जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए उठने वाली आवाजें दुनिया के कई हिस्सों में लगातार हिंसा और दमन का सामना कर रही हैं।
ग्लोबल विटनेस की नई रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में दुनिया भर में कम से कम 124 भूमि और पर्यावरण रक्षकों की हत्या की गई। 2012 से अब तक हत्या या गुमशुदगी के 2,375 मामले दर्ज किए जा चुके हैं।
2025 में मारे गए लोगों में तीन-चौथाई से अधिक छोटे किसान, स्वदेशी और अफ्रीकी मूल के समुदायों से थे। अकेले 44 स्वदेशी लोगों की हत्या हुई।
लैटिन अमेरिका सबसे घातक क्षेत्र रहा, जहां दुनिया की 85 फीसदी हत्याएं दर्ज की गईं। कोलंबिया में 39 और ब्राजील में 26 रक्षक मारे गए—दोनों देशों में हुई हत्याएं वैश्विक कुल का करीब 52 फीसदी हैं।
यह भी खुलासा हुआ है कि आधे से अधिक हत्याओं का संबंध भूमि विवादों से था, जबकि खनन, लकड़ी कटाई और कृषि कारोबार भी कई मामलों से जुड़े रहे।
एशिया में हत्या के साथ-साथ आपराधिक मुकदमों, धमकियों और बदनाम करने के अभियानों का खतरा बढ़ा है। फिलीपींस में 12 और भारत में एक पर्यावरण रक्षक की हत्या दर्ज हुई। रिपोर्ट बताती है कि पर्यावरण की रक्षा की यह लड़ाई केवल प्रकृति की नहीं, बल्कि जमीन, आजीविका, संस्कृति और समुदायों के अस्तित्व की भी लड़ाई है।
जल, जंगल, जमीन, पर्यावरण और अपने समुदाय के अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाने की कीमत दुनिया के कई हिस्सों में बेहद भारी पड़ रही है। बेहद दुःख की बात है कि 2025 में ही दुनिया भर में इसके खिलाफ आवाज उठाने पर कम से कम 124 पर्यावरण रक्षकों की हत्या कर दी गई। इनमें से 85 फीसदी हत्याएं दक्षिण अमेरिका में हुई हैं।
वहीं, एशिया में भले ही हत्याओं की संख्या कम रही, लेकिन पर्यावरण रक्षकों के खिलाफ आपराधिक मुकदमों, धमकियों और बदनाम करने के अभियानों में बढ़ोतरी चिंता का विषय बनी हुई है। मतलब कि किसी न किसी रूप में पर्यावरण को बचाने के लिए उठाई जाने वाली आवाजों को दबाने की कोशिश की जा रही है।
यह जानकारी पर्यावरण को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे संस्थान ग्लोबल विटनेस की नई रिपोर्ट 'कलेक्टिव पावर: द स्ट्रगल फॉर प्रोटेक्शन फॉर लैंड एंड एनवायरमेंटल डिफेंडर्स' में सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2012 से 2025 के बीच दुनिया भर में पर्यावरण रक्षकों की हत्या और गुमशुदगी के कम से कम 2,375 मामले सामने आए हैं। इनमें 2025 में हुई 124 हत्याएं भी शामिल हैं।
रिपोर्ट बताती है कि 2025 में मारे गए पर्यावरण और भूमि रक्षकों में तीन-चौथाई से अधिक छोटे किसान, स्वदेशी और अफ्रीकी मूल के समुदायों से जुड़े थे। इनमें 44 वनवासी, जिनमें सात स्थानीय गार्ड भी शामिल थे। यानी अपनी जमीन, जंगल और समुदाय की रक्षा करने वालों को ही सबसे ज्यादा निशाना बनाया गया।
कोलंबिया और ब्राजील में आधी से ज्यादा हत्याएं
पर्यावरण और भूमि अधिकारों की रक्षा करने वालों के लिए 2025 में दक्षिण अमेरिका सबसे खतरनाक क्षेत्र रहा। दुनिया में दर्ज 124 हत्याओं में से 85 फीसदी यानी करीब 105 मामले इसी क्षेत्र में सामने आए।
