दुनिया की हवा पहले से साफ जरूर हुई है, लेकिन इसका लाभ सभी लोगों तक बराबरी से नहीं पहुंचा।
चीन के सन यात-सेन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस वैश्विक अध्ययन से पता चलता है कि स्वच्छ हवा भी अब अमीर और गरीब के बीच बंट चुकी है। हर साल पीएम2.5 प्रदूषण से करीब 42 लाख असमय मौतें होती हैं, जिनका सबसे बड़ा बोझ गरीब समुदायों पर पड़ रहा है।
सबसे गरीब 10 फीसदी आबादी पर प्रदूषण से होने वाली कुल मौतों का लगभग 20 फीसदी हिस्सा दर्ज किया गया, जबकि सबसे अमीर 10 फीसदी आबादी में यह आंकड़ा महज एक फीसदी है।
अध्ययन बताता है कि राष्ट्रीय स्तर पर प्रदूषण घटने के बावजूद समाज के कमजोर तबके अब भी उद्योगों, ट्रैफिक और प्रदूषण के सबसे बड़े स्रोतों के बीच रहने को मजबूर हैं। यह असमानता केवल विकासशील देशों तक सीमित नहीं, बल्कि विकसित देशों में भी लगातार बढ़ रही है।
शोधकर्ताओं का निष्कर्ष स्पष्ट है कि केवल औसत वायु गुणवत्ता सुधारना पर्याप्त नहीं होगा। जब तक स्वच्छ हवा का लाभ समाज के सबसे कमजोर लोगों तक नहीं पहुंचेगा, तब तक प्रदूषण नियंत्रण की कोई भी सफलता अधूरी मानी जाएगी।
पूरी दुनिया में पिछले दो दशकों से पर्यावरण को लेकर एक ही कामयाबी की कहानी दोहराई जा रही है, गाड़ियां अब कम धुआं उगल रही हैं, कारखानों के लिए सरकारी नियम कड़े हुए हैं और कोयले जैसे दूषित ईंधनों से दुनिया धीरे-धीरे तौबा कर रही है।
कागजी आंकड़े भी गवाही देते हैं कि साल 2000 के मुकाबले 2019 की हवा हमारे फेफड़ों के लिए ज्यादा मेहरबान थी। लेकिन इस चमकती तस्वीर के पीछे एक कड़वा और स्याह सच भी छिपा है, जिसे अब तक वैश्विक स्तर पर नजरअंदाज किया जाता रहा और वह है हवा की असमानता।
इस बारे में किए एक नए अध्ययन में खुलासा हुआ है कि दुनिया में भले ही हवा औसतन रूप से साफ हुई हो, लेकिन इसका फायदा सभी लोगों तक समान रूप से नहीं पहुंच रहा। इसके उलट, साफ और प्रदूषित हवा में सांस लेने वालों के बीच खाई लगातार बढ़ रही है। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा कमजोर और कम आय वाले समुदायों को भुगतना पड़ा है।
यह अध्ययन चीन के सन यात-सेन विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिकों की अगुवाई में किया गया है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरमेंट में प्रकाशित हुए हैं।
अपने इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने उस बुनियादी सवाल पर काम किया है जिसे ज्यादातर सरकारी रिपोर्टें चालाकी से छोड़ देती हैं। सवाल यह नहीं था कि क्या दुनिया की हवा साफ हुई, बल्कि सवाल यह है कि क्या इस साफ हवा का फायदा समाज के हर तबके को बराबर मिला?
