ प्रभावित हुए थे और संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए लगभग एक लाख पेड़ों को काटना पड़ा था।
डिंडोरी के गाढ़ासरई में रहने वाले डॉक्टर विजय चौरसिया 1990 के दशक में फैली महामारी को याद करते हुए बताते हैं कि उन दिनों यहां बना डिपो एशिया महाद्वीप का सबसे बड़ा डिपो बन गया था। कोई व्यापारी साल बोरर प्रभावित लकड़ी खरीदने को तैयार नहीं था। उन्होंने आगे बताया कि 1997 में डिंडोरी में साल का इतना घना जंगल था कि हमेशा अंधेरा रहता था। साल बोरर ने उस घने जंगल को काफी हद तक कम कर दिया। वह बताते हैं कि उस समय काटे गए पेड़ों की अब तक भरपाई नहीं हो पाई है।
1996-2001 कालखंड के बाद साल बोरर के प्रकोप की लगातार सूचनाएं मिलती रही हैं। टीएफआरआई के फॉरेस्ट एंटोमोलाॅजी डिवीजन से सेवानिवृत्त वैज्ञानिक एन रॉयचौधरी के अध्ययन के अनुसार, 2006 में छत्तीसगढ़ के बस्तर फॉरेस्ट डिवीजन के कॉलेंग रेंज के रिजर्व फॉरेस्ट में 116 पेड़ और अवर्गीकृत वनों में 118 पेड़ साल बोरर से प्रभाव से सूख गए।
2009-2010 में डिंडोरी वनमंडल के पूर्व करंजिया रेंज में लगभग 21.17 हेक्टेयर में 292 वृक्ष साल बोरर से प्रभावित पाए गए। 2013-14 में छत्तीसगढ़ के जगदलपुर सरगीपाल काष्ठागार में 1,493 पेड़ साल बोरर प्रभावित पेड़ मिले। 2013 में ही डिंडोरी वनमंडल के पूर्व करंजिया, दक्षिण समनापुर और बजाग फॉरेस्ट रेंज में 699 ऐसे पेड़ मिले। 2014 में मंडला के कान्हा टाइगर रिजर्व के कोर और बफर जोन में कुल 22,997 साल बोरर प्रभावित पेड़ों को देखा गया। 2014 में ही छत्तीसगढ़ के चिल्पी और कवर्धा रेंज में 8,862 और आमाबाड़ा रेंज में 724 पेड़ों पर साल बोरर का प्रभाव देखा गया।
वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि यदि किसी इकाई क्षेत्रफल में साल बोरर से ग्रसित वृक्ष एक प्रतिशत से अधिक रहते हैं तो उसे महामारी की शुरुआती अवस्था मानी जाती है। साल बोरर के मौजूदा प्रकोप को देखते हुए प्रतीत होता है कि संभवत: महामारी का चक्र लौट रहा है। मध्य प्रदेश के सेवानिवृत्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) और 1990 के दशक में पेड़ काटने की सिफारिश करने वाली केंद्र सरकार द्वारा गठित समिति की रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करने से मना करने वाले तात्कालीन आईआईएफएम निदेशक राम प्रसाद का मानना है कि साल बोरर के प्रकोप से जुड़ी रिपोर्टें लगभग तीन दशक बाद फिर से उभर रहे एक बड़े पारिस्थितिक संकट को दर्शाती हैं (देखें, महामारी का अंतराल हो सकता है कम,)।
इस आशंका को आंकड़े भी मजबूती देते हैं। डिंडोरी क्षेत्र के करंजिया रेंज में प्रकोप का इतिहास रहा है। इस साल भी यहां साल बोरर का गंभीर प्रकोप है। हाल ही में साल बोरर प्रभावित क्षेत्र का दौरा करने वाले टीएफआरआई के वैज्ञानिकों ने पाया कि सर्वेक्षित क्षेत्र में साल बोरर का प्रकोप 30 से 35 प्रतिशत के आसपास है।
