मिट्टी में वायुमंडल से तीन गुना अधिक कार्बन जमा होता है, इसलिए यह जलवायु संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।
सूखी और गर्म परिस्थितियों में मिट्टी का कार्बन तेजी से घटता है व कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में वातावरण में जाता है।
गीली और गर्म मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ती है, क्योंकि सूक्ष्मजीव इसे अपने विकास में उपयोग करते हैं व कम उत्सर्जन करते हैं।
बढ़ते तापमान व सूखे के दौरान सूक्ष्मजीव पुराने और स्थिर कार्बन को भी तोड़ने लगते हैं, जिससे लंबे समय से सुरक्षित कार्बन भी बाहर निकल सकता है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि जलवायु मॉडल में मिट्टी और सूक्ष्मजीवों की भूमिका को शामिल करना बहुत जरूरी है।
हम जिस मिट्टी पर चलते हैं, वह केवल धूल नहीं है। यह धरती का एक बहुत बड़ा “कार्बन बैंक” है। शोध के अनुसार, मिट्टी में हवा (वायुमंडल) की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक कार्बन जमा होता है। यह कार्बन अगर मिट्टी में ही सुरक्षित रहे तो यह जलवायु को संतुलित रखने में मदद करता है।
लेकिन अगर यह कार्बन, कार्बन डाइऑक्साइड बनकर हवा में चला जाए, तो पृथ्वी का तापमान और तेजी से बढ़ सकता है। इसलिए यह समझना बहुत जरूरी है कि मिट्टी में कार्बन रुकेगा या बाहर निकलेगा, यह किन बातों पर निर्भर करता है।
क्या बताता है नया शोध?
हाल ही में वैज्ञानिकों ने एक अहम शोध किया, जो 12 साल तक चला। यह प्रयोग अमेरिका के ओक्लाहोमा में किया गया। इसमें 48 अलग-अलग जमीन के टुकड़ों पर अध्ययन किया गया। कुछ जगहों का तापमान सामान्य रखा गया, जबकि कुछ जगहों को तीन डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया गया, ताकि भविष्य की गर्म जलवायु का प्रभाव समझा जा सके।
वैज्ञानिकों ने पानी की मात्रा भी नियंत्रित की। कुछ जगहों पर सूखा जैसा माहौल बनाया गया, जबकि कुछ जगहों पर ज्यादा पानी दिया गया ताकि नमी वाले मौसम की स्थिति बनाई जा सके। हर साल उन्होंने मिट्टी की जांच की और देखा कि इन परिस्थितियों में क्या बदलाव आते हैं।
पानी की भूमिका सबसे अहम
नेचर क्लाइमेट चेंज नामक पत्रिका में प्रकाशित इस शोध का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह था कि मिट्टी में कार्बन को बनाए रखने में पानी की बहुत बड़ी भूमिका होती है। जब मिट्टी सूखी और गर्म थी, तब उसमें मौजूद कार्बन का लगभग 12.2 फीसदी हिस्सा खत्म हो गया। यानी यह कार्बन हवा में चला गया।
लेकिन जब मिट्टी गीली और गर्म थी, तब कार्बन में लगभग 6.7 फीसदी की वृद्धि हुई। यानी ज्यादा पानी होने से मिट्टी ने और अधिक कार्बन को अपने अंदर जमा कर लिया। इससे साफ होता है कि मिट्टी की नमी कार्बन को बचाने में मदद करता है।
माइक्रोब्स का बड़ा योगदान
इस बदलाव के पीछे पौधे नहीं, बल्कि मिट्टी में रहने वाले छोटे-छोटे जीव यानी सूक्ष्मजीव (माइक्रोब्स) जिम्मेदार हैं। ये जीव इतने छोटे होते हैं कि इन्हें हम आंखों से नहीं देख सकते, लेकिन इनका असर बहुत बड़ा होता है।
जब मौसम गर्म और सूखा होता है, तो माइक्रोब्स के लिए यह एक तनावपूर्ण स्थिति होती है। ऐसे में वे जीवित रहने के लिए ज्यादा कार्बन का उपयोग करते हैं और उसे कार्बन डाइऑक्साइड के रूप में हवा में छोड़ देते हैं।
वहीं, जब मिट्टी गीली होती है, तो माइक्रोब्स बेहतर तरीके से बढ़ते हैं और कार्बन का उपयोग अपने विकास के लिए करते हैं। इससे कम कार्बन हवा में जाता है और ज्यादा मिट्टी में ही रहता है।
एक चिंताजनक खोज
इस शोध में एक और महत्वपूर्ण और चिंताजनक बात सामने आई। सूखे के दौरान माइक्रोब्स ने मिट्टी में मौजूद बहुत पुराने और स्थिर कार्बन को भी तोड़ना शुरू कर दिया। यह वही कार्बन है जिसे वैज्ञानिक पहले सुरक्षित मानते थे और सोचते थे कि यह सैकड़ों साल तक मिट्टी में ही रहेगा।
लेकिन अब यह साफ हो गया है कि अगर सूखा बढ़ता है, तो यह पुराना कार्बन भी बाहर निकल सकता है। इससे जलवायु परिवर्तन की रफ्तार और तेज हो सकती है।
भविष्य के लिए क्या हैं संकेत?
यह शोध बताता है कि जलवायु परिवर्तन को समझने के लिए केवल तापमान ही नहीं, बल्कि मिट्टी और उसमें रहने वाले माइक्रोब्स को भी ध्यान में रखना जरूरी है। अगर भविष्य में मौसम ज्यादा गर्म और सूखा होता है, तो मिट्टी से बड़ी मात्रा में कार्बन निकल सकता है।
इसलिए वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य के जलवायु मॉडल बनाते समय इन सूक्ष्मजीवों की भूमिका को जरूर शामिल करना चाहिए।
अंत में, यह कहा जा सकता है कि मिट्टी और पानी का सही संतुलन बनाए रखना पृथ्वी के भविष्य के लिए बहुत जरूरी है। अगर हम मिट्टी को सूखने से बचा पाए, तो हम जलवायु परिवर्तन के खतरे को कुछ हद तक कम कर सकते हैं।