ग्लोबल कंसल्टेंसी फर्म 'सिस्टेमिक', 'इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव', इंटरनेशनल सेंटर फार इंटिग्रेटेड माउंटेन डेवेलपमेंट (आइसीआइएमओडी) और जीबी पंत नेशनल इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन एनवायर्नमेंट द्वारा जारी रिपोर्ट हिमालय में तेजी से बढ़ते संकट की गंभीर तस्वीर सामने रखती है।
पिछले एक दशक की तुलना में हिमालयी ग्लेशियरों का पिघलना 65 फीसदी तेज हो गया है, जबकि ग्लेशियरों के पिघलने से हो रहे बर्फीले द्रव्यमान के नुकसान में दक्षिण एशिया से आने वाले ब्लैक कार्बन की करीब एक-तिहाई हिस्सेदारी है।
ईंट भट्ठों समेत औद्योगिक स्रोत इस कालिख के हिमालय में जमाव के बड़े कारण हैं। बर्फ पर जमने वाला ब्लैक कार्बन सूर्य की गर्मी को अधिक सोखकर पिघलने की रफ्तार बढ़ाता है।
ग्लेशियरों के पीछे हटने के साथ 189 उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलों में से 56 को अति-उच्च जोखिम वाली पाया गया है।
वहीं, हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र के करीब 40 हजार ग्लेशियरों में से सिर्फ 0.1 फीसदी की नियमित निगरानी हो रही है।
रिपोर्ट चेताती है कि सदी के अंत तक हिमालयी ग्लेशियरों की मौजूदा मात्रा का 80 फीसदी तक हिस्सा खतरे में पड़ सकता है। इसका असर पानी, खेती, बिजली, पर्यटन और करोड़ों लोगों की आजीविका पर पड़ेगा।
हिमालय भारत के करीब 18 फीसदी भूभाग में फैला है, लेकिन देश में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं का करीब 35 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र से जुड़ा है।
2025 में भारतीय हिमालयी क्षेत्र में 40 करोड़ से अधिक पर्यटक पहुंचे थे, जो इस क्षेत्र की कुल आबादी से भी करीब आठ गुना अधिक है।
विडंबना यह है कि इस प्राकृतिक संपदा से पैदा होने वाले आर्थिक मूल्य का महज करीब पांच फीसदी हिस्सा ही पहाड़ी राज्यों के पास रहता है। यानी हिमालय देश की अर्थव्यवस्था को बहुत कुछ देता है, लेकिन उसकी सुरक्षा और रखरखाव का बोझ मुख्य रूप से उन्हीं पहाड़ी क्षेत्रों पर पड़ता है।
हिमालय का संकट अब केवल पहाड़ों का संकट नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के भविष्य और जल सुरक्षा का सवाल बन चुका है।
हिमालय केवल बर्फ से ढकी पहाड़ियों की श्रृंखला नहीं है। यह करोड़ों लोगों के लिए पानी, भोजन, बिजली और आजीविका का आधार है। लेकिन अब यही जीवनरेखा तेजी से बदल रही है।
एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, हिमालय के ग्लेशियरों में जमा बर्फ एक दशक पहले की तुलना में 65 फीसदी अधिक तेजी से घट रही है। इसके साथ ग्लेशियरों से बनी झीलों, पिघलती बर्फ और अस्थिर पहाड़ी ढलानों से जुड़ी आपदाओं का खतरा भी बढ़ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, हिमालय में ग्लेशियरों के पिघलने से हो रहे बर्फ के नुकसान में करीब एक-तिहाई हिस्सेदारी दक्षिण एशिया से आने वाले ब्लैक कार्बन की है। यह कालिख मुख्य रूप से मैदानी इलाकों में ईंट भट्ठों समेत विभिन्न स्रोतों से निकलती है। दक्षिण एशिया में इंसानी गतिविधियों से निकलने वाले ब्लैक कार्बन के हिमालयी क्षेत्र में जमाव में उद्योगों, खासकर ईंट भट्ठों, का योगदान 32 से 42 प्रतिशत है।
जब यह कण बर्फ और ग्लेशियरों पर जमते हैं तो सूर्य की गर्मी अधिक सोखते हैं और बर्फ के पिघलने की रफ्तार बढ़ जाती है।
यह रिपोर्ट ग्लोबल कंसल्टेंसी फर्म 'सिस्टेमिक', 'इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव', इंटरनेशनल सेंटर फार इंटिग्रेटेड माउंटेन डेवेलपमेंट (आइसीआइएमओडी) और जीबी पंत नेशनल इंस्टीट्यूट आफ हिमालयन एनवायर्नमेंट द्वारा जारी की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, पहाड़ों का यह तेजी से बदलता परिवेश केवल स्थानीय तबाही तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी असर डाल रहा है।