इसी तरह डिंडोरी के लगे मध्य प्रदेश के अन्य जिले अनूपपुर के अंतर्गत आने वाले अमरकंटक में भी शुरुआती सर्वेक्षण में साल बोरर का प्रभाव करीब 6.5 प्रतिशत आंका गया है। अमरकंटक के रेंजर वीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने डाउन टू अर्थ को बताया कि शुरुआती सर्वे में जंगल के सभी 47 कंपार्टमेंट्स में 1 हेक्टेयर के सैंपल प्लॉट पर सर्वे किया गया था। इसमें साल के 6.5 प्रतिशत पेड़ों पर साल बोरर का प्रभाव देखा गया। 8,525 हेक्टेयर के जंगल वाले अमरकंटक में लगभग 40 लाख साल के पेड़ हैं।
अमरकंटक के उमर गोहान गांव में वन सुरक्षा समिति के अध्यक्ष रमेश कुमार परस्ते कहते हैं कि गांव में करीब 1,400 हेक्टेयर का जंगल है। इनमें करीब 80 प्रतिशत साल के वृक्ष हैं। उनके अनुमान के अनुसार, 25 से 30 प्रतिशत पेड़ इस वर्ष साल बोरर से प्रभावित नजर आ रहे हैं। उन्होंने डाउन टू अर्थ को बताया कि एक एकड़ के जंगल में कम से कम 300 पेड़ों पर साल बोरर का असर जरूर होगा।
वीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव के अनुसार, अमरकंटक का जलस्तर साल के पेड़ों के कारण ही बना हुआ है और मां नर्मदा की कृपा से यहां का वातावरण अच्छा रहता है। यहां के जंगल में साल बोरर यदा-कदा देखने को मिलता था। लेकिन हाल ही में कुछ पेड़ लगातार सूखे हुए मिले हैं।
उनके अनुसार, “मीडिया और संत समाज के आवाज उठाने पर हमें ऊपर से सर्वेक्षण का निर्देश मिला। रिपोर्ट देने पर वैज्ञानिकों को दौरा करने भेजा गया। एसएफआरआई टीम को सैंपल प्लॉट का निरीक्षण कराया गया। शुरू में हमने हर कंपार्टमेंट के एक हेक्टेयर प्लॉट में सर्वेक्षण किया। वैज्ञानिकों ने पूरे कंपार्टमेंट 5-5 हेक्टेयर में रैंडम सर्वेक्षण की सलाह दी है। वह मानते हैं, “साल बोरर की मात्रा इस वर्ष बढ़ी है, लेकिन यह प्राकृतिक है। इसका कुछ न कुछ ट्रीटमेंट करना पड़ेगा। इसे पूरा समाप्त करने का यथासंभव प्रयास किया जाएगा।”
वैज्ञानिकों और वन विभाग के जुड़े अधिकारियों का मानना है कि महामारी के रूप में एक नियमित अंतराल पर साल बोरर का प्रकोप देखा जाता है। डिंडोरी वन विभाग की कार्य आयोजना 2014-24 के अनुसार, “क्षेत्र में औसतन 30 वर्ष के चक्र में साल बोरर का वृहद प्रकोप देखा गया है जिसमें मुख्यतः परिवक्व गोलाई वर्ग के वृक्ष प्रभावित होते हैं। मौजूदा कार्य आयोजना की अवधि के अंतिम वर्षों में साल बोरर के प्रकोप होने की आशंका है।”
अमरकंटक स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (आईजीएनटीयू) के पर्यावरण विज्ञान विभाग में सहायक प्रोफेसर शिवाजी चौधरी के अनुसार, संक्रमित पेड़ों की संख्या तेजी से बढ़ रही है जो चिंता की बात है। वह इसे क्षेत्र विशेष की महामारी मान रहे हैं। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वन विभाग के अधिकारी डिंडोरी में प्रभावित पेड़ों की संख्या मात्र 5,000 बता रहे हैं, लेकिन इस आंकड़े पर भरोसा नहीं किया जा सकता, क्योंकि जिस पैमाने पर डाउन टू अर्थ ने प्रभावित पेड़ों को देखा और सोनतीरथ सहित अन्य गांव में हालात समझे, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि यह संख्या कम आंकी गई है।
