अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने चेतावनी दी है कि 2026–2027 का अल नीनो लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र में करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी, रोजगार और आय पर गंभीर संकट खड़ा कर सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, बदलते वर्षा चक्र, सूखा, बाढ़ और भीषण गर्मी का सबसे बड़ा असर कृषि, मत्स्य पालन, निर्माण, परिवहन, पर्यटन और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों पर पड़ेगा, जहां बड़ी संख्या में गरीब और असंगठित श्रमिक काम करते हैं।
इससे न केवल रोजगार और आय में गिरावट आएगी, बल्कि खाद्य असुरक्षा, महंगाई, उत्पादकता में कमी और बाल श्रम का खतरा भी बढ़ सकता है।
आईएलओ के मुताबिक, दक्षिण अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र में लगभग आधे श्रमिक असंगठित क्षेत्र में हैं, जिनके पास सामाजिक सुरक्षा का अभाव है। हालांकि रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि यह संकट अपरिहार्य नहीं है।
यदि सरकारें समय रहते सामाजिक सुरक्षा का विस्तार, जलवायु-लचीले बुनियादी ढांचे में निवेश, अर्ली वार्निंग सिस्टम, सुरक्षित कार्यस्थल और प्रभावी सामाजिक संवाद को प्राथमिकता दें, तो अल नीनो के कारण रोजगार और आजीविका पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
मौसम जब अपना मिजाज बदलता है, तो उसकी सबसे भारी कीमत वह इंसान चुकाता है जिसका चूल्हा रोज की कड़ी मेहनत पर जलता है। जब आसमान से राहत की बूंदों की जगह तपती धूप या तबाही का पानी बरसता है, तो बात सिर्फ बढ़ते तापमान की नहीं रहती, बात उस थाली की हो जाती है, जो हर शाम अधूरी रह जाने के खतरे से जूझती है।
देखा जाए तो जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चरम मौसमी घटनाएं अब केवल पर्यावरण से जुड़ी चुनौती नहीं रह गई, बल्कि करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी और सम्मानजनक जीवन पर भी सीधा खतरा बनती जा रही हैं।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने अपनी नई रिपोर्ट में चेताया है कि 2026–2027 में दस्तक दे रहा अल नीनो दक्षिण अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र में रोजगार, आय और कामकाजी परिस्थितियों पर गंभीर असर डाल सकता है।
मौसम की मार, मेहनतकशों पर सबसे भारी
इसका सबसे अधिक संकट उन लोगों पर आएगा जो पहले से ही आर्थिक रूप से कमजोर हैं, जैसे श्रमिक, किसान, ग्रामीण मजदूर और खुले आसमान के नीचे काम करने वाले मेहनतकश लोग इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।
‘अल नीनो 2026-2027 एंड द वर्ल्ड ऑफ वर्क इन लैटिन अमेरिका एंड द कैरिबियन' रिपोर्ट के अनुसार, अल नीनो बारिश के पैटर्न को बदल सकता है, जिसका सीधा असर कृषि, मत्स्य पालन, ऊर्जा, परिवहन, लॉजिस्टिक्स, निर्माण और पर्यटन जैसे उन क्षेत्रों पर पड़ेगा, जिन पर करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी टिकी है।
ये वो लोग हैं जिनके पास न तो कोई पक्की नौकरी है, न ही बीमा या सामाजिक सुरक्षा का कोई कवच। ऐसे में जब फसलें तबाह होंगी और बाजार ठप पड़ेंगे, तो इनके पास मुश्किल दिनों के लिए बचाकर रखी कोई पूंजी नहीं होगी।
कृषि से पर्यटन तक, जब अल नीनो छीन लेगा रोजी-रोटी
लेकिन यह संकट केवल रोजगार छिनने तक सीमित नहीं रहेगा। खेतों में घटता उत्पादन और ठप पड़ती आर्थिक गतिविधियां लाखों परिवारों की आजीविका और उनकी थाली दोनों पर असर डालेंगी। भोजन और ऊर्जा की बढ़ती कीमतें महंगाई को और तेज करेंगी, जिससे कमजोर तबके के परिवारों के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो सकता है।
