दुनिया में बढ़ती गर्मी और नमी में वृद्धि से युवा और बुजुर्ग दोनों की रोजमर्रा की गतिविधियां अब सुरक्षित रूप से सीमित हो रही हैं।
बुजुर्गों के लिए सालाना लगभग 900 घंटे अत्यधिक गर्मी के कारण जीवन यापन और बाहर गतिविधियां करना मुश्किल हो गया है।
उष्णकटिबंधीय और गर्म क्षेत्रों में तापमान और नमी इतनी अधिक है कि कुछ समय के लिए जीवन असुरक्षित और असहनीय हो जाता है।
वैश्विक स्तर पर लगभग 78 फीसदी बुजुर्ग और 35 फीसदी युवा लोग गर्मियों के चरम समय में गतिविधियां करने में गंभीर रूप से प्रभावित हैं।
जलवायु परिवर्तन रोजमर्रा की जिंदगी पर असर डाल रहा है, जिससे जीवन योग्यता और सामान्य गतिविधियां पूरी तरह से बदल रही हैं।
हाल ही में वैज्ञानिकों ने एनवायर्नमेंटल रिसर्च नामक पत्रिका में एक अध्ययन प्रकाशित किया है, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि जलवायु परिवर्तन पहले से ही हमारी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है।
अध्ययन में 1950 से 2024 तक के 75 सालों के मौसम के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि दुनिया में तापमान में वृद्धि के कारण लोग अब हर दिन की गतिविधियां करने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं। यह समस्या विशेष रूप से बुज़ुर्गों और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए अधिक गंभीर है।
क्या है अध्ययन का मुख्य निष्कर्ष
अध्ययन में यह पाया गया कि गर्मियों के कारण गतिविधियां सीमित होने के घंटे अब पहले की तुलना में बहुत बढ़ गए हैं। वयस्कों के लिए यह घंटे लगभग दोगुने हो गए हैं, जबकि बुज़ुर्गों के लिए यह सालाना 600 घंटे से बढ़कर लगभग 900 घंटे हो गए हैं। इसका मतलब है कि बुज़ुर्ग हर साल तीन महीने से भी अधिक समय तक अत्यधिक गर्मी के कारण सुरक्षित रूप से बाहर गतिविधियां नहीं कर सकते।
वैश्विक औसत की बात करें तो यह संख्या कुछ कम लग सकती है, क्योंकि ठंडे इलाकों को भी इसमें शामिल किया गया है। लेकिन कुछ हिस्सों जैसे कि फारस की खाड़ी, उप-सहारा पश्चिम अफ्रीका, दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया में यह संख्या 2,000 से 3,000 घंटे तक हो सकती है। ऐसे क्षेत्रों में बुजर्गों के लिए बाहर सामान्य गतिविधियां करना मुश्किल हो जाता है।
गर्मी का प्रभाव किस पर सबसे ज्यादा है
शोध में यह भी पाया गया कि गर्मी के कारण सबसे अधिक प्रभावित लोग बुजुर्ग और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में रहने वाले लोग हैं। इनमें दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, अफ्रीका के कुछ हिस्से, दक्षिण अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। इन क्षेत्रों में तापमान के साथ-साथ नमी भी बहुत अधिक होती है। जब गर्मी और नमी दोनों अधिक हों, तब शरीर का तापमान नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है और यह स्थिति खतरनाक बन जाती है।
अध्ययन में बताया गया कि वैश्विक स्तर पर लगभग 35 फीसदी युवा लोग ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां गर्मियों के सबसे गर्म घंटों में गतिविधियां करना सुरक्षित नहीं है। वहीं बुजुर्गों के लिए यह आंकड़ा लगभग 78 फीसदी है। यह दर्शाता है कि लगभग चार में तीन बुजुर्ग लोगों की रोजमर्रा की गतिविधियां गर्मियों में गंभीर रूप से प्रभावित होती हैं।
जिंदगी के लिए असहनीय” स्थितियां
कुछ हिस्सों में तापमान और आर्द्रता इतनी अधिक हो गई है कि मानव शरीर प्राकृतिक रूप से उसका सामना नहीं कर सकता। अध्ययन में इसे “अत्यधिक जीवनयोग्यता की सीमा” कहा गया है। इन क्षेत्रों में बुज़ुर्गों के लिए बाहर जाना सुरक्षित नहीं है जब तक कि उनके पास एयर कंडीशनिंग या किसी ठंडी जगह तक पहुंच न हो।
विशेष रूप से फारस की खाड़ी, उप-सहारा पश्चिम अफ्रीका और दक्षिण एशिया में कई घंटे हर साल ऐसे होते हैं जब बुजुर्ग बाहर किसी भी गतिविधि को सुरक्षित रूप से नहीं कर सकते। युवा लोगों के लिए भी कुछ हिस्सों में यह स्थिति गंभीर है, जहां लगभग एक फीसदी लोग गर्मियों के सबसे गर्म समय में बाहर कोई गतिविधि नहीं कर सकते।
रोजमर्रा के जीवन पर जलवायु परिवर्तन का असर
इस अध्ययन का महत्व इसलिए है क्योंकि यह सिर्फ यह नहीं बताता कि गर्मी से मौत या स्वास्थ्य के लिए खतरे बढ़ा रहा है, बल्कि यह रोजमर्रा की जिंदगी पर भी असर डाल रहा है। सामान्य गतिविधियां जैसे बाहर चलना, काम करना, घर के काम करना और सामाजिक गतिविधियों में शामिल होना अब गर्म मौसम में कठिन हो गया है।
शोधकर्ता कहते हैं कि यह समस्या भविष्य की नहीं है, बल्कि अब पहले से ही मौजूद है। जैसे-जैसे तापमान बढ़ता जाएगा और भी अधिक क्षेत्र “जीवनयोग्य नहीं” बन सकते हैं। यह स्थिति उन लोगों के लिए और अधिक गंभीर होगी जिनके पास ठंडक का साधन नहीं है।
भविष्य की चुनौती
जलवायु परिवर्तन के कारण हमारी दुनिया सिर्फ मौसम के चरम पर नहीं बदल रही, बल्कि यह हमारे रोजमर्रा के जीवन के ढांचे को भी प्रभावित कर रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बदलाव धीरे-धीरे बढ़ेगा और लोगों को गर्मियों में सुरक्षित और सामान्य जीवन जीने के लिए अधिक संसाधनों की जरूरत होगी।
इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि अब हमें केवल “क्या हम जीवित रह सकते हैं?” की चिंता नहीं करनी चाहिए, बल्कि यह देखना होगा कि “क्या यह जगह जीवन के लिए सुरक्षित और जीने योग्य है?”