सरकार का लक्ष्य 2030 तक हर साल 50 लाख मीट्रिक टन ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन करना है।  प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक
ऊर्जा

आईआईटी गुवाहाटी ने बनाई 'जादुई' कोटिंग: 50 फीसदी से अधिक रफ्तार से बनेगी ग्रीन हाइड्रोजन

आईआईटी, गुवाहाटी के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित यह विशेष कोटिंग गैस के बुलबुलों को सतह पर टिकने नहीं देती, जिससे हाइड्रोजन उत्पादन की प्रक्रिया ज्यादा तेज हो जाती है

Lalit Maurya

  • आईआईटी, गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन को नई रफ्तार देने वाली ऐसी तकनीक विकसित की है, जो स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ी क्रांति ला सकती है।

  • शोधकर्ताओं ने एक विशेष कोटिंग तैयार की है, जो पानी से हाइड्रोजन बनाने की प्रक्रिया के दौरान बनने वाले गैस के बुलबुलों को सतह पर टिकने नहीं देती। इससे प्रतिक्रिया तेज होती है और हाइड्रोजन उत्पादन 51 फीसदी तक बढ़ जाता है।

  • यह तकनीक इसलिए खास है क्योंकि अब तक सौर ऊर्जा से पानी को तोड़कर हाइड्रोजन बनाने की प्रक्रिया में इलेक्ट्रोड पर चिपकने वाले बुलबुले और कैटेलिस्ट परत का उखड़ना बड़ी बाधा थे। नई कोटिंग इन दोनों समस्याओं का समाधान करती है। इसमें फोटोकैटेलिस्ट को सतह पर लगाने के बजाय कोटिंग के भीतर समाहित किया गया है, जिससे प्रणाली ज्यादा टिकाऊ और प्रभावी बनी।

  • अभी यह तकनीक प्रयोगशाला स्तर पर है, लेकिन यदि बड़े पैमाने पर सफल हुई, तो सूरज और पानी से स्वच्छ ईंधन बनाने का सपना तेजी से हकीकत बन सकता है। यह खोज भारत को कार्बन-मुक्त और ऊर्जा आत्मनिर्भर भविष्य की ओर ले जाने वाला अहम कदम मानी जा रही है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने भविष्य के स्वच्छ ईंधन यानी 'ग्रीन हाइड्रोजन' के उत्पादन को तेज और ज्यादा प्रभावी बनाने की दिशा में ऐतिहासिक सफलता हासिल की है।

शोधकर्ताओं ने एक ऐसी अनूठी 'कोटिंग तकनीक' विकसित की है, जो सौर ऊर्जा की मदद से पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग करने वाली तकनीक को ज्यादा असरदार और पर्यावरण अनुकूल बना सकती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह तकनीक हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता को 50 फीसदी से ज्यादा बढ़ा देगी। ऐसे में उम्मीद है कि यह तकनीक कार्बन मुक्त भारत की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है।

यह अध्ययन प्रोफेसर उत्तम मन्ना और प्रोफेसर मोहम्मद कुरैशी द्वारा किया गया है, जिसमें डॉक्टर हृषिकेश सरमा, अल्पना साहू, अंशिका चौधरी, सुमंत सरकार, सौरव मंडल और लिंगराज साहू ने भी सहयोग किया है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल 'स्मॉल' में प्रकाशित हुए हैं।

अब तक क्या थी चुनौती?

हाल के वर्षों में ग्रीन हाइड्रोजन को स्वच्छ ऊर्जा का बड़ा विकल्प माना जाने लगा है, क्योंकि इससे कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम हो सकती है। हालांकि अभी हाइड्रोजन बनाने के पारंपरिक तरीकों से बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं, जो जलवायु संकट को बढ़ाती हैं।

इसके विकल्प के तौर पर सौर ऊर्जा की मदद से पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़ा जाता है, जिसे 'फोटो-असिस्टेड इलेक्ट्रोकेमिकल' प्रक्रिया कहते हैं।

लेकिन इस आधुनिक तकनीक के सामने अब तक दो बड़ी चुनौतियां थीं। पहली यह कि इलेक्ट्रोड की सतह पर लगाई गई उत्प्रेरक (कैटेलिस्ट) की परतें समय के साथ उखड़ने लगती थीं, जिससे सिस्टम की उम्र और क्षमता कम हो जाती थी। दूसरी समस्या यह है कि रासायनिक प्रतिक्रिया के दौरान पैदा होने वाले गैस के बुलबुले इलेक्ट्रोड पर ही चिपक जाते थे, जिससे हाइड्रोजन व ऑक्सीजन के उत्पादन की रफ्तार धीमी हो जाती थी।

यानी तकनीक मौजूद है, लेकिन ये बाधाएं ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन को बड़े पैमाने पर अपनाने में मुश्किल पैदा कर रही हैं।

कैसे काम करती है आईआईटी की नई तकनीक?

