जलवायु संकट का समाधान केवल सरकारों की नीतियों, वैज्ञानिक खोजों और अंतरराष्ट्रीय समझौतों में नहीं छिपा, बल्कि हमारे रोजमर्रा के व्यवहार और सामाजिक रिश्तों में भी इसकी बड़ी ताकत मौजूद है।
नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित नई रिसर्च के मुताबिक, लोग अक्सर भाषणों और चेतावनियों से ज्यादा अपने आसपास के भरोसेमंद लोगों के व्यवहार से प्रभावित होते हैं।
पड़ोसी का साइकिल अपनाना, दोस्त का सार्वजनिक परिवहन चुनना, परिवार में बिजली बचाने की आदत या किसी डॉक्टर का पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली के फायदे बताना दूसरों को भी बदलाव के लिए प्रेरित कर सकता है।
ऐसे में भरोसेमंद संदेशवाहक, लोगों से जुड़ा संवाद और दिखाई देने वाले सकारात्मक उदाहरण मिलकर व्यक्तिगत फैसलों को सामाजिक चलन में बदल सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली को बोझ या त्याग के बजाय सामाजिक पहचान और गर्व का हिस्सा बनाना जरूरी है। जब पर्यावरण अनुकूल विकल्प समाज में सामान्य और सम्मानित व्यवहार बनेंगे, तभी जलवायु कार्रवाई की असली लहर उठेगी। यानी धरती बचाने की शुरुआत किसी बड़े मंच से नहीं, हमारे-आपके घर और आसपास से हो सकती है।
जलवायु परिवर्तन की बड़ी-बड़ी बातें अक्सर वैज्ञानिक रिपोर्टों, सरकारों के लंबे-चौड़े वादों और दूर-दराज के सम्मेलनों तक सीमित रह जाती हैं। आम आदमी को भी लगता है कि धरती को बचाने का काम किसी वैज्ञानिक या नेता का है।
लेकिन सच तो यह है कि धरती को तबाही से बचाने की असली शुरुआत किसी टीवी डिबेट से नहीं, बल्कि हमारे आपके घर, पास-पड़ोस और रोजमर्रा की बातचीत से होती है।
इसके लिए केवल नीतियां, तकनीक और बड़े-बड़े अभियान ही काफी नहीं। बदलाव की शुरुआत उन लोगों से भी हो सकती है, जिन पर हम रोज भरोसा करते हैं। इनमें परिवार, दोस्त, पड़ोसी, सहकर्मी, डॉक्टर, शिक्षक, धार्मिक नेता, खिलाड़ी, कलाकार या हमारे आसपास का दुकानदार कोई भी हो सकता है। इस विषय पर किए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि सामाजिक प्रभाव जलवायु कार्रवाई को तेज करने की बड़ी ताकत बन सकता है।
इस बारे में सेंटर फॉर क्लाइमेट चेंज एंड सोशल ट्रांसफॉर्मेशन्स' के एक नए अध्ययन ने पूरी दुनिया का ध्यान इस मानवीय सच्चाई की ओर खींचा है। इस अध्ययन के मुताबिक, समाज का आपसी प्रभाव ही वह जादू है जो लोगों के सोचने और जीने का तरीका बदल सकता है।
प्रतिष्ठित जर्नल नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की है कि कैसे अलग-अलग लोग और सामाजिक समूह जलवायु परिवर्तन को लेकर लोगों की सोच और व्यवहार को बदल सकते हैं।
भाषणों से नहीं, भरोसे से शुरू होता है बदलाव
रिसर्च से पता चला है कि अक्सर बड़ी-बड़ी बातें इंसान को डराती हैं, पर अपनों का व्यवहार उसे प्रेरित करता है। जब आपका पड़ोसी अपनी छत पर सोलर पैनल लगवाता है, जब आपका पसंदीदा नाई दुकान पर बिजली बचाने की बात करता है, जब कोई डॉक्टर स्वस्थ पर्यावरण की बात कहता है, या जब आपका दोस्त कार छोड़कर साइकिल से दफ्तर पहुंचने लगता है, तब आपके भीतर भी चुपचाप एक बदलाव जन्म लेता है।
कार्डिफ यूनिवर्सिटी की शोधकर्ता डॉक्टर ब्रियोनी लैटर कहती हैं कि जलवायु संकट से लड़ने के लिए सिर्फ नई तकनीकों की नहीं, बल्कि इंसानी आदतों को बदलने की जरूरत है। जब कोई अपना इंसान कुछ नया और बेहतर करता है, तो वो बात किसी भाषण की तरह नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद सलाह की तरह सीधे दिल में उतरती है।
शोधकर्ताओं ने इसे समझाते हुए लिखा है कि समाज में बदलाव को मुख्य रूप से चार कड़ियों से जोड़कर देखा जा सकता है। इसमें बात कहने वाला यानी 'मेसेंजर', चाहे वह खेल का कोई सितारा हो, धर्मगुरु हो, आपके घर का कोई बुजुर्ग या फिर आपका कोई दोस्त हो सकता है। संदेश देने वाले पर हमारा भरोसा ही तय करता है कि बात मानी जाएगी या नहीं।
सच कहें तो संदेश का असर केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि उसे कौन दे रहा है। भरोसा, विश्वसनीयता और लोगों से जुड़ाव यह तय करते हैं कि संदेश कितना असरदार होगा।
सिर्फ दर्शक नहीं, अपनी कहानी का नायक है हर व्यक्ति