ग्लोबल विटनेस के अनुसार, 2012 से रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद से हर साल दक्षिण अमेरिका पर्यावरण रक्षकों के लिए दुनिया का सबसे घातक क्षेत्र बना हुआ है।
इस हिंसा की भयावह तस्वीर कोलंबिया और ब्राजील में साफ दिखती है। अकेले कोलंबिया में 39 और ब्राजील में 26 पर्यावरण रक्षकों की हत्या हुई। यानी दुनिया भर में मारे गए हर दो पर्यावरण रक्षकों में से करीब एक की जान इन दो देशों में गई।
मतलब कि दुनिया में पर्यावरण रक्षकों की हत्या के जितने भी मामले सामने आए उनमें से 52 फीसदी इन्हीं दो देशों में दर्ज किए गए हैं।
भारत में भी एक पर्यावरण रक्षक ने गंवाई है जान
इतना ही नहीं कोलंबिया लगातार चौथे वर्ष दुनिया का ऐसा देश रहा जहां सबसे अधिक हत्याएं दर्ज की गईं। वहां मारे गए लोगों में करीब आधे स्वदेशी समुदायों से थे। ब्राजील में 2025 में 26 हत्याएं हुईं, जो पिछले वर्ष की तुलना में दोगुने से भी अधिक हैं। इसके अलावा होंडुरास और फिलीपींस में 12-12, मैक्सिको में 10 और ग्वाटेमाला में आठ हत्याएं दर्ज की गईं।
इसके बाद पेरू में चार, इक्वेडोर और निकारागुआ में तीन-तीन, तंजानिया में दो और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, फ्रांस, भारत, इंडोनेशिया और तुर्की में एक-एक पर्यावरण रक्षकों की हत्या की गई है।
जमीन के विवाद सबसे बड़ा कारण
रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि, 2025 में मारे गए पर्यावरण रक्षकों में आधे से ज्यादा मामले जमीन से जुड़े विवादों के थे। जमीन पर अधिकार, उसके इस्तेमाल और प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जे की लड़ाई इन लोगों के लिए जानलेवा साबित हुई।
खनन और दूसरे उत्खनन से जुड़े हितों का संबंध 11 हत्याओं से था, जबकि लकड़ी काटने से जुड़े मामलों में आठ और कृषि कारोबार से जुड़े मामलों में छह पर्यावरण रक्षकों की हत्या हुई। वहीं, दुनिया भर में हुई एक-तिहाई से ज्यादा हत्याओं में संगठित अपराध या भाड़े के हत्यारों की भूमिका सामने आई।
ये आंकड़े बताते हैं कि पर्यावरण की रक्षा केवल पेड़-पौधों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा का सवाल नहीं है। कई समुदायों के लिए यह उनकी जमीन, आजीविका, संस्कृति और अस्तित्व से जुड़ा संघर्ष है।
एशिया में हत्या से ज्यादा बढ़ रही आपराधिक कार्रवाई
एशिया में भी पर्यावरण और भूमि अधिकार रक्षकों पर गंभीर खतरा बना हुआ है। 2025 में दुनिया भर में दर्ज हत्याओं में करीब 12 फीसदी मामले एशिया के थे।
फिलीपींस में 12 पर्यावरण रक्षक मारे गए, जबकि भारत, इंडोनेशिया और तुर्की में एक-एक हत्या दर्ज की गई। फिलीपींस लगातार 13वें साल एशिया का सबसे घातक देश रहा। 2025 में वहां दर्ज 12 हत्याएं दक्षिण अमेरिका के बाहर किसी एक देश में दर्ज सबसे अधिक मामले थे।
ग्लोबल विटनेस के मुताबिक, फिलीपींस में मारे गए 12 रक्षकों में से पांच की हत्या के मामलों में देश की सेना की संभावित भूमिका सामने आई है। रिपोर्ट ने इन मामलों को ग्रामीण क्षेत्रों में चल रहे विद्रोह-विरोधी अभियानों और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से जुड़ी परियोजनाओं के संदर्भ में दर्ज किया है। यानी इन मामलों में सरकार की भूमिका भी संदेह के घेरे से बाहर नहीं है।
