बच्चों को इंटरनेट और सोशल मीडिया से दूर कर देना उनके ऑनलाइन शोषण का समाधान नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने 15 अक्टूबर, 2026 को दिए अपने आदेश में स्पष्ट किया कि बच्चों की सुरक्षा के नाम पर इंटरनेट तक उनकी पहुंच पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय उन लोगों और प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करनी होगी, जो उनके शोषण के लिए जिम्मेदार हैं।
न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के वी चंद्रन की पीठ ने बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री के प्रसार पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि ऐसे प्रतिबंधों से बच्चों की सुरक्षा बढ़ने का कोई ठोस प्रमाण नहीं है।
137 पन्नों के आदेश में अदालत ने केंद्र सरकार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसी सामग्री की पहचान और उसे हटाने के लिए तकनीकी निगरानी मजबूत करने के निर्देश दिए।
इसके तहत परसेप्चुअल हैश मैचिंग, यूआरएल सूची और अन्य तकनीकी उपायों के लिए दिशानिर्देश तथा मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करनी होगी।
अदालत ने ऐसी सामग्री की पहचान के लिए राष्ट्रीय हैश और यूआरएल डेटाबेस बनाने तथा पेड और सब्सक्रिप्शन आधारित सामग्री की जांच सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया।
अदालत का संदेश साफ है—बच्चों को डिजिटल दुनिया से काटना नहीं, बल्कि उसे उनके लिए सुरक्षित बनाना जरूरी है।
इंटरनेट की दुनिया बच्चों के लिए कितनी सुरक्षित है, यह सवाल आज हर माता-पिता की चिंता का हिस्सा बन चुका है। सोशल मीडिया पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री का तेजी से फैलना इस चिंता को और गहरा करता है। लेकिन क्या बच्चों को इंटरनेट से दूर कर देना ही इसका समाधान है?
सुप्रीम कोर्ट ने इस सोच को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि बच्चों की सुरक्षा के नाम पर उन पर ही इंटरनेट का इस्तेमाल करने की पाबंदी लगाना उचित नहीं है। जरूरत बच्चों को डिजिटल दुनिया से काटने की नहीं, बल्कि उनका शोषण करने वालों और ऐसी सामग्री फैलाने वाले मंचों पर सख्ती करने की है।
15 अक्टूबर, 2026 को दिए अपने आदेश में शीर्ष अदालत ने बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री (सीएसईएएम) के सोशल मीडिया पर प्रसार को गंभीर चिंता का विषय माना। हालांकि, अदालत ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के सुझाव को स्वीकार नहीं किया।
न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के वी चंद्रन की पीठ ने कहा कि बच्चों की इंटरनेट तक पहुंच पर पूरी तरह रोक लगाने जैसे उपायों के प्रभावी होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। अदालत के मुताबिक, अब तक कोई भी देश या न्यायक्षेत्र यह साबित नहीं कर पाया है कि ऐसे प्रतिबंधों से बच्चे वास्तव में अधिक सुरक्षित हो जाते हैं।
अदालत ने माना कि आज इंटरनेट बच्चों के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। लेकिन इस असुरक्षा का समाधान बच्चों को ही डिजिटल दुनिया से दूर रखना नहीं हो सकता। सुरक्षा के उपाय उन लोगों और व्यवस्थाओं पर केंद्रित होने चाहिए, जो बच्चों के शोषण के लिए जिम्मेदार हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण बात स्पष्ट की। बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री बनाने, उसे प्रसारित करने, बेचने या जानबूझकर हासिल करने वाले लोग अपराध के लिए जिम्मेदार हैं।
इसके साथ ही, ऐसी सामग्री की पहचान करने और उसे हटाने में विफल रहने वाले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और अन्य मध्यस्थों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।
अदालत का जोर इस बात पर था कि दूसरों की विफलताओं की सजा बच्चों को नहीं दी जा सकती। यदि कोई प्लेटफॉर्म आपत्तिजनक सामग्री को रोकने में नाकाम रहता है, तो इसका समाधान बच्चों की इंटरनेट तक पहुंच सीमित करना नहीं, बल्कि उस प्लेटफॉर्म की जवाबदेही तय करना है।
137 पन्नों के अपने आदेश में पीठ ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री की पहचान करने और उसे हटाने के लिए एक प्रस्तावित नियामक व्यवस्था की रूपरेखा भी पेश की।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ऐसी सामग्री की पहचान और उसे हटाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे तकनीकी उपायों की जानकारी देने को कहा है।
अदालत ने निर्देश दिया कि केंद्र सरकार सभी प्रमुख सोशल मीडिया मध्यस्थों के लिए दिशानिर्देश या मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करे। इसमें परसेप्चुअल हैश मैचिंग और यूआरएल सूची के इस्तेमाल को शामिल किया जाए, ताकि बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री की पहचान कर उसे तेजी से हटाया जा सके।
गौरतलब है कि परसेप्चुअल हैश मैचिंग एक ऐसी तकनीक है, जो किसी तस्वीर या वीडियो में बदलाव किए जाने के बावजूद उसकी पहचान करने में मदद कर सकती है। वहीं, यूआरएल सूची के जरिए ऐसी सामग्री से जुड़े इंटरनेट पतों की पहचान की जा सकती है, ताकि उन्हें हटाने या उन तक पहुंच रोकने की कार्रवाई की जा सके।
अदालत ने यह भी कहा कि एसओपी में अन्य जरूरी तकनीकी उपायों को शामिल किया जाए, जिन्हें प्रत्येक मध्यस्थ को अपनाना होगा। जरूरत पड़ने पर सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में भी संशोधन किया जाए। इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को इन दिशानिर्देशों और एसओपी की समय-समय पर समीक्षा कर उन्हें अपडेट करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री की पहचान और उसे हटाने के लिए एक राष्ट्रीय हैश और यूआरएल सूची डेटाबेस बनाने का निर्देश भी दिया है।
यह डेटाबेस सहयोग पोर्टल के हिस्से के रूप में बनाया जा सकता है या इसके लिए एक अलग व्यवस्था विकसित की जा सकती है। इसका उद्देश्य ऐसी सामग्री की पहचान और उसे हटाने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना है।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जब कोई मध्यस्थ अपने प्लेटफॉर्म से ऐसी सामग्री हटाए, तो उस स्थान पर स्पष्ट रूप से एक सूचना प्रदर्शित की जाए। इससे उपयोगकर्ता को पता चल सकेगा कि सामग्री हटाई जा चुकी है।
अदालत ने केंद्र सरकार से पेड और सब्सक्रिप्शन आधारित सामग्री की उचित जांच सुनिश्चित करने के लिए दिशानिर्देश तैयार करने को कहा है। सोशल मीडिया और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध ऐसी सामग्री की भी निगरानी होनी चाहिए, ताकि बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री को पहचाना और हटाया जा सके।
इन दिशानिर्देशों में ऐसे उचित और आनुपातिक उपाय भी तय किए जाने चाहिए, जिनसे यह नियंत्रित किया जा सके कि बच्चे किस तरह की सामग्री देख सकते हैं या उसके लिए सब्सक्रिप्शन ले सकते हैं।
देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का संदेश स्पष्ट है- बच्चों की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर उनके अवसरों और इंटरनेट तक पहुंच को पूरी तरह सीमित कर देना इसका स्थाई समाधान नहीं है।
असल चुनौती ऐसी डिजिटल व्यवस्था बनाने की है, जहां बच्चों का शोषण करने वालों पर कार्रवाई हो, सोशल मीडिया कंपनियां जवाबदेह बनें और तकनीक का इस्तेमाल बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए किया जाए।