20 वर्षों के आंकड़ों से सामने आया बड़ा सच
अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने 2000 से 2019 के बीच दुनिया के करीब-करीब हर आबादी वाले इलाके के उपग्रह से जुटाए आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसमें प्रदूषण के बेहद महीन कणों 'पीएम2.5' के स्तर को स्थानीय आय और मृत्यु दर के आंकड़ों से जोड़ कर देखा गया। गौरतलब है कि पीएम2.5 प्रदूषण के इतने महीन कण होते हैं कि ये शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा को पार कर सीधे फेफड़ों और रक्त तक में पहुंच जाते हैं।
लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से हृदय रोग, स्ट्रोक, फेफड़ों का कैंसर और श्वसन संक्रमण जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
अध्ययन के अनुसार, हर साल औसतन करीब 42 लाख असमय मौतें केवल पीएम2.5 से जुड़ी हैं।
सिर्फ औसत नहीं, असमानता भी बढ़ी
यहां से इस रिपोर्ट का सबसे हैरान करने वाला पहलू शुरू होता है। अध्ययन में पाया गया कि पिछले बीस सालों में सबसे साफ हवा में सांस लेने वाले खुशकिस्मत लोगों की तादाद बहुत मामूली बढ़ी, यानी महज एक फीसदी से बढ़कर 2 फीसदी के आसपास पहुंच गई।
लेकिन दूसरी तरफ जहरीली और गंदी हवा में घुटने वाले लोगों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। दुनिया की पहले जहां एक-चौथाई आबादी इसकी चपेट में थी, वो अब उससे कहीं ज्यादा हो चुकी है। मतलब कि दुनिया इस मामले में दो ध्रुवों में बंटती जा रही है।
इसका सीधा मतलब यह है कि हवा के मामले में जो एक स्वस्थ मध्यम वर्ग होना चाहिए था, वह अब पूरी तरह गायब हो चुका है। आबादी अब दो छोरों पर बंट गई है। अब आप अपनी सेहत को लेकर कितने सजग हैं या आपकी आदतें कैसी हैं, इससे ज्यादा यह बात मायने रखती है कि आपका भूगोल क्या है।
गरीबों पर कहीं ज्यादा भारी पड़ रहा प्रदूषण
रुझान दर्शाते हैं कि जहां अमीर और सुरक्षित इलाकों में प्रदूषण से मौत का आंकड़ा प्रति लाख आबादी पर 20 या उससे भी कम है, वहीं गरीब और बदहाल इलाकों में यह संख्या 160 के पार जा चुकी है। मतलब कि आपकी जिंदगी और मौत का फैसला अब आपकी आदतें नहीं, बल्कि आपका इलाका तय कर रहा है।
अध्ययन में आय और प्रदूषण से होने वाली मौतों के बीच बेहद गहरी असमानता सामने आई। जब शोधकर्ताओं ने स्थानीय आय और वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों की तुलना की, तो सामने आया कि सबसे गरीब 10 फीसदी आबादी पर प्रदूषण से होने वाली कुल मौतों का लगभग पांचवां हिस्सा (करीब 20 फीसदी) दर्ज किया गया।
इसके उलट, सबसे अमीर 10 फीसदी लोगों में प्रदूषण से होने वाली मौतें महज एक फीसदी रहीं। दूसरे शब्दों में कहें तो, गरीबों और अमीरों के बीच प्रदूषण से होने वाली मौतों का अंतर करीब 18 गुणा है। शोधकर्ताओं ने इसे 'कॉन-पुअर इफ्फेक्ट' नाम दिया है।
यह पैटर्न 181 देशों और 1,800 से अधिक राज्यों एवं प्रांतों में लगभग समान रूप से देखा गया।
विकसित देशों में भी बढ़ रही खाई
इस अध्ययन के जो नतीजे सामने आए हैं, वो उन अमीर और विकसित देशों के लिए बड़ा झटका है जो यह दावा करते हैं कि उनके कड़े कानूनों और मजबूत व्यवस्था ने उनके नागरिकों को सुरक्षित रखा है। आंकड़े बताते हैं कि विकसित देशों में हवा जितनी साफ होती गई, उसके भीतर छिपी पर्यावरण से जुड़ी असमानता की खाई भी उतनी ही चौड़ी होती गई।
पिछले दो दशकों में इन अमीर मुल्कों के अंदर यह सामाजिक खाई 44 फीसदी तक चौड़ी हुई है। साफ हवा का सबसे ज्यादा फायदा संपन्न इलाकों को मिला, जबकि कम आय वाले समुदाय अब भी अपेक्षाकृत ज्यादा प्रदूषण झेल रहे हैं।
