सूखा अब महज पानी की कमी और कृषि संकट का नाम नहीं रह गया। वैज्ञानिकों के मुताबिक, बदलती जलवायु के बीच सूखा बीमारियों के फैलने का भूगोल भी बदल रहा है।
नदियों, तालाबों और जलस्रोतों के सूखने से इंसानों और वन्यजीवों को बचे हुए पानी के ठिकानों के आसपास सिमटना पड़ता है। यह भीड़ कई परजीवियों और रोगाणुओं के प्रसार के लिए अनुकूल माहौल बना सकती है।
जर्नल ट्रेंड्स इन इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन में प्रकाशित अध्ययन में सामने आया है कि पानी की कमी हमेशा संक्रमण को कम नहीं करती। कुछ परिस्थितियों में यह वेस्ट नाइल वायरस, सेंट लुइस एन्सेफलाइटिस और वैली फीवर जैसी बीमारियों के खतरे को बढ़ा सकती है।
कैलिफोर्निया में सूखे के दौरान सिकुड़ते तालाबों में मेंढकों के एक जगह जुटने से संक्रमण अधिक गंभीर होने का उदाहरण भी सामने आया।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, पिछले कुछ दशकों में दुनिया की 77 फीसदी से अधिक भूमि पहले से अधिक शुष्क हो चुकी है।
वैज्ञानिकों की चेतावनी है कि भविष्य में कुछ रोगाणु कमजोर पड़ सकते हैं, जबकि दूसरे नए इलाकों में तेजी से फैल सकते हैं। ऐसे में सूखे को केवल जल संकट नहीं, बल्कि बढ़ते स्वास्थ्य संकट की चेतावनी के रूप में भी देखना होगा।
सूखा सिर्फ खेतों, नदियों और जलाशयों को ही नहीं सुखा रहा, बल्कि यह बीमारियों के फैलने के तरीके को भी बदल रहा है। अमेरिका के पश्चिमी हिस्सों से लेकर यूरोप तक लंबे और भीषण सूखे पारिस्थितिकी तंत्र को बदल रहे हैं। इसका असर इंसानों के साथ-साथ वन्यजीवों की सेहत पर भी पड़ रहा है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, सूखे के कारण दुनिया भर में हैजा, वेस्ट नाइल वायरस और दूसरी संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है।
यह अध्ययन यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो बोल्डर के पारिस्थितिकीविद् पीटर जॉनसन और कैरी इंस्टीट्यूट ऑफ इकोसिस्टम स्टडीज से जुड़ी शोधकर्ता तारा स्टीवर्ट मेरिल के नेतृत्व में किया गया है, जिसके नतीजे एक चौंकाने वाले विरोधाभास को उजागर करते हैं।
आम तौर पर माना जाता है कि मच्छर और परजीवी पानी में पनपते हैं, तो सूखा आने पर बीमारियां कम होनी चाहिए। लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। 100 से ज्यादा अध्ययन के विश्लेषण में सामने आया है कि पानी की कमी हमेशा संक्रमण को कम नहीं करती। कई परिस्थितियों में यही कमी बीमारी के प्रसार को और तेज कर सकती है।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल ट्रेंड्स इन इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन में प्रकाशित हुए हैं।
पहले से अधिक शुष्क हुई है दुनिया में 77 फीसदी जमीन
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कुछ दशकों में पृथ्वी की 77 फीसदी से अधिक जमीन पहले की तुलना में अधिक शुष्क हुई है। इसमें जलवायु परिवर्तन की भी बड़ी भूमिका है। तापमान बढ़ने और जलवायु में आते बदलावों से सूखा पहले से अधिक बार, अधिक लंबे समय तक और अधिक तीव्रता के साथ पड़ रहा है।
इसी का एक उदाहरण है, हाल ही में अमेरिका के पश्चिमी हिस्से में पिछले 1,200 वर्षों का सबसे भीषण सूखा दर्ज किया गया। इसका असर इतना गंभीर रहा कि महत्वपूर्ण जलाशयों में से एक लेक मीड की क्षमता घटकर करीब एक-तिहाई रह गई।
हालांकि, सूखे की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ पानी का खत्म होना नहीं है। सूखे का बदलता और अनिश्चित स्वरूप वैज्ञानिकों के लिए यह अनुमान लगाना भी मुश्किल बना रहा है कि आने वाले समय में कौन-सी बीमारियां कहां और कितनी तेजी से फैल सकती हैं।