इसमें दूसरा सबसे महत्वपूर्ण किरदार है सुनने वाला यानी 'ऑडियंस'। हमे समझना होगा कि हर इंसान की दुनिया अलग है। उसकी उम्र, कमाई और सोच के हिसाब से जब अपनी भाषा में बात की जाती है, तभी वह उससे जुड़ पाता है। इसके बाद महत्वपूर्ण कड़ी है प्रभाव का तरीका। औपचारिक नियमों से ज्यादा हमारी रोजमर्रा की बातें असरदार होती हैं।
उदाहरण के लिए सोशल मीडिया पर साफ नीयत से दी गई मिसालें और एक-दूसरे को देखकर कुछ नया सीखने का भाव इंसान को प्रेरित करता है।
एक और महत्वपूर्ण कड़ी है हमारी रोजमर्रा की आदतें, हम क्या खाते हैं, कैसे सफर करते हैं या घर में कितनी बिजली इस्तेमाल करते हैं, ये वो जगहें हैं जहां दूसरों को देखकर अपनी राह चुनना सबसे आसान होता है।
कैसे हमारी छोटी आदतें बन सकती हैं बड़ी मिसाल
देखा जाए तो जलवायु के लिए किए जाने वाले कई रोजमर्रा के ये फैसले सामाजिक प्रभाव के प्रति खास तौर पर संवेदनशील होते हैं। मसलन, साइकिल चलाना, शाकाहार या मांसाहार का चुनाव, घर में ऊर्जा की खपत कम करना, सार्वजनिक परिवहन अपनाना या सोलर पैनल जैसे विकल्प लगाना।
जब कोई व्यवहार लोगों को साफ दिखाई देता है या उसके बारे में सही विकल्प को लेकर अनिश्चितता होती है, तब लोग अक्सर अपने आसपास के लोगों से मदद लेते हैं। यही वजह है कि अगर किसी मोहल्ले में साइकिल चलाना सामान्य हो जाए, परिवार में ऊर्जा बचाने की आदत बन जाए या दोस्तों के बीच पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए भोजन को लेकर सकारात्मक सोच बढ़े, तो व्यक्तिगत फैसले धीरे-धीरे सामाजिक आदत में बदल सकते हैं।
दुनिया भर के वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक लंबे समय से इस बात को लेकर चिंतित हैं कि लोग पर्यावरण के बिगड़ते मिजाज को लेकर परेशान तो बहुत हैं, लेकिन जरूरी कदम उस तेजी से नहीं उठाए जा रहे हैं।
उदाहरण के लिए अक्सर भारी बारिश के बाद जलभराव की स्थिति हो या बदलते मौसम के साथ घटता कृषि उत्पादन। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को लेकर लोगों की चिंता व्यापक है, लेकिन उन्हें कम करने के लिए जरूरी बदलाव जो व्यक्तिगत रूप से होने चाहिए वे अभी भी उस रफ्तार से नहीं हो रहे, जिससे होने चाहिए।
यूनिवर्सिटी ऑफ बाथ से जुड़े शोधकर्ता डॉक्टर सैम हैम्पटन के मुताबिक, धरती बचाने वाली जीवनशैली को बोझ या मजबूरी नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक पहचान और गर्व का हिस्सा बनाना होगा। जब पर्यावरण के अनुकूल विकल्प अपनाना सिर्फ व्यक्तिगत फैसला नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक और सम्मानित चलन बन जाएगा, तभी बदलाव की असली लहर उठेगी।
जब व्यक्तिगत पसंद बन जाती है सामाजिक चलन
यानी जलवायु संकट से लड़ाई केवल नीतियों से नहीं, बल्कि हमारी सोच, सामाजिक मान्यताओं और रोजमर्रा की पसंद को बदलकर भी जीती जा सकती है।
उनके अनुसार, पर्यावरण अनुकूल विकल्पों और जीवनशैली को समाज की मुख्यधारा का हिस्सा बनाना होगा। इसके लिए अलग-अलग लोगों के प्रभाव और सामाजिक मानदंडों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
शोधकर्ताओं का भी मानना है मशहूर हस्तियों और ब्रांडों के साथ-साथ हमारे आसपास के आम लोग भी जलवायु कार्रवाई के प्रभावी दूत बन सकते हैं। सही व्यक्ति, सही समुदाय और सही तरीके से दिया गया संदेश लोगों को केवल जलवायु परिवर्तन के बारे में सोचने के लिए नहीं, बल्कि कुछ करने के लिए भी प्रेरित कर सकता है।
जलवायु संकट अक्सर हमें बहुत बड़ा और दूर का संकट लगता है, बर्फ पिघलती है, समुद्र बढ़ते हैं और तापमान रिकॉर्ड तोड़ता है। लेकिन उसका समाधान कई बार बेहद छोटी जगह से शुरू हो सकता है। घर में किसी एक व्यक्ति की आदत, पड़ोसी का साइकिल से जाना, दोस्त का सार्वजनिक परिवहन चुनना या किसी डॉक्टर का मरीजों को ऊर्जा और स्वास्थ्य के संबंध के बारे में समझाना, ये छोटे कदम मिलकर बड़ी सामाजिक लहर बना सकते हैं।
हमें समझना होगा कि जलवायु कार्रवाई सिर्फ सरकारों और विशेषज्ञों की जिम्मेदारी नहीं है। यह उस समाज की भी कहानी है, जिसमें हम हर दिन एक-दूसरे को देखते, सुनते और अनजाने में ही सही लेकिन एक-दूसरे से सीखते हैं।