धरती को सूरज की खतरनाक पराबैंगनी किरणों से बचाने वाली ओजोन परत को हुआ नुकसान हमारी सोच से कहीं पहले शुरू हो चुका था।
मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) के नए अध्ययन के मुताबिक, अगर आज जैसी उन्नत निगरानी तकनीकें पिछली सदी के मध्य में उपलब्ध होतीं, तो वैज्ञानिक 1957 में ही ओजोन क्षरण के शुरुआती संकेत पकड़ सकते थे, यानी 1985 में अंटार्कटिका के ऊपर ‘ओजोन छिद्र’ की खोज से करीब 30 साल पहले।
अध्ययन में सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह है कि शुरुआती नुकसान के पीछे क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) नहीं, बल्कि कार्बन टेट्राक्लोराइड नाम का औद्योगिक रसायन था, जिसका इस्तेमाल 1930 के दशक से ड्राई-क्लीनिंग और मशीनों की सफाई में होता रहा।
वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर मॉडलों, औद्योगिक उत्सर्जन के ऐतिहासिक आंकड़ों और आइस कोर नमूनों के आधार पर पाया कि ओजोन क्षरण का पहला स्पष्ट संकेत अंटार्कटिका में नहीं, बल्कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के ऊपरी समताप मंडल में उभरा था।
यह शोध सिर्फ अतीत का नया सच सामने नहीं लाता, बल्कि चेतावनी भी देता है कि पर्यावरणीय संकट अक्सर हमारी नजरों में आने से बहुत पहले शुरू हो जाते हैं। ऐसे में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल जैसी सफल पहलों के बावजूद, ओजोन परत की लगातार निगरानी और वैश्विक सतर्कता अब भी उतनी ही जरूरी है।
धरती के ऊपर पसरी ओजोन परत को अक्सर एक अदृश्य ढाल कहा जाता है। यही ढाल सूरज की खतरनाक पराबैंगनी किरणों को रोककर पृथ्वी पर जीवन की रक्षा करती है। लेकिन अब एक नई स्टडी ने इस अदृश्य सुरक्षा कवच की कहानी को और ज्यादा असहज और चिंताजनक बना दिया है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि ओजोन परत को नुकसान 1985 में अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र' की खोज से बहुत पहले ही शुरू हो चुका था। उनके मुताबिक, ओजोन क्षरण के शुरुआती संकेत 1957 में ही दिखाई देने लगे थे।
सोच से कहीं पहले हो चुकी थी ओजोन परत के क्षरण की शुरुआत
मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) ने अपने इस नए अध्ययन में खुलासा किया है कि अगर आज जैसी उन्नत निगरानी तकनीकें पिछली सदी के मध्य में उपलब्ध होतीं, तो वैज्ञानिक ओजोन क्षरण के संकेत 1957 में ही पकड़ सकते थे। यानी, ओजोन छिद्र की खोज से करीब तीन दशक पहले ही इस सुरक्षात्मक परत में गिरावट शुरू हो चुकी थी।
वैज्ञानिकों ने इस बात पर भी प्रकाश डाला है कि ओजोन परत में शुरुआती गिरावट का पहला स्पष्ट संकेत अंटार्कटिका में नहीं, बल्कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के ऊपरी समताप मंडल में दिखाई देता। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस शुरुआती नुकसान के पीछे क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) नहीं, बल्कि कार्बन टेट्राक्लोराइड नाम का एक औद्योगिक रसायन था।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (पीएनएएस) में प्रकाशित हुए हैं। इसमें वैज्ञानिकों ने एक तरह का “क्या होता अगर” प्रयोग किया। उन्होंने कल्पना की कि यदि पिछले 100 वर्षों के दौरान भी आज जैसी उपग्रह तकनीक, वायुमंडलीय निगरानी और विश्लेषण के आधुनिक उपकरण मौजूद होते, तो ओजोन क्षरण का पहला संकेत कब, कहां और किस कारण दिखाई देता।
इस सवाल का जवाब खोजने के लिए वैज्ञानिकों ने पिछले सौ वर्षों के दौरान वायुमंडल की रसायनिक बनावट को कंप्यूटर मॉडलों के जरिए दोबारा बनाया।
उन्होंने 16 अलग-अलग मॉडल तैयार किए, जिनमें अलग-अलग अक्षांशों, ऊंचाइयों, मौसमीय उतार-चढ़ाव, ज्वालामुखी विस्फोटों और अल नीनो जैसे प्राकृतिक कारकों के असर को शामिल किया गया।
अंटार्कटिका नहीं, उष्णकटिबंधीय वायुमंडल में मिला पहला संकेत