पानी घटा तो एक जगह जुटने लगे जानवर
आमतौर पर माना जाता है कि जिन बीमारियों के फैलने के लिए पानी या मच्छरों जैसे वाहकों की जरूरत होती है, सूखा उनके प्रसार को रोक देगा। लेकिन तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। जब नदियां, तालाब और छोटे जलस्रोत सूखने लगते हैं तो जानवरों के पास पानी पीने के लिए बहुत कम जगह बचती है।
वे इन बचे हुए जलस्रोतों के आसपास बड़ी संख्या में इकट्ठा होने लगते हैं। यही भीड़ संक्रमण के लिए अनुकूल माहौल तैयार कर सकती है।
कैलिफोर्निया में मेंढकों पर किए शोध के दौरान जॉनसन की टीम ने इसका प्रत्यक्ष उदाहरण देखा। वहां एक गंभीर सूखे ने तालाबों को सिकोड़ दिया। बड़ी संख्या में उभयचर बचे हुए पानी में जमा हो गए, जिससे उनके बीच संक्रमण तेजी से फैला और बीमारी अधिक गंभीर हो गई।
कुछ बीमारियों के लिए सूखा बन सकता है 'मौका'
वैज्ञानिकों के मुताबिक सूखे का फायदा उन परजीवियों और बीमारी फैलाने वाले जीवों को मिल सकता है, जो कठिन और शुष्क परिस्थितियों में भी जीवित रह सकते हैं।
उदाहरण के लिए, उत्तरी अमेरिका में वेस्ट नाइल वायरस और सेंट लुइस एन्सेफलाइटिस वायरस (एसएलईवी) जैसी मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का प्रसार कुछ परिस्थितियों में बढ़ सकता है। जलस्तर घटने पर मच्छरों के लार्वा को खाने वाले ड्रैगनफ्लाई के लार्वा जैसे जलीय जीव कम हो जाते हैं। इससे मच्छरों की संख्या बढ़ने और बीमारी के फैलने की आशंका बन सकती है।
वहीं, सूखे के दौरान धूल भी अधिक उड़ती है। इससे वैली फीवर जैसी फंगल बीमारी का खतरा बढ़ सकता है, जो दूषित धूल के संपर्क में आने से इंसानों और दूसरे जानवरों को संक्रमित करती है।
हर बीमारी पर सूखे का एक जैसा असर नहीं
हालांकि, वैज्ञानिकों ने यह भी स्पष्ट किया है कि हर रोगाणु सूखे से मजबूत नहीं होता। उदाहरण के लिए, चिट्रिड फंगस—जो दुनिया भर में उभयचरों की संख्या घटने के प्रमुख कारणों में शामिल है, शुष्क परिस्थितियों में अपेक्षाकृत कम फैलता है।
इसका मतलब है कि जलवायु परिवर्तन के साथ कुछ बीमारियां कमजोर पड़ सकती हैं, जबकि कुछ दूसरी बीमारियां नए इलाकों में तेजी से पैर पसार सकती हैं।
जॉनसन के अनुसार, आने वाले समय में दुनिया को सिर्फ अधिक बीमारियों का सामना नहीं करना पड़ सकता, बल्कि बीमारियों का पूरा नक्शा बदल सकता है। कहीं संक्रमण खत्म हो सकता है, तो कहीं उसकी तीव्रता इतनी बढ़ सकती है कि दूसरे इलाकों में संक्रमण घटने की भरपाई हो जाए।
कौन-से रोगाणु बनेंगे 'विजेता'?
वैज्ञानिकों के मुताबिक, भविष्य में उन रोगाणुओं को बढ़त मिल सकती है जो कई अलग-अलग प्रजातियों को संक्रमित करने की क्षमता रखते हैं। उदाहरण के लिए, बर्ड फ्लू जैसे रोगाणु, जो कई तरह के मेजबानों को संक्रमित कर सकते हैं, उन रोगाणुओं से बेहतर स्थिति में हो सकते हैं जो केवल एक प्रजाति तक सीमित रहते हैं।
इसी तरह, ऐसे रोगाणु जो पानी से बाहर भी जीवित रह सकते हैं और जमीन पर रहने वाले जीवों तक पहुंच सकते हैं, उनके फैलने की आशंका अधिक हो सकती है।
ऐसे में सूखे को अब केवल पानी की समस्या मानकर नहीं देखा जा सकता। जलवायु परिवर्तन के साथ सूखा इंसानों, वन्यजीवों और रोगाणुओं के बीच संबंधों को भी बदल रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर इन बदलावों को पहले से समझ लिया जाए तो भविष्य में बीमारी के प्रकोप का बेहतर अनुमान लगाकर समय रहते तैयारी की जा सकती है।