हिमालय के जंगल केवल प्राकृतिक सुंदरता का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि जलवायु परिवर्तन से लड़ने वाले बेहद महत्वपूर्ण प्राकृतिक कार्बन भंडार भी हैं।
गढ़वाल हिमालय में किए गए नए अध्ययन से पता चला है कि ऊंचाई बदलते ही जंगलों का कार्बन संजोने का तरीका भी बदल जाता है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सदियों पुराने देवदार के जंगल अपने विशाल तनों और जैव-भार में सबसे अधिक कार्बन संग्रहित करते हैं, जबकि निचले हिस्सों के मिश्रित चौड़ी पत्ती वाले वन मिट्टी में लंबे समय तक कार्बन सुरक्षित रखकर जलवायु संतुलन बनाए रखते हैं।
बीच के चीड़ के जंगल भी इस प्राकृतिक कार्बन चक्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि यही विविधता हिमालय को एक प्रभावी प्राकृतिक कार्बन बैंक बनाती है।
अध्ययन इस बात पर भी जोर देता है कि पूरे हिमालय के लिए एक जैसी वन संरक्षण नीति प्रभावी नहीं हो सकती। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पुराने देवदार वनों की सुरक्षा और निचले इलाकों में मिश्रित चौड़ी पत्ती वाले वनों का विस्तार अलग-अलग प्राथमिकताएं होनी चाहिए।
यदि इन निष्कर्षों को वन प्रबंधन में अपनाया जाए, तो भारत हिमालय की कार्बन भंडारण क्षमता बढ़ाने, जैव विविधता की रक्षा करने और अपने जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण बढ़त हासिल कर सकता है।
जब हम हिमालय पर ऊंचाइयों की ओर बढ़ते हैं, तो अक्सर जंगलों की खूबसूरती में खो जाते हैं। लेकिन इन शांत पहाड़ों के बीच प्रकृति का एक ऐसा अद्भुत अनदेखा खेल चल रहा है, जो दबे पांव हमारी धरती पर जीवन को बचाने की कोशिश कर रहा है।
हिमालय के गढ़वाल क्षेत्र में किए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि हिमालय पर मौजूद सभी जंगल एक जैसे तरीके से कार्बन नहीं संजोते, बल्कि ऊंचाई के साथ उनकी भूमिका बदल जाती है। रिसर्च से पता चला है कि जहां ऊंचाई पर सदियों से खड़े देवदार अपने विशाल तनों में कार्बन को सुरक्षित रखते हैं, वहीं नीचे मिश्रित चौड़ी पत्ती वाले जंगल मिट्टी में कार्बन को लंबे समय तक संजो कर जलवायु परिवर्तन से लड़ने में अहम भूमिका निभाते हैं।
उत्तराखंड यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फॉरेस्ट्री, इंदिरा गांधी नेशनल ट्राइबल यूनिवर्सिटी, इंडियन कॉउन्सिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन, एचएनबी गढ़वाल यूनिवर्सिटी और चाइनीज एकडेमी ऑफ साइंसेज से जुड़े शोधकर्ता अरविंद सिंह, विनोद प्रसाद खंडूरी और उनकी टीम ने गढ़वाल हिमालय के जंगलों का विस्तृत अध्ययन किया है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल कार्बन रिसर्च में प्रकाशित हुए हैं।
एक ही पहाड़, लेकिन कार्बन संजोने के अलग-अलग तरीके
इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने हिमालय की अलग-अलग ऊंचाई पर स्थित तीन प्रकार के जंगलों का अध्ययन किया। इनमें 1,900 से 2,300 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद देवदार के जंगल, 1,550 से 1,950 मीटर के बीच चीड़ के जंगल और 500 से 1,000 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद मिश्रित चौड़ी पत्ती वाले जंगल शामिल थे।
अध्ययन में पेड़ों के बायोमास और मिट्टी में मौजूद कार्बन की मात्रा का आकलन किया गया। इसके लिए मिट्टी की दो अलग-अलग गहराइयों से नमूने लेकर जांच की गई।
ऊंचाई पर खड़े देवदार हैं कार्बन के सबसे बड़े संरक्षक
अध्ययन के नतीजे दर्शाते हैं कि देवदार के जंगल सबसे ज्यादा कार्बन संजो रहे हैं। इन जंगलों में केवल पेड़ों के जैव-भार (बायोमास) में ही प्रति हेक्टेयर 230.85 से 274.85 मेगाग्राम तक कार्बन संग्रहित मिला, जो तीनों प्रकार के वनों में सबसे अधिक है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, देवदार जैसे विशाल और सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहने वाले वृक्ष धीरे-धीरे अपने तनों और शाखाओं में कार्बन जमा करते रहते हैं। यही वजह है कि ये जंगल प्राकृतिक 'कार्बन बैंक' की तरह काम करते हैं और दशकों तक वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को सोखते रहते हैं।
