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पर्यावरण

धरती या मुनाफा? विनाश पर निवेश हो रहे हर साल 7.3 लाख करोड़ डॉलर

संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट ने खोली वैश्विक वित्त की स्याह तस्वीर

Lalit Maurya

  • संयुक्त राष्ट्र रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया हर साल 7.3 लाख करोड़ डॉलर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले निवेशों में खर्च कर रही है, जबकि प्रकृति की सुरक्षा के लिए केवल 22,000 करोड़ डॉलर का निवेश हो रहा है।

  • हैरानी की बात यह है कि इसमें से करीब 90 फीसदी पैसा सरकारों से आ रहा है। निजी क्षेत्र का योगदान महज 2,340 करोड़ डॉलर है, यानी इस कुल निवेश का महज 10 फीसदी निजी क्षेत्र द्वारा किया जा रहा है।

  • रिपोर्ट चेताती है कि अगर दुनिया को जलवायु संकट और जैव विविधता के पतन से बचना है, तो 2030 तक प्रकृति आधारित समाधानों में निवेश को ढाई गुणा बढ़ाकर हर साल 57,100 करोड़ डॉलर करना होगा।

  • दिलचस्प बात यह है कि इतनी बड़ी राशि भी वैश्विक जीडीपी का महज 0.5 फीसदी ही होगी।

धरती को बचाने के जितने भी बड़े-बड़े वादे किए जाते हों, लेकिन सच्चाई यही है कि दुनिया आज प्रकृति को बचाने से ज्यादा उसके विनाश में पैसा लगा रही है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में इस कड़वी सच्चाई को उजागर किया है। रिपोर्ट में सामने आया है कि प्रकृति की सुरक्षा पर हर एक डॉलर खर्च करने के बदले दुनिया 30 डॉलर उसे नुकसान पहुंचाने में झोंक रही है।

"स्टेट ऑफ फाइनेंस फॉर नेचर 2026" नाम की यह रिपोर्ट, जो 2023 के आंकड़ों पर आधारित है, बताती है कि वैश्विक वित्त व्यवस्था प्रकृति के खिलाफ काम कर रही है। रिपोर्ट के मुताबिक हर साल करीब 7.3 लाख करोड़ डॉलर ऐसे निवेशों में जा रहे हैं, जो पर्यावरण की सेहत के लिए नुकसानदेह हैं।

इसमें से 4.9 लाख करोड़ डॉलर निजी क्षेत्र से आते हैं, जो मुख्य रूप से ऊर्जा, औद्योगिक क्षेत्र, यूटिलिटी और कच्चे माल जैसे कुछ गिने-चुने क्षेत्रों में सिमटे हुए हैं। वहीं सरकारें भी पीछे नहीं हैं, जो हर साल करीब 2.4 लाख करोड़ डॉलर की ऐसी सब्सिडी दे रही हैं जो जीवाश्म ईंधन, कृषि, जल, परिवहन और निर्माण जैसे क्षेत्रों में पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही हैं।

भारी पड़ रही निजी क्षेत्र की सुस्ती

वहीं इसके उलट, प्रकृति को बचाने के लिए किए जा रहे उपायों, यानी नेचर-बेस्ड सॉल्यूशंस, में किया जा रहा कुल निवेश महज 22,000 करोड़ डॉलर है। हैरानी की बात यह है कि इसमें से करीब 90 फीसदी पैसा सरकारों से आ रहा है। निजी क्षेत्र का योगदान महज 2,340 करोड़ डॉलर है, यानी इस कुल निवेश का महज 10 फीसदी निजी क्षेत्र द्वारा किया जा रहा है।

इसका मतलब साफ है, कंपनियां और वित्तीय संस्थान अभी भी बड़े पैमाने पर प्रकृति में निवेश करने से कतरा रहे हैं, जबकि उन्हें इससे जुड़े जोखिम और अवसर दोनों का अंदाजा है।

