एक नए अध्ययन से पता चला है कि माइक्रोप्लास्टिक महासागरों की कार्बन सोखने की क्षमता को कमजोर कर रहे हैं। ये कण समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में बाधा डालते हैं, जिससे जलवायु संकट बढ़ता है।
माइक्रोप्लास्टिक, फाइटोप्लैंकटन की प्रकाश-संश्लेषण क्षमता को घटा देते हैं। साथ ही ये जूप्लैंकटन के चयापचय को भी नुकसान पहुंचाते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि महासागरों की कार्बन सोखने की क्षमता कमजोर पड़ती जाती है।
शोधकर्ताओं ने चेताया है कि इन बदलावों का असर महज महासागरों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे मछली उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और तटीय इलाकों में रहने वाले करोड़ों लोगों की जीविका भी असर पड़ सकता है।
आंकड़ों के मुताबिक मानव गतिविधियों से पैदा हुई कुल कार्बन डाइऑक्साइड का करीब 25 से 30 फीसदी हिस्सा महासागर पहले ही सोख चुके हैं, जो कार्बन सिंक के रूप में इनके महत्व को उजागर करता है।
जिस प्राकृतिक ढाल के भरोसे धरती जलवायु संकट से जूझ रही है, वह ढाल अब कमजोर पड़ने लगी है। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला है कि माइक्रोप्लास्टिक महासागरों के कार्बन सोखने की क्षमता को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में फैल चुके प्लास्टिक के ये महीन कण उन प्राकृतिक प्रक्रियाओं में बाधा डाल रहे हैं, जिनसे महासागर कार्बन को जमा करते हैं और पृथ्वी के बढ़ते तापमान को संतुलित रखते हैं। ह अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ शारजाह, द एजुकेशन यूनिवर्सिटी ऑफ हांगकांग, बीजिंग नार्मल यूनिवर्सिटी और पेशावर विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है।
इसके नतीजे जर्नल ऑफ हैजर्डस मैटेरियल्स: प्लास्टिक्स में प्रकाशित हुए हैं।
खतरे में पृथ्वी के सबसे बड़े कार्बन सिंक
आपको जानकर हैरानी होगी कि महासागर हर साल इंसानी गतिविधियों के कारण उत्सर्जित हो रही करीब एक-चौथाई कार्बन डाइऑक्साइड को अपने भीतर समेट लेते हैं। इसके साथ ही यह ऑक्सीजन का सबसे बड़ा स्रोत भी हैं। यही वजह है कि इन्हें धरती की सबसे बड़ी प्राकृतिक सुरक्षा ढाल माना जाता है।
शारजाह विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक और अध्ययन से जुड़े शोधकर्ता डॉक्टर इहसानुल्लाह ओबैदुल्लाह का कहना है, “माइक्रोप्लास्टिक जलवायु परिवर्तन के खिलाफ महासागरों की इस प्राकृतिक ढाल को कमजोर कर रहे हैं।" उनके मुताबिक अब प्लास्टिक प्रदूषण से लड़ना, ग्लोबल वॉर्मिंग से लड़ने का हिस्सा बन चुका है।
आंकड़ों के मुताबिक मानव गतिविधियों से पैदा हुई कुल कार्बन डाइऑक्साइड का करीब 25 से 30 फीसदी हिस्सा महासागर पहले ही सोख चुके हैं, जो कार्बन सिंक के रूप में इनके महत्व को उजागर करता है।
हर जगह मौजूद माइक्रोप्लास्टिक
गौरतलब है प्लास्टिक के पांच मिलीमीटर से भी छोटे ये कण आज पृथ्वी के हर हिस्से में पहुंच चुके हैं। चिंता की बात है कि ये कण समुद्र की गहराइयों से लेकर, आर्कटिक की बर्फ, मिट्टी, हवा, पानी, बादल, ग्लेशियर और यहां तक कि मानव शरीर तक में अपनी पैठ बना चुके हैं।
इनका हर जगह फैल जाना पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन चुका है। माइक्रोप्लास्टिक के साथ जहरीले तत्व भी मौजूद होते हैं, जो इंसानों के साथ दूसरे जीवों में भी पहुंच जाते हैं।
इससे कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, पारिस्थितिकी तंत्र बिगड़ता है, जलजीवों को नुकसान पहुंचता है और मिट्टी की उर्वरता भी घटती है। यही वजह है कि प्लास्टिक के इन कणों को लंबे समय से प्रदूषण के लिए बड़ी समस्या माना जाता रहा है, लेकिन जलवायु संकट में इनकी भूमिका पर अब तक कम ही ध्यान दिया गया है।
कार्बन चक्र को बिगाड़ता माइक्रोप्लास्टिक
वैज्ञानिकों के मुताबिक महासागरों में कार्बन जमा होने की एक अहम प्रक्रिया है, जिसे ‘जैविक कार्बन पंप’ के रूप में जाना जाता है। समुद्र की ऊपरी सतह पर रहने वाले बहुत छोटे पौधे, जिन्हें फाइटोप्लैंकटन कहा जाता है, सूरज की रोशनी से भोजन बनाते हैं। इस दौरान वे हवा में घुली कार्बन डाइऑक्साइड को भी सोख लेते हैं। इसके बाद जब ये फाइटोप्लैंकटन मरते या मछलियों और दूसरे समुद्री जीवों (जूप्लैंकटन) द्वारा खा लिए जाते हैं, तो इनमें जमा कार्बन उनके शरीर, मल या मृत अवशेषों के साथ समुद्र की गहराई में डूब जाता है।
