गर्मी “साइलेंट किलर” है, धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाता है, जिससे चक्कर, सिरदर्द, अंग विफलता और मौत तक हो सकती है। फोटो साभार: आईस्टॉक
जलवायु

साल 2050 तक दुनिया के लगभग 3.8 अरब लोग चरम गर्मी का सामना करेंगे

गर्म मौसम में दुनिया के लगभग 3.8 अरब लोग प्रभावित होंगे, गरीब देशों में स्वास्थ्य खतरे और ठंडे देशों में चुनौतियां बढ़ेंगी

Dayanidhi

  • विश्व में गर्मी का खतरा बढ़ रहा है, 2050 तक लगभग 3.8 अरब लोग चरम गर्मी का सामना करेंगे।

  • उष्णकटिबंधीय और विकासशील देशों में एयर कंडीशनिंग या ठंडक के साधनों की कमी से स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित होगा।

  • ठंडे देशों में भी गर्मी का असर होगा, क्योंकि वहां के घर और सार्वजनिक स्थान गर्मी के अनुसार नहीं बनाए गए।

  • गर्मी से बचने के लिए तत्काल कदम जरूरी हैं, जैसे सस्टेनेबल एयर कंडीशनर और पैसिव कूलिंग तकनीक अपनाना।

  • गर्मी “साइलेंट किलर” है, धीरे-धीरे शरीर को नुकसान पहुंचाता है, जिससे चक्कर, सिरदर्द, अंग विफलता और मौत तक हो सकती है।

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि 2050 तक लगभग 3.8 अरब लोग अत्यधिक गर्मी का सामना कर सकते हैं। यह स्थिति तब होगी जब दुनिया का औसत तापमान औद्योगिक युग से दो डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा। गर्म देशों में यह समस्या सबसे अधिक होगी, लेकिन ठंडे देशों को भी इसके लिए तैयार रहना होगा।

गर्मी का असर

नेचर सस्टेनेबिलिटी नामक पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन में वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान में वृद्धि के कारण गर्मी से बचने के उपायों की मांग बहुत बढ़ जाएगी। यह समस्या विशेष रूप से ब्राजील, इंडोनेशिया और नाइजीरिया जैसे बड़े देशों में होगी, जहां बड़ी संख्या में लोग एयर कंडीशनर या अन्य ठंडा करने के साधनों तक पहुंच नहीं रखते।

अत्यधिक गर्मी शरीर की प्राकृतिक ठंडक प्रणाली को प्रभावित कर सकती है। इसके कारण चक्कर आना, सिरदर्द, अंगों की विफलता और मौत जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। वैज्ञानिक इसे “साइलेंट किलर” कहते हैं क्योंकि गर्मी से होने वाली मौतें अक्सर धीरे-धीरे होती हैं।

सबसे ज्यादा प्रभावित देश

अध्ययन में यह भी पाया गया कि गर्म और उष्णकटिबंधीय देशों में तापमान बहुत तेजी से बढ़ेगा। इनमें भारत, फिलीपींस, बांग्लादेश, नाइजीरिया, सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, साउथ सूडान, ब्राजील, लाओस शामिल हैं।

इन देशों में तापमान इतना बढ़ जाएगा कि लोगों को ठंडक पाने के लिए एयर कंडीशनर या पंखों की बहुत अधिक आवश्यकता होगी। लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर लोग इन साधनों तक पहुंच नहीं पाएंगे, जिससे स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ेगा।

ठंडे देशों में भी खतरा

सिर्फ गर्म देश ही खतरे में नहीं हैं। कनाडा, रूस और फिनलैंड जैसे ठंडे देशों को भी गर्मी से जूझना पड़ेगा। इन देशों की भवन संरचना और सार्वजनिक यातायात गर्मी को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गई है।

हालांकि कुछ ठंडे देशों में हीटिंग की आवश्यकता कम हो सकती है, लेकिन समय के साथ कूलिंग की लागत बढ़ जाएगी। यूरोप जैसे देशों में अभी भी एयर कंडीशनिंग कम है, जिससे वहां गर्मी के असर की तैयारी कम है।

वैज्ञानिकों की चेतावनी

यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड के अध्ययन में कहा गया है कि गर्मी से बचने के लिए तत्काल कदम उठाना जरूरी है। इसका मतलब है -

अध्ययन के मुख्य लेखक जीसस लिजाना का कहना है कि गर्मी के असर से निपटने के लिए अगले कुछ सालों में नई इमारतें और उपकरण तैयार करना जरूरी है।

गर्मी से स्वास्थ्य पर असर

लंबे समय तक अत्यधिक गर्मी में रहने से शरीर का तापमान नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है। इससे चक्कर आना, सिरदर्द, थकान, अंगों की विफलता

और मौत तक हो सकती है। वैज्ञानिकों ने इसे “साइलेंट किलर” इसलिए कहा है क्योंकि यह धीरे-धीरे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है, और लोग इसे तुरंत नहीं समझ पाते।

विश्व स्तर पर बदलाव

अध्ययन में यह भी कहा गया है कि अगर तापमान दो डिग्री सेल्सियस तक बढ़ता है, तो दुनिया में गर्मी के कारण प्रभावित लोगों की संख्या दोगुनी हो जाएगी।विशेष रूप से उष्णकटिबंधीय और विकासशील देशों में ऊर्जा की मांग बहुत बढ़ जाएगी और स्वास्थ्य संबंधी खतरे भी बढ़ेंगे।

वैज्ञानिकों का कहना है कि कोई भी देश गर्मी के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है। गरीब देशों में लोग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे, लेकिन धनी और ठंडे देशों को भी सतर्क रहना होगा।

गर्मी से बचने के लिए जरूरी कदम -

  • एयर कंडीशनर और पंखों जैसी ठंडक तकनीक अपनाना।

  • इमारतों और शहरों को गर्मी के अनुसार डिजाइन करना।

  • ऊर्जा बचाने और पर्यावरण को सुरक्षित रखने वाली तकनीक अपनाना।

संक्षेप में, 2050 तक दुनिया के कई हिस्सों में गर्मी का खतरा बढ़ेगा। इसलिए हर देश को तुरंत तैयारी शुरू करनी चाहिए।