सितंबर 2026 में दुनिया ने जलवायु इतिहास का दूसरा सबसे गर्म सितंबर दर्ज किया, जब वैश्विक तापमान औद्योगिक काल से पहले के स्तर से 1.63 डिग्री सेल्सियस ऊपर पहुंच गया।
यूरोपीय संघ की कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस की रिपोर्ट के मुताबिक, समुद्र की सतह का औसत तापमान भी सितंबर के रिकॉर्ड स्तर पर रहा और भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति मजबूत हुई।
इस बीच यूरोप के कई हिस्सों में भीषण गर्मी और सूखे ने नदियों के जल प्रवाह, जलापूर्ति और कृषि पर दबाव बढ़ाया, जबकि दुनिया के दूसरे क्षेत्रों में असामान्य बारिश और बाढ़ ने मुश्किलें बढ़ाईं। ध्रुवीय क्षेत्रों में समुद्री बर्फ का विस्तार भी चिंताजनक रूप से कम रहा।
हालांकि, किसी एक महीने में तापमान का 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार करना यह साबित नहीं करता कि दीर्घकालिक वैश्विक तापमान वृद्धि स्थाई रूप से इस स्तर तक पहुंच गई है, लेकिन लगातार बढ़ती गर्मी गंभीर चेतावनी जरूर है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, मजबूत होता अल नीनो आने वाले महीनों में तापमान को और बढ़ा सकता है।
ऐसे में जलवायु संकट केवल टूटते रिकॉर्ड का मामला नहीं, बल्कि पानी, खेती और लोगों की आजीविका से जुड़ा सवाल है। आने वाले वर्षों में धरती कितनी गर्म होगी और इसके दुष्प्रभाव कितने गंभीर होंगे, यह काफी हद तक आज लिए जाने वाले फैसलों पर निर्भर करेगा।
जिस पृथ्वी को हम जानते हैं उसकी जलवायु लगातार गर्म होती जा रही है। कहीं गर्मी के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं, कहीं नदियां सूख रही हैं और कहीं बेमौसम बारिश बाढ़ बनकर तबाही मचा रही है। सितंबर 2026 के जलवायु आंकड़े इसी बढ़ते संकट की तस्वीर पेश करते हैं।
यूरोपियन यूनियन की कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (सी3एस) द्वारा जारी नई रिपोर्ट के मुताबिक इस साल पिछले महीना दुनिया का अब तक का दूसरा सबसे गर्म सितंबर रहा। इस दौरान वैश्विक तापमान औद्योगिक काल से पहले की तुलना में 1.63 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। नवंबर 2025 के बाद यह लगातार दूसरा महीना है जब वैश्विक तापमान डेढ़ डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर गया।
यह इस बात की चेतावनी है कि जलवायु संकट अब भविष्य की आशंका भर नहीं, बल्कि मौजूदा समय की हकीकत बन चुका है।
रुझान दर्शाते हैं कि सितंबर में सतह के पास हवा का वैश्विक औसत तापमान 16.27 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। यह 1991 से 2020 के औसत से 0.82 डिग्री सेल्सियस अधिक था। बता दें कि सितंबर 2026 का तापमान सितंबर 2023 से महज 0.11 डिग्री सेल्सियस कम रहा, जो अब तक का सबसे गर्म सितंबर का महीन था।
यह आंकड़ा इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि पेरिस जलवायु समझौते के तहत वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखने और इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के प्रयासों पर जोर दिया गया है। हालांकि, किसी एक महीने में इस सीमा का पार होना यह नहीं दर्शाता कि वैश्विक तापमान में हो रही वृद्धि स्थाई रूप से डेढ़ डिग्री तक पहुंच चुकी है। इसके लिए कई वर्षों के तापमान का आकलन जरूरी है।
रिपोर्ट के मुताबिक धरती की बढ़ती तपिश का असर केवल जमीन पर ही नहीं, समुद्रों में भी दिखाई दे रहा है। सितंबर 2026 में समुद्र की सतह का औसत तापमान 21.05 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। सितंबर के लिहाज से यह अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है। इससे पहले सितंबर 2023 में समुद्र की सतह का तापमान 20.92 डिग्री सेल्सियस के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा था।
