भारत में हर दिन करीब 19 हजार टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, लेकिन इसे संभालने की वास्तविक लागत और कंपनियों से मिलने वाली ईपीआर राशि के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है।
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की नई रिपोर्ट बताती है कि ‘प्रदूषण फैलाने वाला भुगतान करे’ के सिद्धांत के बावजूद प्लास्टिक कचरे का बड़ा आर्थिक बोझ अब भी नगर निकायों और जनता पर पड़ रहा है।
खासकर मल्टी-लेयर और लचीली प्लास्टिक पैकेजिंग को इकट्ठा करने, छांटने और रिसाइकिल करने की लागत कई शहरों में ईपीआर से मिलने वाली राशि से कहीं अधिक है।
धर्मशाला में श्रेणी-III प्लास्टिक की लागत 9.15 रुपये प्रति किलो तक पहुंचती है, जबकि ईपीआर क्रेडिट से केवल 1 से 1.25 रुपये प्रति किलो की भरपाई हो रही है।
सीएसई ने क्षेत्र के हिसाब से ईपीआर दर तय करने, कचरा पैदा होने वाले इलाकों तक फंड पहुंचाने और कचरा बीनने वाले असंगठित श्रमिकों को व्यवस्था में शामिल करने की सिफारिश की है।
रिपोर्ट का साफ संदेश है—सिर्फ ईपीआर प्रमाणपत्र खरीदना पर्याप्त नहीं, कंपनियों को अपने प्लास्टिक कचरे की वास्तविक सामाजिक और आर्थिक कीमत भी चुकानी होगी।
हर दिन जब हम दूध का पैकेट फाड़ते, चिप्स का रैपर फेंकते या ऑनलाइन डिलीवरी से मिला सामान खोलते हैं, तो शायद ही कभी प्लास्टिक से बनी उसकी पैकेजिंग के बारे में सोचते हैं। यह वो प्लास्टिक है जो बाजार से हमारे हाथ में आते ही कचरे में पहुंच जाता है।
लेकिन इस प्लास्टिक को कचरे से अलग करने, ढोने, छांटने और रिसाइकिल करने का खर्च खत्म नहीं होता। सवाल यह है कि इस खर्च की जिम्मेदारी आखिर किसकी है—उत्पाद बनाने वाली कंपनियों की या नगर निकायों और आम जनता की जो उत्पाद खरीदती है?
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) ने अपनी नई रिपोर्ट में इसी सवाल पर प्रकाश डाला है।
'पॉलिसी, प्रैक्टिस, एंड प्लास्टिक: कॉस्ट ऑफ मैनेजिंग प्लास्टिक वेस्ट इन इंडियन सिटीज' नामक इस रिपोर्ट के मुताबिक कायदे से 'प्रदूषण फैलाने वाला भुगतान करे' के सिद्धांत के तहत इस कचरे का खर्च उन कंपनियों को उठाना चाहिए जो प्लास्टिक पैकेजिंग में अपना सामान बेचती हैं।
हालांकि जमीनी हकीकत यह है कि इस नाकामी का वित्तीय बोझ हमारी नगरपालिकाएं और वे गुमनाम सफाई कर्मचारी उठा रहे हैं, जो दिन-रात कूड़ा बीनते हैं।
अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती कंपनियां
यह सही है कि सरकार ने 'एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी' (ईपीआर) नियम बनाया है। इसका मतलब है कि उत्पादक कंपनियों को अपने प्लास्टिक कचरे को रीसायकल करने के लिए वित्तीय मदद देनी होगी।
लेकिन सीएसई की रिपोर्ट बताती है कि भारत में प्लास्टिक पैकेजिंग से पैदा कचरे को संभालने की वास्तविक लागत और ईपीआर के तहत मिलने वाले पैसे के बीच एक बड़ा गैप है। इसका सीधा असर नगर निकायों पर पड़ रहा है, जिन्हें उस खर्च का एक बड़ा हिस्सा अपने संसाधनों से उठाना पड़ रहा है।
हर दिन पैदा हो रहा करीब 19 हजार टन प्लास्टिक कचरा
भारत में हर दिन करीब 1,58,619 टन म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट यानी ठोस कचरा पैदा होता है। इसमें से 10 से 12 फीसदी यानी करीब 19,000 टन प्लास्टिक कचरा होता है।
इसका एक बड़ा हिस्सा प्लास्टिक पैकेजिंग का है, जिसकी उम्र बहुत छोटी होती है और जो इस्तेमाल के तुरंत बाद कचरे में पहुंच जाती है।
इस कचरे को इकठ्ठा करने, अलग करने, परिवहन, प्रोसेस और रिसाइकिल करने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से स्थानीय कचरा प्रबंधन व्यवस्था पर आती है। सीएसई का कहना है कि ईपीआर का उद्देश्य इसी आर्थिक जिम्मेदारी को उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों तक पहुंचाना है। लेकिन मौजूदा व्यवस्था में यह जिम्मेदारी पूरी तरह वहां तक नहीं पहुंच पा रही।
