शोध में कहा गया है कि सोहरा इलाके के कई झरने सूख रहे हैं और इस साल सितंबर के मध्य में ही इसका असर दिखाई देने लगा। फोटो साभार: आईस्टॉक
जलवायु

मेघालय के मावसिनराम व चेरापूंजी पर बढ़ा सूखे का खतरा, तेज बारिश व बढ़ता तापमान बनी चिंता

जलवायु परिवर्तन से मेघालय में बारिश का बदलता पैटर्न, कम होते बरसाती दिन, बढ़ता तापमान और तेज बारिश ने मावसिनराम-चेरापूंजी में सूखे का खतरा बढ़ाया

Dayanidhi

  • बारिश का बदलता पैटर्न: मेघालय में बारिश के दिन घट रहे हैं, जबकि कम समय में तेज बारिश होने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

  • सूखे का बढ़ता खतरा: ज्यादा बारिश के बावजूद पहाड़ी ढलानों से पानी तेजी से बहने से भूजल रिचार्ज प्रभावित हो रहा है।

  • तापमान में बढ़ोतरी: न्यूनतम तापमान में हर साल 0.08 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि से पानी की कमी का दबाव बढ़ सकता है।

  • नदियों का घटता प्रवाह: दूर भविष्य में सारी-गोवाइन और सुरमा-मेघना बेसिन में वार्षिक नदी प्रवाह क्रमशः 9.8 और 11.6 प्रतिशत घट सकता है।

  • जल प्रबंधन जरूरी: वैज्ञानिकों ने बदलती बारिश, बढ़ते तापमान और नदी प्रवाह को ध्यान में रखकर बेहतर जल प्रबंधन रणनीति बनाने पर जोर दिया।

मेघालय के मावसिनराम और चेरापूंजी दुनिया में सबसे ज्यादा बारिश वाली जगहों में गिने जाते हैं। लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण अब इन इलाकों में सूखे का खतरा बढ़ता दिखाई दे रहा है। एक नए अध्ययन में सामने आया है कि यहां बारिश के दिनों की संख्या घट रही है, जबकि कम समय में बहुत तेज बारिश होने की घटनाएं बढ़ रही हैं। बढ़ते तापमान ने भी पानी की समस्या को और गंभीर बना दिया है।

बारिश हो रही, लेकिन बदल गया तरीका

थ्योरेटिकल एंड एप्लाइड क्लाइमेटोलॉजी में प्रकाशित इस अध्ययन में मेघालय और आसपास के इलाकों के 1981 से 2100 तक के जलवायु और जल संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने भविष्य में बारिश और पानी की उपलब्धता में होने वाले बदलावों का अध्ययन किया।

शोध में पाया गया कि मेघालय में बारिश का तरीका लगातार बदल रहा है। पहले जहां कई दिनों तक हल्की या सामान्य बारिश होती थी, वहीं अब बारिश कम दिनों में ज्यादा तेज होने लगी है। यानी बारिश की कुल मात्रा अधिक हो सकती है, लेकिन वह पूरे मौसम में समान रूप से नहीं फैल रही है।

अध्ययन में बारिश की तीव्रता बढ़ने के संकेत मिले हैं। वहीं, बारिश वाले दिनों की संख्या औसतन हर साल 0.40 दिन कम होने का अनुमान है। इससे लंबे समय तक बारिश न होने की स्थिति बढ़ सकती है।

ज्यादा बारिश के बावजूद सूखा क्यों?

मेघालय की पहाड़ी जमीन इस बदलाव को और बड़ी बनाती है। राज्य में कई जगह ढलान बहुत ज्यादा है और मिट्टी भी ज्यादा गहरी नहीं है। जब कम समय में बहुत तेज बारिश होती है तो पानी जमीन में जाने के बजाय तेजी से बहकर नदियों और नालों में चला जाता है।

इससे जमीन के अंदर पानी पहुंचने और भूजल के दोबारा भरने की प्रक्रिया कम हो सकती है। बारिश के मौसम में पानी बहुत ज्यादा दिखाई देने के बावजूद सूखे महीनों में पानी की कमी हो सकती है। यही कारण है कि दुनिया के सबसे अधिक बारिश वाले क्षेत्रों में शामिल मावसिनराम और चेरापूंजी जैसे इलाकों में भी भविष्य में सूखे का खतरा बढ़ने की आशंका जताई गई है।