इस असाधारण गर्मी के बीच भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति लगातार मजबूत हो रही है। आशंका है कि आने वाले महीनों में यह और गंभीर रूप ले सकता है। यह भी आशंका जताई जा रही है कि इस बार बनने वाला अल नीनो अब तक रिकॉर्ड किए गए सबसे शक्तिशाली अल नीनो घटनाक्रमों में शामिल हो सकता है।
गौरतलब है कि अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में समुद्र की सतह के असामान्य रूप से गर्म होने से जुड़ी जलवायु घटना है। इसका प्रभाव दुनिया के कई क्षेत्रों में बारिश, सूखे और तापमान के पैटर्न पर पड़ सकता है। हालांकि, इसका असर हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं होता।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, सितंबर में अल नीनो पर नजर रखने वाले प्रशांत महासागर के नीनो 3.4 क्षेत्र में समुद्र की सतह का औसत तापमान बढ़कर 29.7 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। यह तापमान 1982–83, 1997–98 और 2015–16 में दर्ज की गई पिछली तीन बेहद शक्तिशाली अल नीनो घटनाओं के चरम स्तर से भी अधिक था।
समुद्र की सतह का इतना गर्म होना इस बात का संकेत है कि महासागर में गर्मी का असाधारण दबाव बना हुआ है।
यूरोप के आसपास के समुद्रों में भी गर्मी ने पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए। अटलांटिक तट और पश्चिमी भूमध्यसागर में सितंबर के दौरान समुद्र की सतह का तापमान अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर दर्ज किया गया। समुद्रों में जमा होती यह अतिरिक्त गर्मी आसपास के भूभाग को भी तपाती है, जिससे क्षेत्र में गर्मी का असर और गंभीर हो जाता है।
सितंबर में यूरोप के बड़े हिस्से में गर्म और शुष्क मौसम बना रहा। यह वही स्थिति थी जिसने वहां की गर्मियों को असाधारण बना दिया था। पूरे यूरोप में सितंबर का औसत तापमान 16.26 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो 1991–2020 के औसत तापमान से 1.54 डिग्री सेल्सियस अधिक था। इस तरह पिछला महीन यूरोप के रिकॉर्ड में तीसरा सबसे गर्म सितंबर रहा।
पश्चिमी यूरोप में स्थिति और ज्यादा गंभीर रही। यहां सितंबर का तापमान औसत से 2.51 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया। इस क्षेत्र में सितंबर 2026 और सितंबर 2023 संयुक्त रूप से अब तक के सबसे गर्म सितंबर रहे। इससे पहले पश्चिमी यूरोप ने अपनी सबसे गर्म गर्मियों का भी सामना किया।
इस दौरान गर्मी के साथ सूखे ने भी लोगों की मुश्किलें बढ़ाईं। इबेरियाई प्रायद्वीप, फ्रांस, इटली, पश्चिमी बाल्कन और ग्रीस के कई हिस्सों में अगस्त की तुलना में सूखे की स्थिति और गंभीर हो गई। इसी तरह मध्य और पूर्वी यूरोप के कुछ हिस्सों में भी शुष्क मौसम का असर बना रहा।
नदियों में घटता जल इस संकट की गंभीरता को साफ दिखाता है। सितंबर में राइन, डेन्यूब, आदि नदियों के कुछ हिस्सों में जल प्रवाह रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। इसका असर कई देशों में जल परिवहन, जलापूर्ति और कृषि पर पड़ा। हालांकि महीने के अंतिम दिनों में हुई बारिश से कुछ सूखाग्रस्त इलाकों को राहत मिली, लेकिन फ्रांस और स्पेन के कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश के कारण बाढ़ भी आई। इसके विपरीत, उत्तरी और पूर्वोत्तर यूरोप तथा तुर्की के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की गई।
