जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश का पैटर्न बदल रहा है, जिससे कभी सूखा और कभी अत्यधिक वर्षा की स्थिति बन रही है। फोटो साभार: आईस्टॉक
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अनिश्चित होता जा रहा है भारत में मानसूनी बारिश का समय, बिगड़ रहे हालात

भारत में मानसून का स्वरूप बदल रहा है, देरी, अनिश्चितता और कही अत्यधिक बारिश व कही बारिश की कमी से कृषि, जल प्रबंधन और शहरी जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है

Dayanidhi

  • मानसून का समय अनिश्चित हो रहा है, जिससे खेती, जल संसाधन और मौसम पर आधारित पूरी व्यवस्था प्रभावित हो रही है।

  • जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश का पैटर्न बदल रहा है, जिससे कभी सूखा और कभी अत्यधिक वर्षा की स्थिति बन रही है।

  • किसानों की फसल बुवाई और उत्पादन पर सीधा असर पड़ रहा है, क्योंकि मानसून समय पर नहीं पहुंच रहा या टूट रहा है।

  • शहरों में अचानक तेज बारिश से जलभराव और बाढ़ जैसी स्थिति बढ़ रही है, जबकि लंबे सूखे अंतराल भी देखने को मिल रहे हैं।

  • मानसून की बदलती अनिश्चितता भारत में पानी, बिजली और कृषि योजना के लिए नई रणनीतियों और बेहतर तैयारी की मांग कर रही है।

भारत में मानसून केवल एक मौसम नहीं, बल्कि जीवन की धड़कन माना जाता है। खेती, पीने का पानी, बिजली उत्पादन और अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा इसी पर निर्भर करता है। हर साल किसान उम्मीद करते हैं कि जून के आसपास बारिश शुरू होगी और खेती का काम समय पर शुरू हो जाएगा। नदियां भरती हैं, तालाब और बांध पानी से भर जाते हैं और गर्मी से राहत मिलती है।

लेकिन अब यह भरोसा कमजोर पड़ता दिख रहा है। मानसून का समय और तरीका दोनों बदलते जा रहे हैं। हालांकि आज, भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने अपने ताजा अपडेट में बताया है कि सप्ताह के अंत तक दक्षिण बंगाल की खाड़ी, अंडमान सागर और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के कुछ इलाकों में मानसून पहुंच सकता है।

बारिश का समय अब पहले जैसा नहीं रहा

इवॉल्विंग अर्थ नामक पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, अब मानसून का आना पहले जितना तय नहीं रहा। कभी बारिश देर से आती है, कभी समय से पहले, और कई बार थोड़ी बारिश के बाद लंबे समय तक सूखा पड़ जाता है। फिर अचानक तेज बारिश हो जाती है जिससे बाढ़ जैसी स्थिति बन जाती है।

पहले माना जाता था कि केरल में मानसून जून की शुरुआत में पहुंचता है और धीरे-धीरे पूरे देश में फैलता है। लेकिन अब यह प्रक्रिया कई बार टूट जाती है। कुछ क्षेत्रों में बारिश देर से पहुंचती है, तो कुछ जगहों पर अचानक बहुत अधिक बारिश हो जाती है

जलवायु परिवर्तन का असर

विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका मुख्य कारण जलवायु परिवर्तन है। पृथ्वी का तापमान बढ़ने से समुद्र और जमीन दोनों के तापमान में बदलाव आ रहा है। इससे हवाओं का पैटर्न बदल रहा है, जो मानसून को प्रभावित करता है।

इसके अलावा एल नीनो, ला नीना और अन्य जलवायु घटनाएं भी मानसून को अस्थिर बना रही हैं। कभी ये प्रणालियां बारिश को कमजोर कर देती हैं, तो कभी बहुत तेज कर देती हैं। पहले इनका असर कुछ हद तक समझा जा सकता था, लेकिन अब यह व्यवहार अधिक अनिश्चित हो गया है।

खेती पर बड़ा असर

भारत में खेती का बड़ा हिस्सा मानसून की बारिश पर निर्भर है। खासकर खरीफ की फसलें जैसे धान, मक्का और दालें समय पर बारिश पर निर्भर होती हैं। अगर बारिश देर से आती है, तो बुवाई भी देर से होती है। इससे पूरी फसल का चक्र प्रभावित हो जाता है।

कभी-कभी किसान जल्दी बुवाई कर देते हैं, लेकिन बारिश न आने से बीज खराब हो जाते हैं। दूसरी तरफ अचानक भारी बारिश से खेतों में पानी भर जाता है और फसल नष्ट हो जाती है। इससे किसानों की आय पर सीधा असर पड़ता है।

पानी और शहरों की समस्या

मानसून का अनियमित होना केवल खेती तक सीमित नहीं है। शहरों में भी इसका असर दिख रहा है। कई बार बहुत कम समय में तेज बारिश होती है, जिससे सड़कों पर पानी भर जाता है और बाढ़ जैसी स्थिति बन जाती है।

दूसरी ओर, लंबे सूखे अंतराल के कारण पानी की कमी भी बढ़ जाती है। बांधों और जलाशयों में पानी का स्तर ठीक से नहीं भर पाता, जिससे पीने के पानी और बिजली उत्पादन पर असर पड़ता है।

समय का संतुलन बिगड़ रहा है

सबसे बड़ी समस्या अब बारिश की मात्रा नहीं, बल्कि उसका समय है। पहले मानसून एक तय समय पर आता था और धीरे-धीरे पूरे मौसम में फैलता था। इससे खेती, पानी और शहरों की योजना आसानी से बन जाती थी।

अब यही संतुलन बिगड़ रहा है। बारिश कभी जल्दी, कभी देर से और कभी बहुत कम समय में बहुत ज्यादा हो रही है। इस बदलाव को “समय की अनिश्चितता” कहा जा सकता है, जो पूरे सिस्टम को प्रभावित कर रही है।

आगे की चुनौती

शोधकर्ताओं का मानना है कि आने वाले समय में भारत को अपनी खेती, पानी की व्यवस्था और शहरों की योजना को नए तरीके से बनाना होगा। मौसम अब पहले जैसा स्थिर नहीं रहा, इसलिए तैयारी भी अधिक लचीली होनी चाहिए।

अगर समय पर सही कदम नहीं उठाए गए, तो मानसून की यह अनिश्चितता आने वाले वर्षों में भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।