इसके बाद इन मॉडलों में उन औद्योगिक रसायनों के ऐतिहासिक उत्सर्जन के आंकड़े जोड़े गए, जिनका इस्तेमाल 20वीं सदी में बड़े पैमाने पर हुआ था। इस दौरान उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि वायुमंडल में जो बदलाव दिख रहे हैं, उनमें से कौन-से बदलाव प्राकृतिक कारणों और कौन-से इंसानी गतिविधियों की वजह से हो रहे हैं।
यहीं से तस्वीर साफ होने लगी। विश्लेषण में पता चला कि इंसानी गतिविधियों से जुड़ा ओजोन क्षय का संकेत 1957 में ही उभरने लगा था। यह भी सामने आया कि ओजोन क्षरण का सबसे शुरुआती स्पष्ट संकेत अंटार्कटिका में नहीं, बल्कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के ऊपरी समताप मंडल में दिखाई देता। वैज्ञानिकों के अनुसार, वहां प्राकृतिक उतार-चढ़ाव अपेक्षाकृत कम होते हैं, इसलिए इंसानी गतिविधियों से पैदा हुआ बदलाव अधिक साफ नजर आ सकता था।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस शुरुआती नुकसान के पीछे क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) नहीं थे, जिन्हें ओजोन क्षय का सबसे बड़ा दोषी माना जाता है। लेकिन नई स्टडी बताती है कि शुरुआती क्षय की कहानी कुछ और थी। वैज्ञानिकों के मुताबिक, कार्बन टेट्राक्लोराइड 1930 के दशक से ही ड्राई-क्लीनिंग और मशीनों की सफाई में चिकनाई हटाने वाले सॉल्वेंट के रूप में इस्तेमाल हो रहा था।
बर्फ की गहराइयों से निकाले गए आइस कोर नमूनों में भी इसके निशान मिले, जिनसे पता चलता है कि 1940 के दशक से ही इसकी मात्रा वातावरण में बढ़ने लगी थी। यही रसायन ओजोन परत पर शुरुआती चोट कर रहा था।
क्यों अहम है यह खोज?
ओजोन परत पृथ्वी के लिए एक सुरक्षात्मक ढाल की तरह काम करती है। यह सूर्य से आने वाली हानिकारक पराबैंगनी (यूवी) किरणों को काफी हद तक रोक देती है। अगर यह परत कमजोर होती है, तो त्वचा संबंधी कैंसर, आंखों की बीमारियां, फसलों को नुकसान और समुद्री पारिस्थितिकी पर गंभीर असर पड़ सकता है।
1980 के दशक में जब वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन छिद्र की खोज की, तब दुनिया ने इससे निपटने के लिए तेजी से कदम उठाए।
1987 में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल लागू किया गया, जिसके तहत क्लोरोफ्लोरोकार्बन और ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाले दूसरे पदार्थों को चरणबद्ध तरीके से खत्म किया गया। इसी वैश्विक प्रयास का नतीजा है कि आज ओजोन परत में सुधार के शुरुआती संकेत दिखने लगे हैं।
बता दें कि कार्बन टेट्राक्लोराइड का उपयोग दुनिया के कई हिस्सों में स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को देखते हुए काफी हद तक बंद किया जा चुका है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से तंत्रिका तंत्र पर असर पड़ सकता है और इसे संभावित कैंसरकारी रसायन भी माना जाता है।
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल से मिली राहत, लेकिन खतरा पूरी तरह टला नहीं
मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत इसके उपयोग पर सख्त नियंत्रण लगाया गया, जिसके बाद वायुमंडल में इसकी मात्रा घटनी शुरू हो चुकी है। हालांकि साथ ही वैज्ञानिकों ने यह भी चेताया है कि यह मान लेना पर्याप्त नहीं कि खतरा पूरी तरह टल गया है।
कई रसायन, भले ही उनका इस्तेमाल बंद हो चुका हो, वातावरण में दशकों तक बने रह सकते हैं और असर डालते रह सकते हैं।
ऐसे में वैज्ञानिकों का कहना है कि निगरानी ढीली नहीं पड़नी चाहिए। सुसान सोलोमन के शब्दों में, दुनिया ने इन खतरनाक रसायनों को हटाने के लिए बड़ा प्रयास किया है, इसलिए यह सुनिश्चित करना भी हमारी जिम्मेदारी है कि वायुमंडल वास्तव में उसी तरह ठीक हो रहा है जैसा हम उम्मीद कर रहे हैं।
देखा जाए तो यह अध्ययन सिर्फ अतीत का एक वैज्ञानिक रहस्य नहीं खोलता, बल्कि वर्तमान के लिए भी एक साफ संदेश देता है कि पर्यावरणीय संकट अक्सर हमारी नजरों में आने से बहुत पहले शुरू हो जाते हैं। इसलिए लगातार निगरानी, वैज्ञानिक समझ और वैश्विक सतर्कता ही हमारी सबसे बड़ी सुरक्षा है।