सीएसई के म्यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट एंड सर्कुलर इकोनॉमी कार्यक्रम के निदेशक अतिन बिस्वास के मुताबिक, ईपीआर के तहत पर्याप्त लागत की भरपाई न होने से नगर निकायों पर वह आर्थिक बोझ पड़ रहा है, जिसे ‘'प्रदूषण फैलाने वाला भुगतान करे' के सिद्धांत के तहत उत्पादकों पर होना चाहिए।
क्या है समस्या
समस्या उन प्लास्टिक पैकेजिंग में ज्यादा गंभीर है जिन्हें इकट्ठा करना और रिसाइकिल करना कठिन है। देश में रजिस्टर्ड प्लास्टिक पैकेजिंग का करीब 66 फीसदी हिस्सा लचीले प्लास्टिक का है। इसमें मल्टी-लेयर पैकेजिंग भी शामिल है, जिसे रिसाइकिल करना अपेक्षाकृत मुश्किल होता है।
प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियमों के तहत उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों को 2026-27 तक 50 से 70 फीसदी रिसाइक्लिंग का लक्ष्य पूरा करना है। लेकिन सीएसई रिपोर्ट के मुताबिक, देश में इस तरह के प्लास्टिक को संभालने के लिए जरूरी संग्रह, छंटाई और रिसाइक्लिंग क्षमता अभी पर्याप्त नहीं है।
सीएसई में कार्यक्रम प्रबंधक सिद्धार्थ घनश्याम सिंह का कहना है, "मौजूदा ईपीआर व्यवस्था में आर्थिक लाभ का बड़ा हिस्सा प्लास्टिक वेस्ट प्रोसेसिंग और अंतिम चरण की सुविधाओं तक पहुंचता है, जबकि कचरे को इकट्ठा करने और अलग करने वाली बुनियादी व्यवस्था को पर्याप्त वित्तीय सहायता नहीं मिलती।"
इस पूरी व्यवस्था की रीढ़ बने कचरा एकत्र करने वाले, असंगठित क्षेत्र के सफाईकर्मी, नगर निकाय और मैटेरियल रिकवरी सेंटर आज भी सीमित संसाधनों में काम कर रहे हैं।
सीएसई रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ है कि प्लास्टिक कचरे को संभालने की लागत हर शहर में एक जैसी नहीं है। भौगोलिक स्थिति, सड़क और परिवहन व्यवस्था, बुनियादी ढांचे तथा कचरे की मात्रा के कारण खर्च में बड़ा अंतर आता है।
मसलन, इंदौर में श्रेणी-III यानी मल्टी-लेयर प्लास्टिक पैकेजिंग को संभालने की लागत करीब 2.35 से 3.67 रुपए प्रति किलो है। वहीं श्री विजय पुरम (पूर्व में पोर्ट ब्लेयर) में यही लागत 9.87 से 11.83 रुपए प्रति किलो तक पहुंच जाती है।
धर्मशाला में ईपीआर से महज 13 से 14 फीसदी हिस्से की ही रही है भरपाई
हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में स्थिति और भी चिंताजनक है। सीएसई के अनुसार, यहां श्रेणी-III प्लास्टिक को संभालने की लागत 9.15 रुपये प्रति किलो तक पहुंच सकती है, जबकि बाजार आधारित ईपीआर क्रेडिट दर करीब 1 से 1.25 रुपए प्रति किलो है।
यानी इसकी वास्तविक लागत के महज 13 से 14 फीसदी हिस्से की ही भरपाई हो पा रही है। ऐसे में बाकी खर्च नगरपालिकाओं को अपनी जेब से (यानी जनता के टैक्स से मिले पैसे से) भरना पड़ता है।
सीएसई और अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं डॉक्टर त्रिभुवन सिंह बिष्ट के मुताबिक, यह अंतर अलग-अलग शहरों की भौगोलिक परिस्थितियों, बुनियादी ढांचे और परिवहन लागत को दर्शाता है। उनका कहना है कि विकसित कचरा प्रबंधन व्यवस्था वाले शहरों में भी मौजूदा ईपीआर दरें लचीले और मल्टी-लेयर प्लास्टिक को संभालने की पूरी लागत नहीं चुका पा रही हैं।
सीएसई के मुताबिक, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की व्यवस्था में पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति से जुड़े ईपीआर प्रमाणपत्रों की कीमत एक तय दायरे में रखी गई है। इन प्रमाणपत्रों का कारोबार लागू पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति के 30 से 100 फीसदी के बीच हो सकता है। लेकिन अध्ययन के अनुसार, बाजार में इनकी कीमत अक्सर इस दायरे के निचले स्तर के आसपास रहती है। इससे प्रमाणपत्र की कीमत और प्लास्टिक कचरा प्रबंधन की वास्तविक लागत के बीच लगातार अंतर बना रहता है।
इसका असर उन शहरों में ज्यादा पड़ता है जहां परिवहन महंगा है, बुनियादी ढांचा कमजोर या भौगोलिक परिस्थितियां कठिन हैं। ऐसे में एक समान ईपीआर दर हर जगह वास्तविक लागत को नहीं दर्शाती।
आखिर जिम्मेदारी किसकी?