भले ही राष्ट्रीय स्तर पर प्रदूषण घटा है लेकिन मजदूर और गरीब तबके आज भी उद्योगों और सड़कों के किनारे वही दमघोंटू धुआं फांकने को मजबूर हैं।
प्रदूषण हर जगह एक जैसी बीमारियां नहीं बढ़ाता
रिसर्च में यह भी सामने आया है कि प्रदूषण का असर दुनिया के हर हिस्से में एक जैसा नहीं है। उदाहरण के लिए उत्तर अमेरिका और यूरोप की जहरीली हवा जहां लोगों के दिलों को बीमार कर रही है और हार्ट अटैक से मार रही है, वहीं अफ्रीका के गरीब देशों में कमजोर स्वास्थ्य ढांचे के चलते बच्चे और बुजुर्ग फेफड़ों के गंभीर संक्रमण से दम तोड़ रहे हैं।
एशिया की कहानी और भी दर्दनाक है, जहां प्रदूषण के कारण स्ट्रोक यानी दिमाग के दौरे का खतरा दुनिया के बाकी हिस्सों से सीधे दोगुणा पाया गया।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि उत्तर अमेरिका ने इस दौरान प्रदूषण से होने वाली मृत्यु दर में करीब 60 फीसदी की कमी हासिल की, जबकि दक्षिण अमेरिका में यह दर करीब 25 फीसदी बढ़ गई है।
वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर मॉडल्स के जरिए इस सदी के अंत तक के भविष्य का भी खाका खींचा है। दुनिया के सामने आज दो साफ रास्ते हैं। पहला रास्ता आपसी सहयोग, कड़े फैसलों और ग्रीन एनर्जी का है। इस परिदृश्य में यदि देशों के बीच सहयोग बढ़ता है और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन तेजी से घटाया जाता है, तो सदी के अंत तक वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों में भारी कमी आ सकती है।
दूसरा रास्ता देशों के बीच आपसी टकराव और कोयले-तेल के अंधाधुंध इस्तेमाल का है, जहां मौत का यह तांडव पूरी सदी थमेगा ही नहीं। इन दोनों रास्तों के बीच हर साल 76 लाख इंसानी जिंदगियों का अंतर है। करोड़ों लोगों की सांसें इस बात पर टिकी हैं कि दुनिया के हुक्मरान आज कौन सा रास्ता चुनते हैं।
सिर्फ हवा साफ करना काफी नहीं
यह अध्ययन बताता है कि वायु प्रदूषण को केवल राष्ट्रीय औसत से नहीं समझा जा सकता। यह सच है कि दुनिया भर की हवा पहले से साफ हो रही है, लेकिन अब यह पूरी कहानी नहीं है। इस ऐतिहासिक अध्ययन ने यह साबित कर दिया है कि साफ हवा का फायदा सबको बराबर नहीं मिल रहा।
किसी देश की 'औसत हवा' का साफ हो जाना कामयाबी का पैमाना नहीं हो सकता, क्योंकि राष्ट्रीय औसत की आड़ में समाज के सबसे कमजोर तबके को जानबूझकर मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। यदि साफ हवा का फायदा केवल संपन्न इलाकों तक सीमित रह जाए और गरीब समुदाय जहरीली हवा में सांस लेते रहें, तो प्रदूषण कम होने का दावा अधूरा ही रहेगा।
अब सरकारों को अपनी पूरी रणनीति बदलनी होगी। अब केवल उत्सर्जन घटाने से काम नहीं चलेगा। जरूरत इस बात की है कि गरीब बस्तियों, झुग्गियों और कारखानों के आसपास सीधे सर्जिकल स्ट्राइक की जाए, जहां प्रदूषण का गढ़ है। गरीब इलाकों में अस्पतालों का जाल बिछाना होगा और पर्यावरण की इस अमीर-गरीब वाली असमानता पर पैनी नजर रखनी होगी।
यह बीमारी किसी एक देश या राजनीतिक तंत्र की नहीं है, यह अमीर, गरीब, लोकतांत्रिक और तानाशाही, हर तरह की व्यवस्था में बिल्कुल एक जैसी मिली है। यह एक ढांचागत और सामाजिक गड़बड़ी है, जिसे सिर्फ फैक्ट्रियों की चिमनियां बदलने से ठीक नहीं किया जा सकता। इसके लिए पूरी सोच में बदलाव करना करना होगा।
यही वह रास्ता है, जिससे दुनिया वास्तव में सभी के लिए साफ हवा सुनिश्चित कर सकती है, न कि केवल उन लोगों के लिए जो पहले से ही बेहतर परिस्थितियों में रहते हैं।
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