हालांकि, पर्यावरण रक्षकों के खिलाफ खतरा केवल हत्या तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, कानूनी उत्पीड़न, आपराधिक मुकदमे, धमकी और सोशल मीडिया पर बदनाम करने के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं।
फिलीपींस में मानवाधिकार संगठन 'करापातन' के मुताबिक, 2025 में 227 कार्यकर्ताओं के खिलाफ आतंकवाद से जुड़े आरोप लगाए गए। संगठन ने इसे 'रेड टैगिंग' यानी कार्यकर्ताओं को झूठे तौर पर कम्युनिस्ट विद्रोहियों या आतंकवादियों से जोड़ने की प्रक्रिया से जोड़ा है।
फिलीपींस के पर्यावरण संगठन कलीकासन पीपुल्स नेटवर्क फॉर द एनवायरमेंट (कलीकासन पीएनई) का कहना है कि देश में प्राकृतिक संसाधनों तक कॉरपोरेट और विदेशी पहुंच बढ़ाने वाली नीतियों के कारण उन समुदायों पर दबाव बढ़ रहा है जो खनन, ऊर्जा और अन्य परियोजनाओं का विरोध करते हैं।
स्वदेशी समुदायों की सामूहिक सुरक्षा बनी उम्मीद
इन खतरों के बीच रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि कई समुदाय अकेले व्यक्ति की सुरक्षा के बजाय सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था विकसित कर रहे हैं।
इसमें स्थानी तौर पर गश्त, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, सामुदायिक निगरानी नेटवर्क और लोगों को सुरक्षा के लिए प्रशिक्षित करना शामिल है। कई जगहों पर ये व्यवस्थाएं समुदायों की पारंपरिक संस्कृति और आध्यात्मिक मान्यताओं से भी जुड़ी हैं।
ग्लोबल विटनेस ने रिपोर्ट में यह भी जानकारी दी है कि पर्यावरण और भूमि अधिकार रक्षकों को अक्सर इसलिए निशाना बनाया जाता है क्योंकि वे किसी व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि पूरे समुदाय और उसके क्षेत्र के अधिकारों की आवाज बनकर सामने आते हैं। ऐसे में केवल व्यक्ति की सुरक्षा पर केंद्रित व्यवस्था पर्याप्त नहीं हो सकती।
अमेजन में समुदाय खुद कर रहे अपनी जमीन की निगरानी
पेरू के काकाताइबो और शिपिबो समुदाय इसका एक उदाहरण है। यहां स्वदेशी समुदाय ने संगठित अपराध और कोका (कोकीन) की अवैध खेती से जुड़ी हिंसा तथा पर्यावरणीय नुकसान से अपनी जमीन और संस्कृति की रक्षा के लिए स्वदेशी गार्ड तैयार किए हैं।
इन समुदायों के सदस्य अपने क्षेत्रों में गश्त करते हैं, अवैध गतिविधियों और घुसपैठ पर नजर रखते हैं और सामूहिक क्षमता बढ़ाने के लिए काम करते हैं। गौरतलब है कि यह इलाका अमेजन के सबसे जैव-विविध क्षेत्रों में शामिल है।
काकाताइबो के सुरक्षा कमांडर सेगुंडो इस्पोन के मुताबिक, समुदाय के लिए अपनी जमीन और क्षेत्र की रक्षा करना केवल अधिकार का सवाल नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की जिम्मेदारी भी है। लेकिन उनके अनुसार, यह काम अब पहले से कहीं अधिक खतरनाक हो गया है।
जमीन को लेकर आवाज उठाने पर मुकदमों का डर