यूरोप के बाहर भी सितंबर में मौसम का असामान्य मिजाज देखने को मिला। उत्तरी अमेरिका के दक्षिणी और पूर्वोत्तर हिस्सों, उत्तरी अफ्रीका के मगरेब क्षेत्र, अफ्रीका के कुछ हिस्सों, साइबेरिया, मध्य एशिया के बड़े भागों, पाकिस्तान, चीन के कुछ इलाकों, दक्षिण अमेरिका के हिस्सों और दक्षिण-पूर्वी ऑस्ट्रेलिया में सामान्य से कम बारिश हुई।
इसके उलट अमेरिका और कनाडा के बड़े हिस्सों, उत्तरी रूस के कुछ क्षेत्रों, भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर में मध्य एशिया के हिस्सों, पूर्वी चीन, जापान, चिली, दक्षिणी अर्जेंटीना, दक्षिण-पूर्वी ब्राजील, अफ्रीका के सबसे दक्षिणी हिस्सों और पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में सामान्य से अधिक बारिश हुई। कई क्षेत्रों में भारी बारिश ने बाढ़ की स्थिति पैदा कर दी थी।
ये आंकड़े दिखाते हैं कि जलवायु परिवर्तन का असर केवल बढ़ते तापमान तक सीमित नहीं है। इसके साथ बारिश के बदलते पैटर्न, लंबे समय तक बने रहने वाले सूखे और कुछ क्षेत्रों में भारी बारिश जैसी स्थितियां भी सामने आ रही हैं।
ध्रुवीय क्षेत्रों में समुद्री बर्फ की स्थिति भी चिंता बढ़ा रही है। भले ही सितंबर में अंटार्कटिका के आसपास समुद्री बर्फ का दैनिक विस्तार सर्दियों के सालाना अधिकतम स्तर पर पहुंच गया, लेकिन यह उपग्रह रिकॉर्ड में अब तक का तीसरा सबसे कम अधिकतम स्तर था।
पूरे महीने का औसत विस्तार भी सितंबर के रिकॉर्ड में तीसरा सबसे कम रहा और सामान्य से करीब 6 फीसदी नीचे था।
इससे पहले 2023 में यह स्तर सामान्य से 9 फीसदी और 2024 में 8 फीसदी कम रहा था। अंटार्कटिका के अमुंडसेन-रॉस सागर क्षेत्र और हिंद महासागर वाले हिस्से में समुद्री बर्फ की कमी सबसे अधिक देखी गई।
आज के फैसलों से तय होगी जलवायु संकट की दिशा
आर्कटिक में सितंबर के दौरान समुद्री बर्फ का दैनिक विस्तार सालाना न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। यह उपग्रह से प्राप्त रिकॉर्ड में 14वां सबसे निचला स्तर था, जबकि पूरे महीने का विस्तार 16वां सबसे कम रहा और सामान्य से करीब 10 फीसदी नीचे दर्ज किया गया। हालांकि, यह सितंबर 2012 के रिकॉर्ड न्यूनतम स्तर से काफी ऊपर रहा, जब समुद्री बर्फ का विस्तार सामान्य से 32 फीसदी तक कम रह गया था।
कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के निदेशक कार्लो बुओन्तेम्पो के मुताबिक, सितंबर में दुनिया ने एक बार फिर रिकॉर्ड के सबसे गर्म महीनों में से एक का सामना किया। यूरोप के कई हिस्सों में असाधारण गर्मी उस भीषण गर्मी के बाद भी जारी रही, जिसने इस क्षेत्र को प्रभावित किया था।
उन्होंने चेतावनी दी कि वैश्विक तापमान के 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर रहने वाले महीनों का नया सिलसिला शुरू हो चुका है और मजबूत होता अल नीनो इसे 2027 तक जारी रख सकता है।
बुओन्तेम्पो के मुताबिक, पेरिस समझौते में तय तापमान की सीमा को पार करना अब लगभग तय है। लेकिन तापमान इस सीमा से कितना ऊपर जाएगा और कितने समय तक बढ़ा रहेगा, यह आज लिए जाने वाले फैसलों पर निर्भर करेगा। यानी, जलवायु का भविष्य अभी भी हमारे हाथों में है।
कुल मिलाकर, जलवायु संकट के ये आंकड़े महज तापमान के टूटते रिकॉर्ड की कहानी नहीं हैं। इनके पीछे सूखती नदियां, पानी के लिए बढ़ती जद्दोजहद, संकट में घिरती खेती और बाढ़ से उजड़ते लोगों की जिंदगी है।
दुनिया के सामने अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि धरती कितनी गर्म होगी, बल्कि यह भी है कि हम इस संकट को बढ़ने से कितना रोक पाएंगे। ऐसे में आज लिए फैसले ही तय करेंगे कि आने वाली पीढ़ियों को कैसी धरती विरासत में मिलेगी, एक तपती, संकटों से घिरी दुनिया या जीवन के अनुकूल सुरक्षित भविष्य।