कुछ ऐसी ही स्थिति दिल्ली की भी है, जहां एक तरफ भूजल का स्तर गिर रहा है। वहीं बारिश में सड़कें नदियों में तब्दील हो जाती हैं। फोटो: सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) 
पर्यावरण

105 फीसदी बढ़ा कंक्रीट, अतिक्रमण से त्रस्त 70 फीसदी झीलें: बेंगलुरु में मौसम नहीं, शहरीकरण है असली विलेन

27 वर्षों के अध्ययन में खुलासा हुआ है कि बेतरतीब शहरीकरण, झीलों पर अतिक्रमण और सरकारी एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी ने बेंगलुरु के प्राकृतिक जलचक्र को तोड़ दिया है।

Lalit Maurya

  • बेंगलुरु में हर बारिश के बाद आने वाली बाढ़ और लगातार गिरता भूजल स्तर केवल मौसम की मार नहीं, बल्कि अनियोजित शहरीकरण की कीमत है।

  • 27 वर्षों (1997–2023) के अध्ययन में सामने आया है कि शहर का निर्मित क्षेत्र 42 फीसदी से बढ़कर 86 फीसदी हो गया, यानी दो दशकों में कंक्रीट का फैलाव 105 फीसदी बढ़ा।

  • इसके साथ ही करीब 70 फीसदी ऐतिहासिक झीलें अतिक्रमण या निर्माण गतिविधियों की भेंट चढ़ गईं, जिससे शहर का प्राकृतिक जलचक्र बुरी तरह टूट गया। अब बारिश का पानी जमीन में समाकर भूजल रिचार्ज करने के बजाय सीधे सड़कों पर बहता है, जिससे बाढ़ तो आती है, लेकिन जलभृत खाली रह जाते हैं।

  • अध्ययन यह भी बताता है कि विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी ने संकट को और गहरा किया है।

  • हालांकि जक्कूर झील की बहाली यह साबित करती है कि झीलों का पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन, पानी सोखने वाले ढांचे और स्थानीय समुदाय की भागीदारी जैसे उपाय एक साथ अपनाए जाएं तो बाढ़ और जल संकट दोनों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

  • शोधकर्ताओं का संदेश स्पष्ट है—शहरों का भविष्य कंक्रीट नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित विकास में सुरक्षित है।

कभी अपने सुहावने मौसम, बगीचों और झीलों की खूबसूरती की वजह से 'गार्डन सिटी' के नाम से जाना जाने वाला बेंगलुरु आज एक अजीब विरोधाभास से जूझ रहा है। जहां एक ओर हर तेज बारिश के बाद शहर में सड़कें समंदर बन जाती हैं और गाड़ियां पानी में डूब जाती हैं। वहीं दूसरी ओर इतनी बारिश के बावजूद जमीन के नीचे भूजल का स्तर लगातार गिरता जा रहा है।

सवाल यह है कि जब इतनी बारिश हो रही है तो भूजल क्यों नहीं भर रहा?

रिसर्च से पता चला है कि ऊपर पानी, नीचे सूखा यह विरोधाभास कोई संयोग नहीं। यह विकास के उस मॉडल का नतीजा है जिसने दो दशकों में बेंगलुरु को कंक्रीट के जंगल में बदल दिया, हरियाली और आर्द्रभूमियों को निगल लिया और जल संकट को और गहरा दिया है।

यह अध्ययन केंद्रीय भूजल बोर्ड (जल शक्ति मंत्रालय), हैदराबाद सिंचाई विभाग और ऑस्ट्रेलिया की 'वेस्टर्न सिडनी यूनिवर्सिटी' से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है। इसके नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल वर्ल्ड वाटर पॉलिसी में प्रकाशित हुए हैं।

प्रकृति या हम, कौन है कुसूरवार?

1997 से 2023 के बीच 27 वर्षों के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला कि समस्या मौसम के मिजाज में नहीं, बल्कि शहर को एक कंक्रीट के बेजान ढांचे में बदल देने की हमारी होड़ में है। कुछ ऐसी ही स्थिति कोलकाता की भी है।

इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग साइंस एंड टेक्नोलॉजी, शिबपुर के अध्ययन से पता चला है कि शहर का करीब एक-तिहाई हिस्सा बाढ़ से प्रभावित हो रहा है और सबसे अधिक खतरा पूर्वी कोलकाता में आद्रभूमियों और आसपास के तेजी से फैलते शहरी इलाकों में है।

रुझान दर्शाते हैं कि पिछले दो दशकों के दौरान बेंगलुरु में निर्मित क्षेत्र 42 फीसदी से बढ़कर 86 फीसदी हो गया है। मतलब कि 20 वर्षों में कंक्रीट का जंगल 105 फीसदी बढ़ चुका है। सड़कें, इमारतें, पार्किंग साइट और छतें अब जमीन को करीब-करीब पूरी तरह कंक्रीट निगल चुका है।

इसके कारण बारिश का पानी मिट्टी में समाने के बजाय सड़कों पर बहने लगा है, जो अपने साथ बाढ़ लाता है और फिर शहर से बाहर निकल जाता है। ऐसे में सड़कों पर भले ही ऊपर पानी भरा रहता है, लेकिन नीचे जमीन में जलभृत (एक्वीफर) खाली रह जाते हैं। मतलब की समस्या बारिश की कमी नहीं, बल्कि शहर की बिगड़ चुकी जल प्रबंधन व्यवस्था और अनियोजित शहरी विकास है।