स्थानीय लोग भी इस आंकड़े को वास्तविक स्थिति से बहुत कम बता रहे हैं। वैज्ञानिक मानते हैं कि यह कीट पूरे जंगल को नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखता है। अभी इनकी इल्लियां पेड़ के तने के अंदर हैं, वे कितनी संख्या में हैं, यह कहना मुश्किल है। इस अवस्था में कीट को नियंत्रित करने का कोई उपाय नहीं है। वन विभाग अभी वेट एंड वॉच की रणनीति अपना रहा है। उसका अगला कदम 2025 के मॉनसून पर उठेगा।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस वर्ष साल बोरर के पनपने की बड़ी वजह अधिक बारिश, अनुकूल तापमान और नमी हो सकती है। उदय होमकर के अनुसार, इस वर्ष हम देख रहे हैं कि बारिश लंबे समय तक होती रही है। इस बारिश का असर साल बोरर के संक्रमण पर पड़ा है। उनके अनुसार, “लगभग 80 प्रतिशत आर्द्रता अंडे देने के लिए सबसे अनुकूल होती है।”
कार्य आयोजना के अनुसार, साल बोरर कीड़े की संख्या में वृद्धि मुख्य रूप से जलवायु पर निर्भर करती है। वायुमंडल की आर्द्रता यदि 55 प्रतिशत के लगभग होती है तो मादा कीड़े द्वारा अंडे नहीं दिए जाते। इसी प्रकार यदि आर्द्रता 100 प्रतिशत होती है तो भी अंडे देने की संख्या में कमी पाई जाती है। परन्तु यदि आर्द्रता 91 प्रतिशत होती है तो मादा कीड़ा 465 अंडे तक दे सकती है।
जुलाई एवं अगस्त के महीने में आर्द्रता 91 प्रतिशत के आसपास बनी रही तो मादा कीडों द्वारा बहुत अधिक संख्या में अंडे दिए जाएंगे जो लार्वा में परिवर्तित होंगे। वर्ष 1995-96 तथा 1996-97 में लगभग सम्पूर्ण प्रदेश में अच्छी वर्षा हुई थी। 1997 में जुलाई के महीने में मंडला जिले में वर्ष 1996 की अपेक्षा अधिक आर्द्रता रही है। इन परिस्थितियों ने साल बोरर को महामारी के रूप में फैलने में मदद की। 2025 के मॉनसून में अनूपपुर, डिंडोरी और मंडला में सामान्य से क्रमश: 4,7 और 33 प्रतिशत अधिक बारिश हुई। वहीं मॉनसून के बाद इन जिलों में क्रमश: 127, 36 और 19 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई, जिससे कीट के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन गईं।
अमरकंटक के सेवानिवृत्त सब डिवीजनल ऑफिसर (एसडीओ) ओजी गोस्वामी भी मानते हैं कि मॉनसून में जून-जुलाई के आसपास साल बोरर के कीट उड़ने लगते हैं। यदि नमी अधिक हो, धूप कम पहुंचे और जंगल बहुत घना हो तो साल बोरर की संख्या बढ़ जाती है, खासकर शुद्ध साल के जंगलों में क्योंकि कीट का पूरा जीवन-चक्र पेड़ पर ही निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि 2025 में मॉनसून सामान्य से अधिक रहा है। पोस्ट मॉनसून भी बहुत बारिश हुई है। यह कीट के फैलाव का एक कारण हो सकता है।
साल बोरर को नियंत्रित करने के लिए फिलहाल एक ही तरीका चलन में है, जिसे वैज्ञानिक “ट्री ट्रैप ऑपरेशन” कहते हैं। इस ऑपरेशन के अंतर्गत वयस्क कीड़े पकड़ने का कार्य किया जाता है ताकि वह आगे प्रजनन न कर सके। जून-जुलाई के महीने में वर्षा शुरू होने के बाद जब कीड़े वृक्ष से बाहर निकलते हैं, तो इनको पकड़ने के लिए साल के 60-90 सेमी गोलाई वाले वृक्षों को काटा जाता है और 2-3 मीटर लम्बे लट्ठे बनाए जाते हैं। इन लट्ठाें के दोनों किनारों पर 1-1 फीट भाग के छाल को पीट दिया जाता है, जिससे साल की छाल में उपस्थित रस बाहर निकल आता है।
साल बोरर कीड़े इस रस की ओर बड़ी शीघ्रता से आकर्षित होते हैं और यह देख जाता है कि एक किलोमीटर तक की दूरी से उड़कर साल बोरर कीड़े इन लट्ठाें में आकर छाल का रस चूसने लगते हैं। रस चूसकर साल बोरर मदमस्त हो जाते हैं और उड़ नहीं पाते। इस दौरान इन्हें आसानी से मार दिया जाता है। आक्रमण सामान्य है, तो 2 हेक्टेयर क्षेत्र में एक ट्रैप लगाना पर्याप्त होगा, परंतु यदि आक्रमण अधिक है तो 2 हेक्टेयर क्षेत्र में एक से अधिक ट्रैप की आवश्यकता होती है।