यूएनईपी की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन का कहना है, “अगर आप पैसों की दिशा देखें तो चुनौती का आकार साफ दिखता है। ऐसे में हम या तो प्रकृति के विनाश में निवेश कर सकते हैं या उसके पुनर्जीवन में, बीच का कोई रास्ता नहीं है।“

2030 तक ढाई गुना निवेश की जरूरत

उन्होंने चिन्ता जताई कि एक ओर जहां प्रकृति-आधारित समाधानों की दिशा में हो रही प्रगति धीमी पड़ रही है, वहीं नुकसान की वजह बनने वाले निवेश और सब्सिडी तेजी से बढ़ रहे हैं।

रिपोर्ट चेताती है कि अगर दुनिया को जलवायु संकट और जैव विविधता के पतन से बचना है, तो 2030 तक प्रकृति आधारित समाधानों में निवेश को ढाई गुणा बढ़ाकर हर साल 57,100 करोड़ डॉलर करना होगा। दिलचस्प बात यह है कि इतनी बड़ी राशि भी वैश्विक जीडीपी का महज 0.5 फीसदी ही होगी।

रिपोर्ट में इस चुनौती से निपटने के लिए ऐसे नीतिगत बदलावों पर जोर दिया है, जिनमें प्रकृति को सहेज कर रखने वाले समाधानों का स्तर बढ़ाया जाए और अर्थव्यवस्थाओं को भी मजबूती मिले। इसके लिए रिपोर्ट में एक नया ढांचा भी पेश किया गया है, जिसे ‘नेचर ट्रांजिशन एक्स-कर्व’ नाम दिया गया है।

क्या है समाधान

यह सरकारों और कंपनियों को यह रास्ता दिखाता है कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली सब्सिडी और पुराने विनाशकारी निवेश कैसे धीरे-धीरे खत्म किए जाएं और साथ ही प्रकृति-अनुकूल निवेश को तेजी से बढ़ाया जाए।

इस ढांचे में शहरी इलाकों को हरा-भरा बनाने पर जोर दिया गया है ताकि शहरों में बन रहे हीट आइलैंड जैसे प्रभावों को कम किया जा सके। साथ ही आम लोगों के लिए रहन-सहन की गुणवत्ता में सुधार लेन की भी जरुरत है।

रिपोर्ट में इस बात पर भी जोर दिया गया है कि सड़कों, ऊर्जा सम्बन्धी बुनियादी ढांचे का निर्माण करते समय प्रकृति को ध्यान में रखना आवश्यक है। साथ ही उसकी विशिष्ट जरूरतों को भी ध्यान में रखने की जरुरत है। यूएन रिपोर्ट ने ऐसी निर्माण सामग्री पर भी जोर दिया है जिससे उत्सर्जन न हो। उदाहरण के लिए कार्बन डाइऑक्साइड का इस्तेमाल करके ऐसे निर्माण सामग्री बनाना जो उत्सर्जन को घटाने के बजाय उसे नकारात्मक करें।

रिपोर्ट इस तथ्य को भी उजागर करती है कि प्रकृति की भलाई के लिए किए जा रहे निवेश तभी सच में कारगर होंगे, जब वे स्थानीय पारिस्थितिकी, संस्कृति और समाज से जुड़े हों, समावेशी हों और सभी के लिए न्यायपूर्ण हों।

आखिरकार सवाल यही है, दुनिया अपने पैसे को विनाश के रास्ते पर ही बहाती रहेगी, या समय रहते उसे प्रकृति के पुनर्जीवन की दिशा में मोड़ेगी? क्योंकि अगर आज निवेश की दिशा नहीं बदली गई, तो कल धरती को बचाने के लिए कोई कीमत काफी नहीं होगी। ऐसे में अगर मानव जाति ने अब भी प्रकृति के साथ खड़े होने का फैसला नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाने को कुछ भी नहीं बचेगा।