पिघल रहे ग्लेशियर, पीछे छोड़ रहे हैं अस्थिर झीलें
रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि ग्लेशियरों के पीछे हटने के साथ ऊंचे पहाड़ों में नई ग्लेशियर झीलें बन रही हैं। इन झीलों को अक्सर बर्फ, ढीली चट्टानों और मलबे से बनी कमजोर प्राकृतिक दीवारें रोकती हैं। यदि यह बांध टूट जाए तो अचानक भारी मात्रा में पानी नीचे की घाटियों में पहुंच सकता है।
ऐसा ही कुछ हाल ही में नेपाल में देखा गया था, जहां 26 अगस्त 2026 को अचानक आई विनाशकारी बाढ़ ने सिर्फ घर और सड़कें नहीं बहाईं, बल्कि हजारों ग्रामीण परिवारों की रोजी-रोटी का आधार भी छीन लिया था।
भारत भी इससे अलग नहीं है। आज भी शायद ही कोई केदारनाथ में आई त्रासदी को भुला होगा। रिपोर्ट में भारत की 189 उच्च जोखिम वाली ग्लेशियर झीलों का वैज्ञानिक आकलन किया गया है। इनमें से 56 झीलों को ‘अति-उच्च जोखिम’ वाली श्रेणी में रखा गया है। इन झीलों के नीचे बसे गांवों, कस्बों, सड़कों, पुलों और अन्य बुनियादी ढांचे पर अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा बना हुआ है।
यह खतरा केवल ग्लेशियर झीलों तक सीमित नहीं है। पर्माफ्रॉस्ट यानी लंबे समय से जमी जमीन के पिघलने और ऊंची पहाड़ी ढलानों के अस्थिर होने से भूस्खलन और दूसरी आपदाओं का जोखिम भी बढ़ रहा है।
40 हजार ग्लेशियर, सिर्फ 0.1 फीसदी की हो रही निगरानी
रिपोर्ट ने हिमालय में निगरानी की कमी को भी गंभीर चिंता बताया है। हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में करीब 40,000 ग्लेशियर होने का अनुमान है, लेकिन इनमें से महज 0.1 फीसदी ग्लेशियरों की नियमित निगरानी हो रही है।
इसका मतलब है कि जिस क्षेत्र में तेजी से बदलाव हो रहे हैं, उसके बहुत छोटे हिस्से पर ही लगातार वैज्ञानिकों की नजर है। ऐसे में रिपोर्ट के मुताबिक, बेहतर निगरानी, जोखिम मानचित्रण और शुरुआती चेतावनी प्रणाली विकसित किए बिना भविष्य की आपदाओं का समय रहते अनुमान लगाना मुश्किल होगा।
‘पीक वाटर’ के बाद घट सकता है नदी का पानी
रिपोर्ट ने यह भी चेताया है कि हिमालयी संकट का असर केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगा। ग्लेशियरों से निकलने वाला पानी दक्षिण एशिया की बड़ी आबादी की जल सुरक्षा का आधार है।
अधिकांश हिमालयी नदी घाटियों में इस सदी के मध्य तक ‘पीक वाटर’ की स्थिति आने की आशंका है। इसका अर्थ है कि ग्लेशियरों के पिघलने से नदी में आने वाला पानी पहले अपने अधिकतम स्तर पर पहुंचेगा और उसके बाद ग्लेशियरों में जमा बर्फ कम होने के साथ धीरे-धीरे घटने लगेगा।
रिपोर्ट में इस को लेकर भी आगाह किया गया है कि यदि मौजूदा रुझान जारी रहे तो इस सदी के अंत तक हिमालयी ग्लेशियरों की मौजूदा मात्रा का 80 फीसदी तक हिस्सा खतरे में पड़ सकता है। इसका असर खेतों, पेयजल, पनबिजली, उद्योग और शहरों तक पहुंच सकता है। यानी हिमालय में बर्फ का कम होना आने वाले वर्षों में मैदानों में पानी की उपलब्धता से जुड़ा बड़ा सवाल बन सकता है।
भारत की आर्थिक रीढ़ का अहम हिस्सा है हिमालय
हिमालय भारत के करीब 18 फीसदी भूभाग में फैला है, लेकिन देश में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं का करीब 35 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र से जुड़ा है।
हालांकि इसके बावजूद हिमालय का आर्थिक महत्व बहुत बड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक, हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र भारत की 20 फीसदी से अधिक जीडीपी को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आधार देता है। खेती, खाद्य उत्पादन, पनबिजली, पर्यटन और लाखों लोगों की आजीविका इससे जुड़ी है।
विडंबना यह है कि इस प्राकृतिक संपदा से पैदा होने वाले आर्थिक मूल्य का महज करीब पांच फीसदी हिस्सा ही पहाड़ी राज्यों के पास रहता है। यानी हिमालय देश की अर्थव्यवस्था को बहुत कुछ देता है, लेकिन उसकी सुरक्षा और रखरखाव का बोझ मुख्य रूप से उन्हीं पहाड़ी क्षेत्रों पर पड़ता है।