इस प्रचलित विधि की बड़ी खामी यह है कि इसमें बड़े पैमाने पर स्वस्थ पेड़ों काे काटा जाता है। 1996-2001 की अवधि में इसका भारी विरोध हुआ था। डिंडोरी की कार्य आयोजना 2014-24 के अनुसार, वर्ष 1963-64 से 1977-78 के मध्य इस ऑपरेशन के दौरान 2,36,984 वृक्ष काटे गए थे। साल बोरर कीड़े रात्रि में प्रकाश के द्वारा भी आकर्षित होते हैं। 1996-1997 और 1997-1998 में डिंडोरी जिले के ग्रामीणों द्वारा प्रकाश की सहायता से काफी संख्या में कीड़े पकड़े गए थे।
साल बोरर के बार-बार होने वाले प्रकोपों के बावजूद इसके प्रभावी निवारक और उपचारात्मक उपायों के रूप में अब तक कोई ठोस सफलता नहीं मिल पाई है। जैविक नियंत्रण के उपाय और रासायनिक विधि से कीट नियंत्रण के तरीके जमीन पर नहीं उतर पाए हैं। डिंडोरी में 4,000 की आबादी वाले चौरादादर गांव के भरत पडवार चेताते हैं कि अगर साल बोरर का प्रकोप इसी तरह रहा, तो आने वाले 4–5 वर्षों में साल का पूरा जंगल खत्म हो जाएगा।
ओजी गोस्वामी ने अमरकंटक में साल बोरर के प्रकोप के मद्देनजर नीतिगत सुझावों का एक दस्तावेज तैयार किया है। इसमें उन्होंने कहा है कि अत्यधिक संक्रमित श्रेणी 1 के पेड़ों को काटकर तुरंत जंगल से हटाया जाए ताकि संक्रमण अधिक न फैले। कटे पेड़ों को जंगल में छोड़ने के बजाय कम से कम 5 किलोमीटर दूर निर्धारित डिस्पोजल जोन में ले जाकर नष्ट किया जाए।
उन्होंने सलाह दी है कि मॉनसून से पूर्व चयनित पेड़ों से ट्रैप ट्री ऑपरेशन चलाया जा और इन पेड़ों को संक्रमित होने के बाद समय से हटा दिया जाए ताकि कीट का प्रजनन चक्र टूट सके। जैविक उपायों के तौर पर कठफोड़वा, माइनर और प्रमुख पैरासिटॉइड्स के संरक्षण के लिए बायोशील्ड जोन विकसित किए जांए और एनटीएफपी आधारित समुदायों को जैविक नियंत्रण का हिस्सा बनाया जाए।
दीर्घकालिक उपाय के रूप में अत्यधिक क्षतिग्रस्त क्षेत्र में मिश्रित प्रजाति के पेड़ जैसे पीपल, बरगद, जामुन, तेंदू, करंज और अर्जुन लगाए जाएं क्योंकि साल बोरर का प्रभाव मिश्रित वनों पर कम होता है। गोस्वामी के अनुसार, प्रशासनिक सुधारों के रूप में कमिश्नर की अध्यक्षता में साल बोरर क्राइस टास्क फोर्स का गठन हो और डीएफओ, टीएफआरआई, जन प्रतिनिधि और स्थानीय गैर सरकारी संगठनों को इसमें शामिल किया जाए। बीमारी का अर्ली वार्निंग सिस्टम के तहत एआई (आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) आधारित फॉरेस्ट हेल्थ मॉनिटनिंग ऐप विकसित किया जाए जहां फील्ड स्टाफ छाल, राल और छिद्रों की फोटो अपलोड कर सकें। साथ ही आग के अलर्ट की तरह ही साल बोरर के लिए भी मोबाइल आधारित अलर्ट से संक्रमण जल्दी पकड़ा जा सकता है।
गोस्वामी अंत में कहते हैं, “साल बोरर केवल वन्यजीव समस्या नहीं बल्कि यह पूरी पारिस्थितिकी, जल स्रोतों, जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत के लिए खतरा है। इसका समाधान वैज्ञानिक हस्तक्षेप, सामुदायिक भागीदारी और सख्त प्रशासनिक कार्रवाई के संयुक्त मॉडल से ही संभव है।”