भारी उत्सर्जन जारी रहा तो 2100 तक लगभग 1.16 अरब लोग कम से कम एक बार गंभीर खाद्य संकट झेलेंगे।
अध्ययन के अनुसार 60 करोड़ से अधिक बच्चे पांच साल की आयु से पहले खाद्य असुरक्षा का अनुभव कर सकते हैं।
साल 2099 में अकेले अफ्रीका में लगभग 17 करोड़ लोग गंभीर भुखमरी और खाद्य संकट के जोखिम में होंगे।
टिकाऊ विकास और उत्सर्जन कटौती से 2100 तक करीब 78 करोड़ लोगों को खाद्य संकट से बचाया जा सकता है।
आक्रामक डिकार्बोनाइजेशन से 2090-2100 के दौरान वार्षिक औसत प्रभावित आबादी 8.9 करोड़ से घटकर 4.2 करोड़ हो सकती है।
साल 2025 में दुनिया भर में 29.5 करोड़ से अधिक लोगों ने भूख और भुखमरी का सामना किया। इसके पीछे युद्ध, विस्थापन, आर्थिक संकट और जलवायु परिवर्तन जैसे कारण रहे। लेकिन आने वाले समय की तस्वीर इससे भी अधिक चिंताजनक है। नए शोध के अनुसार, यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इसी तरह जारी रहा, तो साल 2100 तक एक अरब से अधिक लोग गंभीर खाद्य संकट का सामना कर सकते हैं।
यह आंकड़ा केवल वर्तमान पीढ़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि उन बच्चों और आने वाली पीढ़ियों को भी शामिल करता है, जो इस सदी के अंत तक कम से कम एक बार गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना करेंगे।
कैसे किया गया शोध ?
साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित यह यह अध्ययन एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) मॉडल की मदद से किया गया। इस मॉडल को खाद्य असुरक्षा के ऐतिहासिक आंकड़ों से प्रशिक्षित किया गया, जो अकाल पूर्व चेतावनी प्रणाली नेटवर्क से हासिल हुए।
जलवायु से संबंधित जानकारी के लिए मासिक तापमान के आंकड़े राष्ट्रीय समुद्री और वायुमंडलीय संचालन से लिए गए। वहीं बारिश के आंकड़े क्लाइमेट हजार्डस सेंटर से प्राप्त किए गए।
इस मॉडल ने तापमान और बारिश में बदलाव को खाद्य संकट से जोड़कर भविष्य का अनुमान लगाया। आमतौर पर ऐसे पूर्वानुमानों में आय, कीमतों और सरकारी नीतियों जैसे सामाजिक-आर्थिक कारकों को भी शामिल किया जाता है, लेकिन इस शोध में मुख्य ध्यान जलवायु परिवर्तन के सीधे प्रभाव पर रखा गया।
भयावह आंकड़े
शोध से पता चला कि यदि दुनिया ने उच्च स्तर पर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन जारी रखा, तो साल 2100 तक लगभग 1.16 अरब लोग कम से कम एक बार गंभीर खाद्य संकट का सामना कर सकते हैं।
इनमें 60 करोड़ से अधिक बच्चे शामिल होंगे। अनुमान है कि 20 करोड़ से अधिक नवजात शिशु अपने जीवन के पहले साल में ही खाद्य संकट के जोखिम में होंगे। यह स्थिति इसलिए और गंभीर है क्योंकि जिन क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सबसे अधिक होगा, वहीं जनसंख्या वृद्धि भी तेजी से हो रही है।
अफ्रीका पर सबसे अधिक असर
अध्ययन के अनुसार अफ्रीका सबसे अधिक प्रभावित होगा। साल 2099 में ही लगभग 17 करोड़ लोग गंभीर खाद्य संकट का सामना कर सकते हैं। यह संख्या इटली, फ्रांस और स्पेन की वर्तमान संयुक्त आबादी के बराबर है।
अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र और साहेल जैसे इलाके विशेष रूप से संकटग्रस्त माने गए हैं। इन क्षेत्रों में सूखा, अनियमित बारिश और बढ़ता तापमान खेती और पशुपालन को बुरी तरह प्रभावित कर सकते हैं। साथ ही, यहां पहले से ही गरीबी और संघर्ष जैसी समस्याएं मौजूद हैं, जो स्थिति को और जटिल बनाती हैं।
हालांकि एक सकारात्मक पहलू भी है। यदि अफ्रीकी देश संघर्ष कम करें और स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ें, तो 2050 के बाद खाद्य संकट का खतरा तेजी से घट सकता है।
क्या स्थिति सुधर सकती है?
शोध यह भी बताता है कि यदि दुनिया ने समय रहते कदम उठाए, तो हालात बदले जा सकते हैं। यदि देश जीवाश्म ईंधन का उपयोग कम करें, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा दें और टिकाऊ विकास की दिशा में आगे बढ़ें, तो 2100 तक लगभग 78 करोड़ लोगों को खाद्य संकट से बचाया जा सकता है।
इतना ही नहीं, यदि सरकारें आक्रामक रूप से कार्बन उत्सर्जन घटाएं, तो हर साल खाद्य संकट का सामना करने वाले लोगों की संख्या आधी से भी कम हो सकती है। यह स्पष्ट करता है कि नीति संबंधी निर्णय भविष्य तय करते हैं।
केवल अधिक भोजन उगाना समाधान नहीं
खाद्य सुरक्षा केवल अधिक अनाज उत्पादन से सुनिश्चित नहीं की जा सकती। जरूरी है कि खाद्य प्रणाली ऐसी हो जो बाढ़, सूखा या अन्य जलवायु आपदाओं के दौरान भी काम करती रहे।
इसके लिए स्थानीय स्तर पर मजबूत कृषि व्यवस्था, जल संरक्षण, विविध फसलों की खेती और समुदाय की भागीदारी आवश्यक है। यदि समाज के सभी वर्ग खाद्य उत्पादन और वितरण प्रणाली में शामिल हों, तो संकट के समय भी स्थिरता बनी रह सकती है।
आगे क्या करना होगा?
जलवायु परिवर्तन खाद्य संकट का जोखिम बढ़ाता है, लेकिन यह तय करना हमारे हाथ में है कि यह जोखिम वास्तविक आपदा बने या नहीं। सरकारों, उद्योगों और समाज को मिलकर कार्बन उत्सर्जन घटाने, स्वच्छ ऊर्जा अपनाने और शांति व समानता को बढ़ावा देने की दिशा में काम करना होगा।
यदि हम समय रहते कदम नहीं उठाते, तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। लेकिन यदि हम आज जिम्मेदारी से कार्य करें, तो करोड़ों लोगों को भूख और कुपोषण से बचाया जा सकता है।
अंततः यह केवल पर्यावरण का सवाल नहीं है, बल्कि मानवता के भविष्य का प्रश्न है। आज लिए गए निर्णय ही तय करेंगे कि 2100 की दुनिया भूख से जूझ रही होगी या सुरक्षित और स्थिर होगी।