बढ़ता तापमान बढ़ा रहा पानी का दबाव

अध्ययन में तापमान बढ़ने का भी अनुमान लगाया गया है। न्यूनतम तापमान में हर साल 0.08 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ोतरी हो सकती है।

तापमान बढ़ने से मिट्टी, पेड़-पौधों और दूसरी सतहों से पानी के वाष्पीकरण की प्रक्रिया तेज हो जाती है। इससे जमीन में मौजूद नमी तेजी से कम हो सकती है। ऐसे में बारिश कम होने वाले समय में पानी की उपलब्धता पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

भविष्य में सूखे की घटनाएं बढ़ने की आशंका

शोधकर्ताओं ने सूखे की स्थिति को समझने के लिए तीन महीने की अवधि वाले स्टैंडर्डाइज्ड प्रीसिपिटेशन इवैपो-ट्रांसपिरेशन इंडेक्स यानी एसपीईआई का इस्तेमाल किया।

अध्ययन के अनुसार, भविष्य में मध्यम, गंभीर और अत्यधिक सूखे की घटनाओं की संख्या और तीव्रता बढ़ सकती है। उच्च उत्सर्जन वाले एसएसपी585 परिदृश्य में यह बढ़ोतरी सबसे ज्यादा रहने का अनुमान लगाया गया है। शोध में निकट भविष्य से दूर भविष्य की ओर बढ़ने के साथ सूखे की घटनाओं में वृद्धि का अनुमान सामने आया है। इसका असर खेती, पेयजल और स्थानीय जल संसाधनों पर पड़ सकता है।

नदियों में भी घट सकता है पानी

शोधकर्ताओं ने सारी-गोवाइन और सुरमा-मेघना नदी घाटियों में पानी के प्रवाह में संभावित बदलाव का भी अध्ययन किया। एसएसपी585 परिदृश्य के तहत दूर भविष्य में सारी-गोवाइन बेसिन का औसत वार्षिक जल प्रवाह 9.8 प्रतिशत तक घट सकता है। वहीं सुरमा-मेघना बेसिन में 11.6 प्रतिशत तक कमी का अनुमान है।

नदियों में पानी का प्रवाह मानसून के दौरान सबसे ज्यादा रहने की संभावना है। जून और जुलाई में पानी का स्तर बढ़ने के बाद साल के बाद के महीनों में इसमें तेजी से कमी आ सकती है। इससे बाद के महीनों में पानी की कमी का खतरा बढ़ सकता है।

झरनों के सूखने के संकेत

सोहरा और मावसिनराम के आसपास रहने वाले लोगों ने भी पानी की स्थिति में बदलाव महसूस करने की बात कही है। कई जलस्रोत और झरने इस साल पहले ही सूखने लगे हैं।

शोध में कहा गया है कि सोहरा इलाके के कई झरने सूख रहे हैं और इस साल सितंबर के मध्य में ही उन्हें इसका असर दिखाई देने लगा।

जल प्रबंधन पर देना होगा ध्यान

शोधकर्ताओं ने कहा है कि मेघालय में पानी की योजना बनाते समय केवल कुल बारिश को देखना पर्याप्त नहीं होगा। बारिश की तीव्रता, बारिश वाले दिनों की संख्या, बढ़ता तापमान और नदी घाटियों में पानी के प्रवाह को भी ध्यान में रखना होगा।

अध्ययन में जंगलों के काटे जाने, शहरी विस्तार, भूमि उपयोग में बदलाव और भूजल दोहन जैसे मानवजनित कारणों को शामिल नहीं किया गया है। ये कारण भी पानी की उपलब्धता को प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए वैज्ञानिकों, सरकार और स्थानीय समुदायों के बीच बेहतर सहयोग की जरूरत है। मेघालय का अनुभव यह दिखाता है कि बहुत ज्यादा बारिश वाला क्षेत्र भी जल संकट से सुरक्षित नहीं है। बदलते मौसम में पानी को बचाने और जमीन में पानी पहुंचाने की योजनाएं भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होंगी।