इस तरह कार्बन समुद्र की ऊपरी सतह से नीचे गहराई में पहुंच जाता है, जहां वो सैकड़ों-हजारों साल तक जमा रह सकता है। इसी प्राकृतिक “पंप” को ‘जैविक कार्बन पंप’ कहा जाता है।
अध्ययन में सामने आया है कि माइक्रोप्लास्टिक, फाइटोप्लैंकटन की प्रकाश-संश्लेषण क्षमता को घटा देते हैं। साथ ही ये जूप्लैंकटन के चयापचय को भी नुकसान पहुंचाते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि महासागरों की कार्बन सोखने की क्षमता कमजोर पड़ती जाती है।
‘प्लास्टिस्फियर’ और बढ़ता खतरा
अध्ययन में एक और चिंताजनक पहलू सामने आया है और वो है ‘प्लास्टिस्फियर’, यानी प्लास्टिक के कणों पर पनपने वाले सूक्ष्म जीवों की दुनिया। ये सूक्ष्मजीव कार्बन और नाइट्रोजन चक्र को प्रभावित कर सकते हैं और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी योगदान दे सकते हैं।
डॉक्टर ओबैदुल्लाह चेताते हैं, “समय के साथ माइक्रोप्लास्टिक समुद्री जीवन को नुकसान पहुंचाता है, जैविक कार्बन पंप को कमजोर करता है और खुद टूटकर ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित करता है। इससे समुद्र गर्म होंगे, अम्लीय बनेंगे, जिससे जैव विविधता को भारी नुकसान पहुंचेगा।“
शोधकर्ताओं ने यह भी चेतावनी दी है कि इन बदलावों का असर महज महासागरों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे मछली उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और तटीय इलाकों में रहने वाले करोड़ों लोगों की जीविका भी असर पड़ सकता है।
वातावरण में तेजी से बढ़ता प्लास्टिक
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक हाल के दशकों में प्लास्टिक का उत्पादन तेजी से बढ़ा है और आज दुनिया में हर साल औसतन 40 करोड़ टन प्लास्टिक पैदा हो रहा है।" संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास संगठन (यूएनसीटीएडी) ने अपनी रिपोर्ट 'ग्लोबल ट्रेड अपडेट' में जानकारी दी है कि 2023 में वैश्विक स्तर पर 43.6 करोड़ मीट्रिक टन प्लास्टिक का उत्पादन हुआ। इसमें से करीब आधा आधा सिंगल-यूज प्लास्टिक होता है।
1950 में वैश्विक स्तर पर महज 20 लाख टन प्लास्टिक का उत्पादन किया गया था, जो 2022 में 238 गुणा बढ़कर 47.5 करोड़ टन पर पहुंच गया। आशंका है कि जिस तेजी से प्लास्टिक उत्पादन बढ़ रहा है यदि वो रफ्तार जारी रहती है तो 2060 तक यह तीन गुना और बढ़ जाएगा। अनुमान है कि 2060 तक प्लास्टिक उत्पादन बढ़कर 120 करोड़ टन पर पहुंच सकता है।
समस्या यह है कि अब तक बना करीब 75 फीसदी प्लास्टिक कचरे में तब्दील हो चुका है। देखा जाए तो हर साल इतनी बड़ी मात्रा में प्लास्टिक उत्पादन के बावजूद 10 फीसदी से ही कम प्लास्टिक कचरा रीसायकल हो रहा है। बाकी या तो जला दिया जाता है या फिर पर्यावरण में डंप कर दिया जाता है।
इसका बड़ा हिस्सा समुद्रों और पारिस्थितिक तंत्र में पहुंच रहा है। इससे पृथ्वी पर प्रदूषण का संकट और गहराता जा रहा है। चूंकि प्लास्टिक बहुत धीरे-धीरे नष्ट होता है, इसलिए अब तक बना करीब 80 फीसदी प्लास्टिक आज भी पर्यावरण या लैंडफिल में मौजूद है।
जलवायु संकट और प्लास्टिक, एक ही सिक्के के दो पहलू
अध्ययन साफ कहता है कि अब प्लास्टिक प्रदूषण और जलवायु संकट को अलग-अलग समस्याएं मानने की भूल नहीं की जा सकती। ऐसे में शोधकर्ताओं ने सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से अपील की है कि सिंगल-यूज प्लास्टिक पर सख्ती की जाए, कचरा प्रबंधन को बेहतर बनाया जाए। साथ ही जैव-अपघटनीय विकल्पों को बढ़ावा दिया जाए।
इसके साथ ही शोधकर्ताओं ने माइक्रोप्लास्टिक और जलवायु के संबंध पर और अधिक शोध करने पर भी जोर दिया है। उन्होंने प्लास्टिक प्रदूषण की बेहतर निगरानी के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करने का भी सुझाव दिया है।
यह अध्ययन स्पष्ट संकेत देता है कि प्लास्टिक प्रदूषण और जलवायु संकट एक ही जंग के दो मोर्चे हैं। ऐसे में जब तक बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण पर लगाम नहीं लगेगी और समुद्रों को माइक्रोप्लास्टिक से बचाने के ठोस कदम नहीं उठाए जाएंगे, तब तक जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जारी जंग जीती नहीं जा सकेगी।