समुद्र स्तर बढ़ने से तटीय बाढ़ की घटनाएं पहले की तुलना में चार गुणा अधिक हो गई, अध्ययन में बड़ा खुलासा।
100 साल में एक बार आने वाली बाढ़ अब कई जगह हर दशक में बार-बार आने लगी, खतरा तेजी से बढ़ा।
जलवायु परिवर्तन और मानवजनित गतिविधियों से समुद्र का आधार स्तर बढ़ा, जिससे छोटे तूफान भी बड़े पैमाने पर बाढ़ ला रहे।
अध्ययन में 130 तटीय स्थलों के रिकॉर्ड का विश्लेषण हुआ, प्राकृतिक और मानव कारणों के प्रभाव वैज्ञानिकों द्वारा अलग-अलग करके समझे गए।
मनीला में जमीन धंसने से बाढ़ का खतरा 300 गुणा बढ़ा, जबकि वेलिंगटन और सैंडी हुक में भी गंभीर वृद्धि दर्ज।
एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में यह सामने आया है कि दुनिया भर में तटीय क्षेत्रों में आने वाली बाढ़ अब पहले की तुलना में कहीं अधिक सामान्य हो गई है। पहले जिन समुद्री बाढ़ों को “100 साल में एक बार” होने वाली घटना माना जाता था, वे अब लगभग 12 गुणा अधिक बार होने लगी हैं। यह अध्ययन प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित हुआ है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह बदलाव मुख्य रूप से इंसानों द्वारा किए गए जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते स्तर के कारण हुआ है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि साल 1900 की तुलना में तटीय बाढ़ की घटनाएं लगभग चार गुणा अधिक हो गई हैं।
बाढ़ बढ़ने का कारण क्या है
वैज्ञानिकों के अनुसार, समुद्र में आने वाली चरम बाढ़ तब होती है जब ज्वार, तूफानी लहरें और समुद्र का बढ़ता स्तर एक साथ मिल जाते हैं। जब समुद्र का स्तर पहले से ही बढ़ा हुआ होता है, तो छोटे-छोटे तूफान भी बड़े पैमाने पर बाढ़ पैदा कर सकते हैं।
शोध पत्र में शोधकर्ता के हवाले से कहा गया है कि अब समुद्र का आधार स्तर इतना बढ़ चुका है कि पहले जिन परिस्थितियों में बाढ़ नहीं आती थी, अब वही परिस्थितियां बाढ़ का कारण बन रही हैं।
वैज्ञानिकों ने कैसे किया अध्ययन
इस शोध में वैज्ञानिकों ने दुनिया भर के 130 से अधिक समुद्री ज्वार माप केंद्रों के लंबे समय के रिकॉर्ड का अध्ययन किया। इसके साथ ही जलवायु मॉडल का उपयोग करके यह समझने की कोशिश की गई कि समुद्र के स्तर में बदलाव प्राकृतिक कारणों से हुआ है या मानव गतिविधियों के कारण।
शोधकर्ताओं ने पाया कि पिछले कई दशकों में समुद्र स्तर बढ़ने का सबसे बड़ा कारण मानव गतिविधियों से पैदा हुआ जलवायु परिवर्तन है। पहले 20वीं सदी की शुरुआत में प्राकृतिक कारणों का असर अधिक था, लेकिन 1960 के बाद से मानवजनित कार्बन उत्सर्जन का प्रभाव तेजी से बढ़ गया।
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में असर
अध्ययन में यह भी देखा गया कि अलग-अलग जगहों पर इसका असर अलग तरह से दिख रहा है। अमेरिका के न्यू जर्सी में स्थित सैंडी हुक में पहले जिस तरह की बड़ी बाढ़ 100 साल में एक बार आती थी, वह अब लगभग 16 साल में एक बार आने लगी है।
न्यूजीलैंड की राजधानी वेलिंग्टन में स्थिति और भी गंभीर है, जहां पहले यह बाढ़ सदी में एक बार मानी जाती थी, लेकिन अब यह लगभग साल में दो बार तक आने लगी है।
इसी तरह फिलीपींस की राजधानी मनीला में जमीन धंसने की वजह से बाढ़ का खतरा कई सौ गुना बढ़ गया है। यहां भूमिगत पानी के अधिक उपयोग के कारण जमीन नीचे धंस रही है, जिससे समुद्र स्तर का प्रभाव और अधिक बढ़ जाता है।
तटीय इलाकों के लिए चेतावनी
वैज्ञानिकों का कहना है कि समुद्र स्तर में यह वृद्धि भविष्य में और भी गंभीर समस्याएं पैदा कर सकती है। जो शहर और बस्तियां पहले सुरक्षित मानी जाती थीं, वे अब अधिक बार बाढ़ की चपेट में आ सकती हैं। इससे तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा, घर, सड़कें और अन्य बुनियादी ढांचा खतरे में पड़ सकता है।
शोधकर्ताओं ने यह भी कहा है कि पुरानी बाढ़ खतरों की गणनाएं अब वर्तमान स्थिति को सही तरीके से नहीं दिखातीं। इसलिए तटीय शहरों की योजना और निर्माण नियमों में बदलाव की जरूरत है।
नीति और भविष्य की चुनौती
अध्ययन में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ भविष्य की समस्या नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पहले से ही दुनिया भर में देखा जा रहा है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन नहीं घटाया गया, तो समुद्र स्तर और बढ़ेगा और बाढ़ की घटनाएं और अधिक बढ़ सकती हैं।
यह अध्ययन दुनिया भर के नीति-निर्माताओं के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है कि तटीय सुरक्षा और आपदा प्रबंधन को अब नए सिरे से सोचने की जरूरत है।