वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ₂) का स्तर एक बार फिर रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया है। हवाई स्थित मौना लोआ वेधशाला में मई 2026 के दौरान इसका औसत स्तर 432 पीपीएम दर्ज किया गया, जो अब तक के सबसे ऊंचे स्तरों में से एक है।
यह लगातार तीसरा वर्ष है जब सीओ₂ ने नया रिकॉर्ड बनाया है, जो इस बात का संकेत है कि जलवायु संकट लगातार गहराता जा रहा है।
1958 में जब यहां पहली बार सीओ₂ की निगरानी शुरू हुई थी, तब इसका स्तर 313 पीपीएम था। आज यह बढ़कर 432 पीपीएम तक पहुंच चुका है, यानी 68 वर्षों में 119 पीपीएम की चिंताजनक वृद्धि हुई है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, वातावरण में बढ़ती कार्बन डाइऑक्साइड पृथ्वी के चारों ओर एक "गर्मी के कंबल" की तरह काम करती है, जो तापमान बढ़ाने के साथ-साथ लू, सूखे, बाढ़, जंगलों में आग और अत्यधिक वर्षा जैसी चरम मौसमी घटनाओं को और अधिक गंभीर बना रही है।
इसका असर केवल जमीन तक सीमित नहीं है, बल्कि समुद्रों के अम्लीकरण के जरिए समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को भी नुकसान पहुंचा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सीओ₂ के लगातार बढ़ते स्तर इस बात की स्पष्ट चेतावनी हैं कि यदि जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से कटौती नहीं की गई, तो जलवायु संकट और भयावह रूप ले सकता है।
हर गुजरते दिन के साथ जलवायु संकट थमने की जगह और गहराता जा रहा है। नतीजन दुनिया पहले से कहीं अधिक भीषण गर्मी, लू, सूखे, बाढ़ और जंगलों में धधकती आज जैसी विनाशकारी आपदाओं का सामना कर रही है।
इसकी सबसे बड़ी वजह वातावरण में लगातार बढ़ रही कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ₂) है, जो पृथ्वी के तापमान को खतरनाक स्तर तक पहुंचा रही है। इस बीच वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर एक बार फिर रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया है।
अमेरिका की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के 'स्क्रिप्स इंस्टीट्यूशन ऑफ ओशियानोग्राफी' और अमेरिकी मौसम एजेंसी नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (एनओएए) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल मई में हवाई की मौना लोआ वेधशाला में कार्बन डाइऑक्साइड का औसत स्तर 432 भाग प्रति मिलियन (पीपीएम) दर्ज किया गया।
रिकॉर्ड पर रिकॉर्ड: थम नहीं रही सीओ₂ की रफ्तार
रुझानों की मानें तो यह पिछले साल मई 2025 की तुलना में 1.8 पीपीएम की भारी वृद्धि को दर्शाता है। गौरतलब है कि इससे पहले मई 2025 के दौरान हवा में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड की औसत मात्रा 430.2 पीपीएम रिकॉर्ड की गई थी। यह मई 2024 की तुलना में 3.5 पीपीएम अधिक थी।
मई 2023 में भी सीओ₂ के बढ़ते स्तर ने पिछले आठ लाख वर्षों के रिकॉर्ड को तोड़ दिया था। बता दें कि मई 2023 में वातावरण में मौजूद सीओ2 का स्तर 424 भाग प्रति मिलियन (पीपीएम) पर पहुंच गया था। मतलब कि पिछले लगातार तीन सालों से वातावरण में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर लगातार बढ़ रहा है।
ऐसे में वैज्ञानिकों का मानना है कि यह बढ़ोतरी न केवल धरती को और अधिक गर्म करेगी, बल्कि चरम मौसमी घटनाओं को पहले से अधिक अधिक खतरनाक बना देगी। देखा जाए तो यह महज आंकड़े नहीं है, यह इस बात का सबूत है कि हम विनाश के उस मुहाने पर खड़े हैं जहां से वापसी का रास्ता हर दिन दूर होता जा रहा है।
स्क्रिप्स सीओ₂ कार्यक्रम के निदेशक राल्फ कीलिंग का इस बारे में प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, “वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ोतरी बिना रुके जारी है। हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहे हैं जहां वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर लगातार बढ़ता जा रहा है।" उन्होंने खेद जताते हुए कहा, "काश हमारे पास इससे बेहतर खबर होती।“
68 वर्षों में 119 पीपीएम की वृद्धि
बता दें कि मौना लोआ ऑब्जर्वेटरी वातावरण में मौजूद सीओ2 की निगरानी के लिए दुनिया की सबसे अहम जगह मानी जाती है। समुद्र तल से करीब 11,141 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह वेधशाला उत्तरी गोलार्ध के वातावरण की औसत स्थिति का प्रतिनिधित्व करती है।
1958 में वैज्ञानिक चार्ल्स डेविड कीलिंग ने यहां सबसे पहले सीओ₂ की निगरानी शुरू की थी। उस समय 29 मार्च 1958 को दर्ज पहली रीडिंग 313 पीपीएम थी। आज यह बढ़कर 432 पीपीएम तक पहुंच चुकी है, यानी करीब 68 वर्षों में इसमें 119 पीपीएम की वृद्धि हुई है।
चार्ल्स कीलिंग ने सबसे पहले यह भी समझा था कि उत्तरी गोलार्ध में कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर हर साल मई में चरम पर पहुंचता है, फिर पौधों की वृद्धि के दौरान घटता है और शरद ऋतु में दोबारा बढ़ने लगता है। उनके द्वारा तैयार किया गया यह रिकॉर्ड बाद में "कीलिंग कर्व" के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
कैसे जलवायु परिवर्तन को रफ्तार दे रही है सीओ2
वैज्ञानिकों के अनुसार, कार्बन डाइऑक्साइड वातावरण में एक कंबल की तरह काम करती है, जो पृथ्वी से निकलने वाली ऊष्मा को फंसा लेती है। इससे वैश्विक तापमान बढ़ता है और मौसम के पैटर्न में बदलाव आने लगता है। सीओ2 के इस बढ़ते स्तर के कारण लू, सूखा, जंगलों में आग, भारी वर्षा और बाढ़ जैसी चरम मौसमी घटनाएं पहले से कहीं अधिक तीव्र और बार-बार होने लगी हैं।
इसके अलावा यह गैस समुद्रों में अम्लीकरण (ओशियन एसिडिफिकेशन) को भी बढ़ावा देती है, जिससे मूंगे, शंख और अन्य समुद्री जीवों के लिए अपने कठोर खोल और कंकाल बनाना कठिन हो जाता है।
बता दें कि मौना लोआ और दुनिया भर के अन्य निगरानी केंद्रों से जुटाए आंकड़े जलवायु वैज्ञानिकों के लिए पृथ्वी के बदलते वातावरण को समझने का आधार प्रदान करते हैं और नीति-निर्माताओं को जलवायु परिवर्तन के कारणों तथा उसके प्रभावों से निपटने की रणनीति तैयार करने में मदद करते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि सीओ₂ के लगातार बढ़ते स्तर इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती के लिए वैश्विक स्तर पर और अधिक तेज तथा प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है।