श्रमिकों की आय और उत्पादकता घटने के साथ आर्थिक तंगी इतनी गहरा सकती है कि कई परिवारों के मासूम बच्चों को स्कूल की किताबें छोड़कर मजदूरी का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर होना पड़े। यही बाल श्रम का बढ़ता साया अल नीनो से पैदा होने वाले इस संकट का सबसे दर्दनाक मानवीय चेहरा बन सकता है।
2026–2027 का अल नीनो दक्षिण अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र में रोजगार और सम्मानजनक काम के लिए एक बहुत बड़ी परीक्षा है। इस संकट से नुकसान कितना होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी सरकारें कितनी तेजी से अपने सबसे कमजोर वर्ग के बचाव के लिए मजबूत नीतियां और सुरक्षा कवच तैयार करती हैं। प्रभावी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था और सामाजिक संवाद ही कमजोर वर्गों को इस संकट से बचा सकते हैं।फैबियो वर्ट्रानौ, उप क्षेत्रीय निदेशक, आईएलओ
कहीं बाढ़ तो कहीं सूखा, अलग होंगे तबाही के मंजर
रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि अल नीनो का असर पूरे क्षेत्र में एक जैसा नहीं होगा। मध्य अमेरिकी ड्राई कॉरिडोर, कैरेबियाई क्षेत्र और उत्तरी दक्षिण अमेरिका में सूखा, जल संकट और भीषण गर्मी की आशंका है, जबकि इक्वाडोर और पेरू के तटीय प्रशांत क्षेत्रों में भारी बारिश और बाढ़ आ सकती है।
वहीं दक्षिण अमेरिका के दक्षिण-पूर्वी हिस्सों में सामान्य से अधिक बारिश और तेज तूफानों की आशंका जताई गई है। इन अलग-अलग मौसमीय परिस्थितियों का सीधा प्रभाव कृषि, मत्स्य पालन, निर्माण, परिवहन, पर्यटन और ऊर्जा उत्पादन जैसे क्षेत्रों पर पड़ेगा।
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया कि दक्षिण अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र में करीब आधे श्रमिक असंगठित क्षेत्र से जुड़े हैं। इन श्रमिकों के पास सामाजिक सुरक्षा और जलवायु आपदाओं से उबरने के लिए आवश्यक संसाधन बेहद सीमित हैं। ऐसे में रोजगार और आय में गिरावट का सबसे बड़ा बोझ इन्हीं लोगों पर पड़ेगा।
आईएलओ की यह रिपोर्ट केवल डर का मंजर पेश नहीं करती, बल्कि यह उम्मीद का एक रास्ता भी दिखाती है। रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि मौसम की इस मार के नतीजे पहले से तय नहीं हैं, उन्हें बदला जा सकता है।
अगर सरकारें अल नीनो को केवल एक वैज्ञानिक घटना मानने के बजाय इंसानी आजीविका के संकट को समझें, तो तबाही को रोका जा सकता है। आईएलओ का मानना है कि यह संकट किस्मत नहीं, बल्कि तैयारी की परीक्षा है।
संकट किस्मत नहीं, तैयारी की परीक्षा है
रिपोर्ट के अनुसार यदि समय रहते सही कदम उठाए जाएं, तो इस संकट का असर काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके लिए सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाना होगा। कमजोर श्रमिकों और किसानों को मजबूत सुरक्षा कवच देना होगा। जलवायु-लचीले बुनियादी ढांचे में निवेश करना होगा। कार्यस्थलों पर सुरक्षा और स्वास्थ्य मानकों को सख्ती से लागू करना होगा।
समय पर चेतावनी देने वाली प्रणालियां (अर्ली वार्निंग सिस्टम) विकसित करनी होंगी। साथ ही सरकार, नियोक्ताओं और श्रमिक संगठनों के बीच प्रभावी सामाजिक संवाद सुनिश्चित करना होगा। तभी अल नीनो से रोजगार, आय और करोड़ों मेहनतकश परिवारों की आजीविका पर पड़ने वाली मार को काफी हद तक कम किया जा सकेगा।
हमे समझना होगा कि अल नीनो केवल मौसम से जुड़ी एक प्राकृतिक घटना नहीं है, बल्कि यह लोगों की रोजी-रोटी, भोजन, आय और सामाजिक सुरक्षा को प्रभावित करने वाली व्यापक आर्थिक और सामाजिक चुनौती बनती जा रही है।
श्रम संगठन का संदेश बेहद स्पष्ट है कि यदि सरकारें समय रहते तैयारी करें और किसानों, कमजोर श्रमिकों को सुरक्षा प्रदान करें, तो जलवायु संकट को मानवीय संकट बनने से रोका जा सकता है। सबसे बड़ी चुनौती अब मौसम नहीं, बल्कि उन लाखों परिवारों की आजीविका को सुरक्षित रखना है जो हर दिन अपने पसीने पर निर्भर हैं।