सीएसई के अनुसार, मौजूदा ईपीआर व्यवस्था में सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि कानून और नीतियां, उत्पादक की जिम्मेदारी तय करते हैं, लेकिन कचरे को संभालने का वास्तविक खर्च अब भी काफी हद तक नगर निकायों को उठाना पड़ रहा है।
इसका मतलब है कि बाजार में प्लास्टिक पैकेजिंग बेचने की जिम्मेदारी और उसके कचरे की कीमत चुकाने की जिम्मेदारी के बीच अभी भी दूरी बनी हुई है।
रिपोर्ट ने दिए कई सुझाव
सीएसई ने इस समस्या से निपटने के लिए वेटेड अडजस्टमेंट फैक्टर (डब्ल्यूएएफ) लागू करने का सुझाव दिया है। इसके तहत अलग-अलग क्षेत्रों की भौगोलिक और परिचालन लागत के आधार पर ईपीआर दरों में बदलाव किया जा सकेगा। जहां परिवहन, भूगोल या बुनियादी ढांचे के कारण खर्च अधिक है, वहां ईपीआर फंड भी अधिक होना चाहिए।
मतलब पहाड़ों, तटीय क्षेत्रों और दूर-दराज के शहरों में कचरा उठाने की लागत मैदानी इलाकों से ज्यादा होती है। इसलिए ईपीआर फंड भी जगह के हिसाब से मिलना चाहिए।
इसी तरह रिपोर्ट में स्थानीयकृत ईपीआर व्यवस्था का भी सुझाव दिया गया है। इसके तहत उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों को उन क्षेत्रों से एक निश्चित हिस्से के ईपीआर प्रमाणपत्र खरीदने की बाध्यता हो, जहां उनके उत्पाद वास्तव में इस्तेमाल होकर कचरे में बदलते हैं। इससे उस इलाके में पैसा पहुंच सकेगा जहां प्लास्टिक कचरा पैदा हो रहा है और उसे संभालने की वास्तविक लागत उठाई जा रही है।
इससे कंपनियां जिस शहर या राज्य में अपना सामान बेचती हैं, उन्हें अपने ईपीआर फंड का एक तय हिस्सा उसी इलाके के कचरा प्रबंधन पर खर्च करना होगा।
कचरा बीनने वालों को व्यवस्था का हिस्सा बनाना जरूरी
सीएसई ने मुश्किल से रिसाइकिल होने वाली पैकेजिंग के लिए भी मजबूत आर्थिक प्रोत्साहन देने की जरूरत बताई है। यदि ऐसे प्लास्टिक को बाजार में लाने की लागत अधिक तय की जाए तो कंपनियों के पास आसानी से रिसाइकिल होने वाली और बेहतर पर्यावरण अनुकूल पैकेजिंग को अपनाने का आर्थिक कारण भी होगा।
सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण का कहना है, "भारत की प्लास्टिक कचरा प्रबंधन व्यवस्था काफी हद तक उन कमजोर और मेहनतकश सफाईकर्मियों के कन्धों पर टिकी है, जो दिन-रात कूड़ा बीनने, छांटने और रीसायकल योग्य कचरा जुटाने का काम करते हैं।“
“ऐसे में जब तक असंगठित क्षेत्र से जुड़े इन श्रमिकों को ईपीआर के दायरे में लाकर सीधी वित्तीय मदद नहीं दी जाएगी, तब तक प्लास्टिक प्रबंधन का यह पूरा ढांचा अधूरा और अन्यायपूर्ण ही रहेगा।"
सफलता सिर्फ प्रमाणपत्र खरीदने से नहीं मिलेगी
सीएसई का कहना है कि ईपीआर की सफलता को केवल इस आधार पर नहीं मापा जाना चाहिए कि कंपनियों ने कितने प्रमाणपत्र खरीदे या तय लक्ष्य पूरा किया।
असल सवाल यह होना चाहिए कि वास्तव में कितना प्लास्टिक कचरा इकट्ठा हुआ, कितना अलग किया गया, कितना प्रोसेस और रिसाइकिल हुआ और इस काम से जुड़े लोगों को उचित भुगतान मिला या नहीं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बाजार में प्लास्टिक लाने वाला ही उसके कचरे की वास्तविक कीमत भी चुकाए। आखिर पैकेजिंग कुछ मिनटों में बेकार हो सकती है, लेकिन उसके कचरे को संभालने की जिम्मेदारी सालों तक बनी रहती है।