एशिया में सामूहिक सुरक्षा के सामने एक और चुनौती आपराधिक कार्रवाई है। ग्लोबल विटनेस ने इंडोनेशिया के एक मामले का उदाहरण दिया है, जहां स्वदेशी दयाक समुदाय ने अपनी जमीन पर एक पल्पवुड कंपनी की गतिविधियों और स्थानीय जल स्रोतों के प्रदूषण का विरोध किया।
इसके बाद समुदाय से जुड़े लोगों पर कई आपराधिक आरोप लगाए गए, जिनमें वर्षों तक जेल की सजा का प्रावधान हो सकता है।
पश्चिम कालीमंतन की नागरिक संस्था लिंक-एआर बोर्नियो के कार्यकारी निदेशक अहमद स्युकरी के अनुसार, जब भी कोई समुदाय अपनी जमीन, पारंपरिक कानूनों और क्षेत्र की रक्षा के लिए आवाज उठाता है, उसका नेतृत्व करने वाले लोगों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की कोशिश शुरू हो जाती है।
सहायता में कटौती से कमजोर हुआ सुरक्षा तंत्र
रिपोर्ट में 2025 के वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक माहौल को भी पर्यावरण और मानवाधिकार रक्षकों के लिए चुनौतीपूर्ण बताया गया है। ग्लोबल विटनेस ने जानकारी दी है कि दुनिया के कई हिस्सों में सत्तावादी तौर-तरीकों, हिंसक संघर्ष और अनियंत्रित कॉरपोरेट ताकत के साथ मानवाधिकार संगठनों के लिए वित्तीय सहायता का संकट भी बढ़ा है।
उदाहरण के लिए 2025 में अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन और अन्य पारंपरिक देशों की ओर से विदेशी सहायता में हुई कटौती का असर दुनिया भर के हजारों मानवाधिकार संगठनों पर पड़ा है।
इससे उन समुदायों को मिलने वाली सहायता भी प्रभावित हुई जो दूरदराज के जंगलों और अन्य संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में अपने अधिकारों और पर्यावरण की रक्षा कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक सहायता में इस कटौती का असर केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर उन स्वदेशी लोगों और छोटे किसानों पर पड़ सकता है जो जंगलों, नदियों और दूसरे पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा करते हैं।
पर्यावरण बचाने की कीमत इतनी भारी क्यों?
रिपोर्ट के अनुसार, भूमि और पर्यावरण रक्षक यह बताते हैं कि किसी जंगल के काटे जाने, नदी के प्रदूषण या प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का असर जमीन पर सबसे पहले कौन देख रहा है।
रिपोर्ट के प्रमुख लेखक और ग्लोबल विटनेस में भूमि एवं पर्यावरण रक्षक मामलों के जांचकर्ता टोबी हिल के मुताबिक, ये रक्षक जमीन पर मौजूद दुनिया की आंख और कान की तरह हैं। उनके अनुसार, उन पर होने वाली हिंसा वास्तव में दुनिया की जमीन और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर चल रहे व्यापक संघर्ष का हिस्सा है।
देखा जाए तो 2025 में सामने आए ये 124 मामले इसी संघर्ष की सबसे भयावह तस्वीर सामने रखते हैं। लेकिन इनके पीछे हजारों ऐसे लोग और समुदाय भी हैं जो बिना किसी बड़ी सुर्खी के अपने जल, जमीन, जंगल और संस्कृति की रक्षा में जुटे हैं।
कुल मिलाकर देखें तो आंकड़ों की यह कहानी केवल 124 मौतों तक सीमित नहीं। यह उन समुदायों की कहानी भी है जिनके लिए जमीन एक संपत्ति नहीं, बल्कि घर, आजीविका, पहचान और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य है।