बीच में फैले चीड़ के पेड़ भले ही देवदार जितने विशाल न हों, लेकिन ये भी बड़े पैमाने पर कार्बन को सोखकर पूरे क्षेत्र का संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। आंकड़े दर्शाते हैं कि ये जंगल प्रति हेक्टेयर 106.81 से 123.85 मेगाग्राम तक कार्बन स्टोर कर रहे हैं।
नीचे के मिश्रित जंगल मिट्टी में संजो रहे कार्बन
जैसे ही आप पहाड़ के निचले हिस्सों में आते हैं, कहानी पूरी तरह बदल जाती है। यहां विभिन्न प्रजातियों के चौड़ी पत्ती वाले पेड़-पौधे उगते हैं। ये जंगल पेड़ों की लकड़ी में कार्बन जमा करने की होड़ में नहीं पड़ते, बल्कि ये कार्बन को जमीन की गहराइयों में दफन कर देते हैं।
पेड़ों से गिरी पत्तियां, सड़ने वाली जड़ें और गीली मिट्टी मिलकर कार्बन का एक ऐसा अमिट खजाना बनाती हैं जो हवा में वापस जाने के बजाय पीढ़ियों तक मिट्टी में ही जमा रहता है।
28 वृक्ष प्रजातियों वाले मिश्रित वन मिट्टी में कार्बन स्टोर करने के मामले में सबसे बेहतर साबित हुए। खासकर ऊपरी मिट्टी में इनमें सबसे अधिक अत्यधिक सक्रिय (वेरी लैबाइल) कार्बन (7.43 मिलीग्राम प्रति ग्राम) और स्थिर (नॉन-लैबाइल) कार्बन (2.06 मिलीग्राम प्रति ग्राम) पाया गया। इसी तरह इन वनों में सक्रिय कार्बन भंडार (13.48 टन कार्बन प्रति हेक्टेयर) और निष्क्रिय (पैसिव) कार्बन भंडार (6.41 टन कार्बन प्रति हेक्टेयर) भी सबसे अधिक दर्ज किए गए।
शोधकर्ताओं का इस बारे में कहना है कि गिरे हुए पत्ते, सूखी टहनियां और सड़ते-जड़ते जैविक अवशेष इन जंगलों की मिट्टी में धीरे-धीरे ऐसे कार्बन में बदल जाते हैं, जो लंबे समय तक सुरक्षित रहता है और दोबारा वातावरण में नहीं लौटता।
पूरे हिमालय के लिए एक जैसी नीति कारगर नहीं
इस अध्ययन ने साबित कर दिया है कि अगर हमें हिमालय के जंगलों को बचाना है, तो हमें हर ऊंचाई की जरूरत को अलग से समझना होगा।
एक तरफ जहां ऊंचाई पर पुराने देवदार के दरख्तों को कटने से बचाना सबसे बड़ी प्राथमिकता है, क्योंकि वहां कार्बन लकड़ियों में जमा है। दूसरी ओर निचले हिस्सों में नए मिश्रित पेड़ लगाना और चौड़ी पत्ती वाले जंगलों को समृद्ध बनाना महत्वपूर्ण है, ताकि मिट्टी की कार्बन सोखने की ताकत को बढ़ाया जा सके। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि हिमालय के सभी जंगलों के लिए एक जैसी संरक्षण नीति अपनाना प्रभावी नहीं होगा।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि इन निष्कर्षों को वन प्रबंधन योजनाओं में शामिल किया जाए, तो भारत हिमालयी क्षेत्रों की कार्बन भंडारण क्षमता बढ़ाने और अपने जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने की दिशा में बड़ी प्रगति कर सकता है। यह रणनीति राष्ट्रीय हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण मिशन और संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित सतत विकास के 15वें लक्ष्य के अनुरूप भी है।
हालांकि साथ ही शोधकर्ताओं ने इस क्षेत्र में मौसमी बदलावों और सूक्ष्म जीवों (माइक्रोब्स) पर अभी और अध्ययन की जरूरत पर बल दिया है ताकि यह बेहतर समझा जा सके कि प्रकृति का यह चक्र कैसे काम करता है।
यह अध्ययन स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि हिमालय के हर जंगल की अपनी अलग भूमिका है। कहीं सदियों पुराने देवदार अपने तनों में कार्बन को संजोकर धरती की रक्षा कर रहे हैं, तो कहीं नीचे फैले मिश्रित वन अपनी मिट्टी में उसे सुरक्षित रखकर जलवायु परिवर्तन की रफ्तार धीमी कर रहे हैं। इसलिए हिमालय को बचाने का रास्ता किसी एक वन प्रकार को चुनना नहीं, बल्कि हर ऊंचाई पर मौजूद इन विविध जंगलों को उनकी प्राकृतिक पहचान के साथ सुरक्षित रखना है।