करीब 65 लाख लोग भोजन और आय के लिए पूरी तरह समुद्री घास के मैदानों पर निर्भर हैं, अध्ययन में खुलासा हुआ। फोटो साभार: आईस्टॉक
अर्थव्यवस्था

1.8 करोड़ गरीब तटीय परिवारों के लिए जीवनरेखा बने समुद्री घास के मैदान

समुद्री घास बनी करोड़ों गरीब तटीय परिवारों की जीवनरेखा, 1.8 करोड़ लोग मछली पकड़ने पर निर्भर, संरक्षण नहीं हुआ तो बढ़ेगा गरीबी और खाद्य संकट

Dayanidhi

  • हिंद-प्रशांत क्षेत्र में गरीबी से जूझ रहे 1.8 करोड़ लोग समुद्री घास के मैदानों में मछली पकड़कर जीवन चलाते हैं।

  • करीब 65 लाख लोग भोजन और आय के लिए पूरी तरह समुद्री घास के मैदानों पर निर्भर हैं, अध्ययन में खुलासा हुआ।

  • समुद्री घास पर निर्भर परिवार दूसरे मछुआरों की तुलना में औसतन 23 प्रतिशत कम कमाई करते हैं, जिससे गरीबी बढ़ती है।

  • तटीय विकास, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन समुद्री घास के मैदानों के लिए बड़ा खतरा बन रहे हैं, जिससे गरीब परिवार प्रभावित होंगे।

  • विशेषज्ञों ने समुद्री घास संरक्षण को गरीबी उन्मूलन, खाद्य सुरक्षा और टिकाऊ मछली पालन नीतियों से जोड़ने की जरूरत बताई है।

समुद्र के किनारे उगने वाली समुद्री घास यानी सीग्रास को अब तक मुख्य रूप से समुद्री जीवों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता रहा है। लेकिन एक नए बड़े अध्ययन ने इसकी एक और अहम भूमिका सामने रखी है। अध्ययन के अनुसार, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में गरीबी में रहने वाले कम से कम 1.8 करोड़ लोग समुद्री घास के मैदानों में मछली पकड़कर अपना जीवन चलाते हैं। इनमें करीब 65 लाख लोग ऐसे हैं, जो भोजन और मछली पकड़ने से होने वाली कमाई के लिए पूरी तरह इन समुद्री घास के मैदानों पर निर्भर हैं।

यह अध्ययन प्रोजेक्ट सीग्रास के वैज्ञानिकों ने किया है और इसे नेचर सस्टेनेबिलिटी पत्रिका में प्रकाशित किया गया है।

गरीब परिवारों के लिए आसान सहारा

समुद्री घास समुद्र के उथले हिस्सों में बड़े-बड़े मैदान के रूप में उगती है। यह फूल देने वाला पौधा है और समुद्र के कई छोटे जीवों के लिए घर का काम करता है। इन जगहों पर मछलियां, केकड़े और दूसरे समुद्री जीव बड़ी संख्या में पाए जाते हैं।

इन समुद्री घास के मैदानों की खास बात यह है कि यहां मछली पकड़ने के लिए बड़े नाव या महंगे उपकरणों की जरूरत हमेशा नहीं होती। कई जगह लोग पैदल पानी में उतरकर भी मछली और दूसरे समुद्री जीव पकड़ लेते हैं। इसलिए गरीब परिवारों के लिए यह भोजन और कमाई का आसान साधन बन जाता है।

समुद्री घास पर निर्भर परिवार कम कमाते हैं

अध्ययन में एक चिंताजनक बात भी सामने आई है। समुद्री घास पर निर्भर परिवार दूसरे मछुआरों की तुलना में औसतन 23 प्रतिशत कम कमाई करते हैं। यानी जो परिवार पहले से आर्थिक रूप से कमजोर हैं, वे समुद्री घास पर ज्यादा निर्भर हैं और उनकी आय भी कम है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे गरीबी का एक ऐसा चक्र बन सकता है, जिससे बाहर निकलना गरीब परिवारों के लिए मुश्किल हो जाता है। उनके पास कमाई के दूसरे साधन नहीं होते, इसलिए वे समुद्री घास से मिलने वाले संसाधनों पर निर्भर रहते हैं। अगर ये मैदान नष्ट हो जाएं तो उनकी आय और भोजन, दोनों पर संकट आ सकता है।

महिलाओं की भी अहम भूमिका

समुद्री घास से जुड़ी मछली पकड़ने की गतिविधियों में महिलाओं और समाज के कमजोर वर्गों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कई तटीय इलाकों में महिलाएं समुद्री जीवों को इकट्ठा करने, मछली पकड़ने और उन्हें बेचने जैसे कामों से परिवार की आय में योगदान देती हैं।

इसलिए समुद्री घास का नष्ट होना केवल पर्यावरण का नुकसान नहीं है। इसका सीधा असर उन परिवारों पर पड़ सकता है, जिनके पास आर्थिक संकट से बचने के बहुत कम विकल्प हैं।

विकास और प्रदूषण से बढ़ रहा खतरा

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री घास के मैदानों पर तटीय निर्माण, प्रदूषण और समुद्र से जुड़े दूसरे दबाव बढ़ रहे हैं। शहरों और बंदरगाहों का विस्तार, जमीन से समुद्र में पहुंचने वाला प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन इन इलाकों को प्रभावित कर रहे हैं।

समस्या यह भी है कि जिन लोगों की जिंदगी इन मैदानों पर निर्भर है, उनका अक्सर उन फैसलों में बहुत कम प्रभाव होता है, जिनसे समुद्री घास को नुकसान पहुंचता है।

गरीबी और पर्यावरण को साथ देखना जरूरी

शोध पत्र में शोधकर्ताओं का कहना है कि समुद्री घास को केवल संरक्षण का विषय मानना पर्याप्त नहीं है। इसे गरीबी, भोजन और रोजगार से जोड़कर देखना होगा। अगर गरीब तटीय परिवारों के भोजन और आय का आधार खत्म होता है, तो गरीबी और खाद्य असुरक्षा और बढ़ सकती है।

इसलिए सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को समुद्री घास के संरक्षण के साथ-साथ टिकाऊ मछली पालन को बढ़ावा देना चाहिए। स्थानीय लोगों को संरक्षण के काम में शामिल करना भी जरूरी है। समुद्री घास के मैदान भले ही समुद्र के नीचे छिपे हों, लेकिन करोड़ों लोगों की जिंदगी से उनका संबंध बहुत गहरा है। इनका संरक्षण केवल मछलियों और समुद्री जीवों को बचाने का काम नहीं, बल्कि गरीब परिवारों के भोजन, रोजगार और भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश भी है।