इन चुनौतियों से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने एक खास कोटिंग विकसित की है। यह कोटिंग गैस के बुलबुलों को सतह से चिपकने नहीं देती, जिससे हाइड्रोजन उत्पादन की प्रक्रिया ज्यादा तेज और प्रभावी हो जाती है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने ग्रेफाइटिक कार्बन नाइट्राइड नामक द्वि-आयामी फोटो-कैटेलिस्ट को विशेष बबल-रोधी हाइड्रोजेल परत के साथ छिद्रयुक्त निकल फोम पर जोड़ा है।

आमतौर पर ऐसी तकनीकों में फोटोकैटेलिस्ट को केवल ऊपर की सतह पर चढ़ाया जाता है, जो समय के साथ उखड़ सकता है। लेकिन इस नई तकनीक में वैज्ञानिकों ने फोटोकैटेलिस्ट को कोटिंग के भीतर ही जोड़ दिया गया।

इससे दो फायदे हुए पहला, कैटेलिस्ट की परत उखड़ने से बच गई और तकनीक ज्यादा समय तक टिकी रही। दूसरा, पानी के साथ प्रतिक्रिया के लिए ज्यादा सक्रिय सतह उपलब्ध हुई। गैस के बुलबुले जल्दी हटते रहे, जिससे प्रक्रिया तेज हो गई।

कितनी बढ़ी क्षमता?

अध्ययन के नतीजे दर्शाते हैं कि इस नई तकनीक ने पारंपरिक प्रणालियों की तुलना में कहीं बेहतर प्रदर्शन किया। आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली कोटिंग तकनीकों के मुकाबले यह नई मिश्रित कोटिंग ज्यादा प्रभावी साबित हुई। इससे ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन में बड़ा सुधार हुआ। नई कोटिंग के इस्तेमाल से पारंपरिक तरीकों की तुलना में हाइड्रोजन उत्पादन 51 फीसदी और ऑक्सीजन उत्पादन 44 फीसदी तक बढ़ गया।

यानी यह तकनीक न केवल ज्यादा टिकाऊ है, बल्कि कम समय में ज्यादा हाइड्रोजन बनाने में भी मददगार हो सकती है।

प्रोफेसर उत्तम मन्ना के अनुसार, यह रणनीति सिर्फ एक कैटेलिस्ट तक सीमित नहीं है। भविष्य में दूसरे उन्नत कैटेलिस्ट के साथ भी इसका उपयोग कर ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन को और बेहतर बनाया जा सकता है। उन्हें उम्मीद है कि यह तकनीक अगली पीढ़ी की स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।

खासकर, सौर ऊर्जा से पानी को तोड़कर ग्रीन हाइड्रोजन बनाने, अक्षय ऊर्जा भंडारण और बड़े पैमाने पर सौर ऊर्जा को ईंधन में बदलने वाली तकनीकों में इसका उपयोग हो सकता है।

प्रोफेसर मोहम्मद कुरैशी ने जानकारी दी है कि अगला कदम इस तकनीक को और बेहतर बनाना है। इसके लिए शोधकर्ता मौजूदा हाइड्रोजेल की जगह नई उन्नत सामग्री और बेहतर फोटोकैटेलिस्ट का इस्तेमाल करने की योजना बना रहे हैं, ताकि पानी से हाइड्रोजन बनाने की क्षमता और बढ़ाई जा सके।

उन्होंने बताया कि भविष्य में टीम इस तकनीक को बड़े इलेक्ट्रोड पर आजमाएगी और इसे ऐसे उपकरणों में जोड़ने पर काम करेगी, जिनसे सौर ऊर्जा की मदद से व्यावहारिक तौर पर हाइड्रोजन बनाया जा सके।

हालांकि, वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि यह तकनीक अभी प्रयोगशाला स्तर पर है और इसके बड़े पैमाने पर व्यावहारिक उपयोग से पहले कई परीक्षणों से गुजरना होगा। लेकिन यह खोज साफ संकेत देती है कि सूरज और पानी से स्वच्छ ईंधन बनाने का सपना अब दूर नहीं।

आज जब दुनिया तेल, गैस और कोयले की सीमाओं से जूझ रही है, तब आईआईटी गुवाहाटी की यह खोज उम्मीद की नई किरण बनकर उभरी है। अगर यह तकनीक प्रयोगशाला से निकलकर बड़े पैमाने पर सफल होती है, तो वह दिन दूर नहीं जब सूरज की रोशनी और पानी से तैयार हाइड्रोजन भारत की ऊर्जा जरूरतें पूरी करेगा।

यह सिर्फ एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारत का स्वच्छ, आत्मनिर्भर और कार्बन-मुक्त भविष्य की ओर बढ़ता मजबूत कदम है।