शोधकर्ताओं ने पाया कि सामान्य परिस्थितियों में बारिश का पानी मिट्टी के भीतर रिसकर भूजल तक पहुंचने में एक से दो महीने का समय लेता है। यही अवधि भूजल को रीचार्ज करने की सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक खिड़की होती है। लेकिन पिछले दो दशकों में बेंगलुरु में जिस तरह कंक्रीट बिछा है उसने समस्या को कहीं ज्यादा गंभीर बना दिया है।

झीलों के खत्म होने से टूट रहा शहर का प्राकृतिक सुरक्षा कवच

अध्ययन के मुताबिक, बेंगलुरु की करीब 70 फीसदी ऐतिहासिक झीलों पर अतिक्रमण हो चुका है या उनके स्वरुप को निर्माण कार्यों के चलते बदल दिया गया है।

पहले ये झीलें और आर्द्रभूमियां प्राकृतिक स्पंज की तरह काम करती थीं। वे बारिश के पानी को रोककर धीरे-धीरे जमीन में संजोने का समय देती थीं। लेकिन इनके खत्म होने से शहर ने अपनी प्राकृतिक जल-संवेदनशीलता ही खो दी है।

नतीजा यह है कि एक ही तेज बारिश शहर को ठप कर देती है। ऐसा ही 2022 में देखा गया जब बाढ़ से बेंगलुरु को करीब 225 करोड़ रुपए का आर्थिक नुकसान हुआ, लेकिन इतनी भारी बारिश के बावजूद भूजल के स्तर में कोई उल्लेखनीय बढ़ोतरी नहीं हुई।

'कागज के पन्नों' में बंटे विभाग, मरती संवेदनाएं

शोधकर्ताओं ने समस्या की तह तक पहुंचने के लिए एक नया तरीका—इंस्पेक्ट ढांचा अपनाया, जिसने यह साफ कर दिया कि सबसे बड़ी रुकावट सरकारी महकमों की दीवारें हैं। अध्ययन में पाया गया कि सबसे बड़ी बाधा सरकारी विभागों के बीच 'पॉलिसी साइलो' यानी अलग-अलग काम करने की प्रवृत्ति है।

उदाहरण के लिए, शहर की जल निकासी व्यवस्था संभालने वाली एजेंसी और पेयजल एवं सीवरेज के लिए जिम्मेदार एजेंसी अक्सर समन्वय के साथ काम नहीं करतीं। अलग-अलग विभागों के पास अलग-अलग आंकड़े होते हैं, लेकिन किसी के पास पूरी तस्वीर नहीं होती। इसका असर सीधे जल प्रबंधन पर पड़ता है।

समुदाय की भागीदारी से मिल सकती है राहत

अध्ययन बताता है कि पहले स्थानीय समुदाय अपनी झीलों की देखभाल को सामूहिक जिम्मेदारी मानते थे। समय के साथ यह सोच कमजोर होती गई और झीलों के किनारों को रियल एस्टेट के विकास के लिए खाली जमीन समझा जाने लगा।

शोधकर्ताओं ने जक्कूर झील की बहाली को उम्मीद की मिसाल बताया है। दूषित पानी को साफ कर दोबारा इस्तेमाल करने और स्थानीय लोगों की भागीदारी से यह झील आज भूजल बढ़ाने के साथ-साथ बाढ़ का खतरा भी कम कर रही है।

अध्ययन में सुझाव दिया गया है कि शहरों को वॉटर-सेंसिटिव अर्बन डिजाइन अपनानें होंगे। इसके तहत भवन निर्माण में पानी सोखने वाले फर्श (परमेएबल पेवमेंट), वर्षा उद्यान (रेन गार्डन), रीचार्ज कुएं और झीलों के पुनर्जीवन जैसे उपाय अनिवार्य किए जाने चाहिए।

इसके साथ ही शोधकर्ताओं ने सभी संबंधित विभागों को एक मंच पर लाने के लिए एकीकृत शहरी जल प्रबंधन प्राधिकरण बनाने की सिफारिश की है, ताकि बारिश, भूजल और जल निकासी से जुड़े आंकड़ों का साझा उपयोग हो सके और संकट आने के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले से तैयारी की जा सके।

दुनिया के तेजी से बढ़ते शहरों के लिए भी सबक

शोधकर्ताओं का मानना है कि बेंगलुरु की यह कहानी केवल एक शहर की नहीं है। भारत सहित एशिया और अफ्रीका के कई अन्य तेजी से बढ़ते शहर भी बाढ़ और भूजल संकट की दोहरी चुनौती का सामना कर रहे हैं।

अध्ययन का सबसे बड़ा संदेश स्पष्ट है, बारिश की हर बूंद तभी जीवन बनती है, जब उसे धरती की गोद तक पहुंचने का रास्ता मिले। अगर शहर सिर्फ कंक्रीट का जंगल बनने के बजाय प्रकृति के साथ मिलकर विकास करना सीख लें, तो आज जो बारिश बाढ़ बनकर तबाही मचा रही है, वही कल जल सुरक्षा का सबसे बड़ा आधार बन सकती है।