प्रतीकात्मक तस्वीर: आईस्टॉक 
विकास

भोपाल सड़क परियोजना को एनजीटी की हरी झंडी, कहा- 'पर्यावरण नियमों का कड़ाई से हो पालन'

एनजीटी का यह फैसला विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की नई कसौटी है, जहां सड़क विस्तार के साथ-साथ हरियाली को बचाने की कानूनी जवाबदेही भी तय की गई है।

Susan Chacko, Lalit Maurya

  • भोपाल के अयोध्या बाईपास से जुड़ी 16 किलोमीटर लंबी सड़क चौड़ीकरण परियोजना को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने मंजूरी दे दी है। ट्रिब्यूनल ने माना कि बढ़ते ट्रैफिक दबाव को देखते हुए सड़क विस्तार जरूरी है और परियोजना के दौरान कानून या पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन का कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया।

  • हालांकि, एनजीटी ने साफ किया कि विकास कार्य पर्यावरणीय जिम्मेदारियों की अनदेखी कर नहीं किए जा सकते।

  • अदालत ने निर्देश दिया कि सड़क निर्माण के दौरान मध्य प्रदेश वृक्ष संरक्षण अधिनियम 2001, ग्रीन हाईवे नीति और प्रतिपूरक पौधारोपण से जुड़े सभी नियमों का कड़ाई से पालन किया जाए। ट्रिब्यूनल ने कहा कि केवल पौधे लगाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनकी देखभाल कर उन्हें जीवित रखना भी अनिवार्य होगा।

  • इसके लिए 15 वर्षों तक पौधारोपण की निगरानी करने हेतु तकनीकी समिति गठित करने के निर्देश दिए गए हैं।

  • एनजीटी ने एनएचएआई और राज्य एजेंसियों से पेड़ों के काटे जाने और पौधारोपण के लिए जमा फंड के उपयोग का पूरा हिसाब भी मांगा है। यह फैसला विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की नई मिसाल माना जा रहा है, जहां सड़क निर्माण के साथ हरियाली बचाने की जवाबदेही भी तय की गई है।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने भोपाल के अयोध्या बाईपास (आशाराम तिराहा, करोंद रोड से रत्नागिरी तिराहा) तक प्रस्तावित 16 किलोमीटर लंबी सड़क निर्माण और चौड़ा करने से जुड़ी परियोजना को हरी झंडी दे दी है। इसका निर्माण नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) द्वारा किया जाएगा। एनजीटी ने 20 मई 2026 को कहा कि, “ट्रैफिक के बढ़ते दबाव को देखते हुए प्रशासन ने सड़क के विस्तार का फैसला लिया है।“

एनजीटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति श्यो कुमार सिंह की पीठ ने स्पष्ट कहा कि, “किसी विकास परियोजना को केवल तभी चुनौती दी जा सकती है, जब वह कानून या संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करती हो।“

अदालत ने स्पष्ट किया कि इस सड़क विस्तार के दौरान नियमों या कानून के उल्लंघन का कोई सबूत सामने नहीं आया है।

ट्रैफिक दबाव के बीच सड़क विस्तार को मिली मंजूरी

अदालत ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा गठित उच्च स्तरीय समिति, जिसकी अध्यक्षता अतिरिक्त मुख्य सचिव कर रहे थे और जिसमें वन एवं पर्यावरण विभाग के अधिकारी शामिल थे, ने परियोजना की दोबारा समीक्षा और जांच की। समिति ने कुछ शर्तों के साथ परियोजना को उपयुक्त माना।

एनजीटी ने यह भी कहा कि इस परियोजना की कुल लंबाई 100 किलोमीटर से कम है, इसलिए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की 14 जुलाई 2022 की अधिसूचना के तहत इसे पर्यावरणीय मंजूरी (ईसी) की अनिवार्य शर्त से छूट मिली हुई है।

हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि परियोजना के दौरान मध्य प्रदेश वृक्ष संरक्षण अधिनियम 2001 समेत सभी पर्यावरणीय नियमों का कड़ाई से पालन करना होगा। यदि किसी विकास कार्य में तय सीमा से अधिक पेड़ काटने की जरूरत पड़ती है, तो मामला राज्य की उच्च स्तरीय केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति के पास भेजा जाए।