2025 में भारतीय हिमालयी क्षेत्र में 40 करोड़ से अधिक पर्यटक पहुंचे थे, जो इस क्षेत्र की कुल आबादी से भी करीब आठ गुना अधिक है।
ब्लैक कार्बन पर कार्रवाई से तुरंत मिल सकता है फायदा
वैज्ञानिकों के मुताबिक जलवायु परिवर्तन को रोकना वैश्विक प्रयासों पर निर्भर करता है, लेकिन ब्लैक कार्बन ऐसा प्रदूषक है जिस पर भारत और दक्षिण एशिया तत्काल कार्रवाई कर सकते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने में करीब एक-तिहाई योगदान ब्लैक कार्बन का है। इसलिए मैदानी इलाकों में ईंट भट्ठों और अन्य स्रोतों से निकलने वाली कालिख को कम करना ग्लेशियरों पर दबाव घटाने का एक महत्वपूर्ण स्थानीय उपाय हो सकता है।
रिपोर्ट का संदेश स्पष्ट है, ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए दुनिया को मिलकर काम करना होगा, लेकिन ब्लैक कार्बन पर कार्रवाई आज और यहीं से शुरू की जा सकती है।
बदलना होगा विकास का तरीका
यह रिपोर्ट केवल संकट की तस्वीर को ही उजागर नहीं करती, बल्कि हिमालय के लिए विकास के नए मॉडल को भी अपनाने की जरूरत बताती है। इसके तहत ग्लेशियरों, जंगलों, झरनों और पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा के साथ-साथ आपदाओं से निपटने की क्षमता मजबूत करने पर जोर दिया गया है।
रिपोर्ट ने 10 प्राथमिक बदलावों की पहचान की है। इनमें ब्लैक कार्बन में कमी, ग्लेशियरों और पर्माफ्रॉस्ट की निगरानी, शुरुआती चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना, सूखते हिमालयी झरनों को पुनर्जीवित करना, जंगलों की बेहतर देखभाल और पर्यटन की वहन क्षमता के मुताबिक योजना बनाना शामिल है।
रिपोर्ट के अनुसार, इन बदलावों में किए गए निवेश से आर्थिक, सामाजिक, पर्यावरणीय और आपदाओं से होने वाले नुकसान को टालने का लाभ जोड़ें तो हर एक रुपए के निवेश पर औसतन करीब आठ रुपए का लाभ मिल सकता है।
सीमाएं नहीं मानता हिमालयी संकट
इंटरनेशनल सेंटर फार इंटिग्रेटेड माउंटेन डेवेलपमेंट के महानिदेशक डॉक्टर पेमा ग्याम्त्शो के मुताबिक, हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र तेजी से बदल रहा है। ग्लेशियर पीछे हट रहे हैं और पर्माफ्रॉस्ट तथा ऊंची पर्वतीय ढलानें अस्थिर हो रही हैं। इससे नीचे रहने वाले समुदायों और बुनियादी ढांचे पर जटिल और एक के बाद एक आने वाली आपदाओं का खतरा बढ़ रहा है।
उनके मुताबिक, ये खतरे किसी देश की सीमा को नहीं मानते। इसलिए सीमा पार निगरानी, साझा जोखिम संबंधी जानकारी, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और संयुक्त निवेश अब जरूरी हो गए हैं।
ग्रान्थम रिसर्च इंस्टिट्यूट के अध्यक्ष लॉर्ड निकोलस स्टर्न ने हिमालय को ‘थर्ड पोल’ यानी तीसरा ध्रुव बताया है। उनके मुताबिक, आर्कटिक और अंटार्कटिक के विपरीत इस तीसरे ध्रुव के सहारे करोड़ों लोग रहते हैं। इसलिए हिमालय की सुरक्षा केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि पानी, भोजन, अर्थव्यवस्था और मानव जीवन की सुरक्षा का सवाल है।
हिमालय की रक्षा, भविष्य की रक्षा
हिमालय ने सदियों से नदियां, जंगल, पानी और आजीविका देकर दक्षिण एशिया को संभाला है। लेकिन अब पहाड़ खुद मदद मांग रहे हैं। ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, अस्थिर झीलें, कमजोर होती ढलानें, सूखते झरने और बढ़ती आपदाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई चेतावनियां हैं। इन्हें अलग-अलग समस्याओं की तरह देखने के बजाय एक पूरे तंत्र के रूप में समझना होगा।
क्योंकि हिमालय में जो बदलाव आज दिखाई दे रहा है, उसका असर कल मैदानी इलाकों में खेतों, पानी, बिजली की व्यवस्था और करोड़ों परिवारों की आजीविका तक पहुंच सकता है।
ऐसे में हिमालय को बचाना केवल पहाड़ों को बचाना नहीं है। यह उन करोड़ों लोगों के भविष्य को सुरक्षित करना है, जिनकी जिंदगी इन पहाड़ों से निकलने वाली नदियों के साथ बहती है।