सिर्फ पौधारोपण नहीं, पेड़ों को जीवित रखना भी अनिवार्य

एनजीटी ने अपने आदेश में साफ कहा कि सड़क परियोजना के दौरान पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सभी नियमों का सख्ती से पालन करना होगा। ट्रिब्यूनल ने निर्देश दिया कि जितने पेड़ काटे जाएंगे, उनकी भरपाई के लिए प्रतिपूरक पौधारोपण किया जाए। साथ ही अनिवार्य वनरोपण, ग्रीन हाईवे नीति, पेड़ों के प्रत्यारोपण, सौंदर्यीकरण और रखरखाव से जुड़े 2015 के नियमों का पालन भी सुनिश्चित किया जाए।

अदालत ने यह भी कहा कि केवल पौधे लगाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी देखभाल कर यह सुनिश्चित करना होगा कि वे जीवित रहें और विकसित हों।

यह भी निर्देश दिया कि काटे गए पेड़ों के बदले लगाए पौधों की निगरानी 15 वर्षों तक की जाए। इसके लिए एक तकनीकी समिति बनाई जाएगी, जिसमें वन विभाग, नगर निगम, उद्यानिकी विभाग और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य शामिल होंगे। यह समिति समय-समय पर पौधारोपण और पेड़ों की स्थिति की समीक्षा करेगी।

ट्रिब्यूनल ने कहा कि यह परियोजना राष्ट्रीय महत्व का अंतरराज्यीय राष्ट्रीय राजमार्ग है। इसलिए संबंधित एजेंसियां पर्यावरण नियमों, स्थानीय कानूनों और एनएचएआई के दिशा-निर्देशों का पूरी तरह पालन करते हुए तय समय सीमा में परियोजना पूरी करें।

एनजीटी ने यह भी माना कि सड़क परियोजना के लिए पेड़ों को काटे जाने की अनुमति तय प्रक्रिया के तहत ली गई थी। ट्रिब्यूनल के मुताबिक, सक्षम प्राधिकारी ने इसकी मंजूरी दी थी, जिसे बाद में केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति ने भी स्वीकृति प्रदान की। ऐसे में अदालत को अनुमति प्रक्रिया में किसी तरह की कानूनी खामी या अवैधता नहीं मिली।

फंड के इस्तेमाल पर मांगी रिपोर्ट

इसके साथ ही एनजीटी ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया को निर्देश दिया कि वह पेड़ों को काटे जाने और पौधारोपण के लिए पिछले पांच वर्षों में मध्य प्रदेश के वन विभाग, नगर निगम या वृक्ष अधिकारियों के पास जमा कराई गई कुल राशि का ब्यौरा पेश करे।

रिपोर्ट में वर्षवार जानकारी देने के साथ यह भी बताने को कहा गया है कि उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार इन पैसों का इस्तेमाल कैसे और कहां किया गया।

मध्य प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव को निर्देश दिया है कि वे पिछले पांच वर्षों में पेड़ को काटे जाने और पौधारोपण के बदले जमा किए गए फंड के इस्तेमाल की पूरी जानकारी जुटाएं। इसमें कैम्पा फंड, नगर निगम और सामाजिक वानिकी विभाग में जमा राशि का ब्यौरा शामिल होगा।

रिपोर्ट में यह भी बताने को कहा गया है कि हर साल लगाए गए पेड़ों में कितने पेड़ जीवित बचे और उनकी जीवित रहने की दर क्या रही।

देखा जाए तो एनजीटी ने परियोजना को हरी झंडी जरूर दे दी है, लेकिन साथ ही यह स्पष्ट संदेश भी दिया है कि विकास का रास्ता पर्यावरणीय जवाबदेही से होकर ही गुजरेगा।

ऐसे में एनजीटी का यह फैसला विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की नई कसौटी बन सकता है, जहां सड़क निर्माण के साथ हरियाली बचाने की जवाबदेही भी बराबर तय की गई है।