जंगलों की आग से हर साल 14.3 करोड़ टन जहरीले कार्बनिक प्रदूषक हवा में घुल रहे हैं, जो पिछले अनुमानों से 21 फीसदी अधिक है।
यह प्रदूषण वायु गुणवत्ता और मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुका है।
अध्ययन में पाया गया कि जंगलों की आग और मानव गतिविधियों से निकलने वाले इंटरमीडिएट और सेमी-वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स लगभग समान मात्रा में जहर फैला रहे हैं।
जर्नल साइंस में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में सामने आया है कि 2001 के बाद से इस धधकते जंगलों से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) उत्सर्जन में 60 फीसदी की वृद्धि हुई है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने भी अपनी रिपोर्ट में माना है कि गंगा के मैदानों की धुंध और अमेजन के जंगलों की आग से उत्पन्न धुआं वायु प्रदूषण को बढ़ा रहे हैं, जिससे स्वास्थ्य, कृषि और अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।
जंगलों में लगी आग सिर्फ पेड़-पौधों को नहीं निगलती, वह धीरे-धीरे हमारी सांसों को भी जहरीला बना रही है। एक नए वैश्विक अध्ययन में सामने आया है कि आग की इन घटनाओं से निकलने वाला धुआं और गैसें अब तक लगाए गए अनुमानों से कहीं ज्यादा हैं, जिसका सीधा असर इंसानी सेहत और वायु गुणवत्ता पर पड़ रहा है।
जर्नल एनवायरमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी में प्रकाशित इस अध्ययन के मुताबिक, दुनिया भर में जंगलों की आग पहले के अनुमानों की तुलना में कहीं ज्यादा मात्रा में हानिकारक गैसें वातावरण में छोड़ रही हैं, जिससे वायु प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है और लोगों के स्वास्थ्य पर इसका खतरा गहराता जा रहा है। यह समस्या कितनी विकराल है इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने अपने इस अध्ययन में 1997 से 2023 के बीच दुनिया भर में जले जंगलों, घास के मैदानों और पीटलैंड के आंकड़ों को खंगाला है।
इस दौरान उन्होंने उन्होंने अलग-अलग तरह की वनस्पतियों के जलने पर निकलने वाले वोलाटाइल, इंटरमीडिएट और सेमी-वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स और अन्य बहुत कम उड़नशील कार्बनिक यौगिकों की जानकारी भी एकत्र की है।
इसके साथ ही जिन वनस्पतियों के लिए मैदानी स्तर पर माप उपलब्ध नहीं थे, उनके लिए वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला परीक्षणों के आधार पर यह अनुमान लगाया है कि उनके जलने पर कौन-कौन से यौगिक निकलते हैं। इसके बाद इन सभी आंकड़ों को जोड़कर टीम ने दुनिया भर के लिए सालाना उत्सर्जन का आकलन किया है।
अध्ययन के नतीजे दर्शाते हैं कि जंगलों में धधकती आग हर साल औसतन 14.3 करोड़ टन कार्बनिक प्रदूषक हवा में उत्सर्जित कर रही है, जो पिछले अनुमानों से 21 फीसदी अधिक है।
अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता ल्यूयिन हुआंग का प्रेस विज्ञप्ति में कहना है, “नए अनुमान दर्शाते हैं कि जंगलों की आग से निकलने वाले कार्बनिक प्रदूषकों का स्तर करीब 21 फीसदी अधिक है। यह जानकारी भविष्य में वायु गुणवत्ता सम्बन्धी मॉडल बनाने, स्वास्थ्य जोखिमों को समझने और जलवायु नीतियां तय करने में बेहद मददगार साबित होगी।“
धुंए में छिपा जहर
हर साल जंगलों में खड़े पेड़, घास के मैदान और पीटलैंड के बड़े हिस्से जंगलों में धधकती आग की भेंट चढ़ जाते हैं। इससे हवा में पानी की भाप, राख और कई तरह के कार्बन यौगिक मिल जाते हैं। इनमें से कुछ गैसें वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स कहलाती हैं। लेकिन इससे भी ज्यादा खतरनाक वे यौगिक होते हैं जो गर्मी में उड़कर गैस बन जाते हैं।
इन्हें इंटरमीडिएट और सेमी-वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स कहा जाता है। ये यौगिक हवा में जाकर बहुत महीन कण बना लेते हैं, जो सांस के साथ शरीर में पहुंचकर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
ये महीन कण फेफड़ों में गहराई तक पहुंच सकते हैं और सांस, दिल व अन्य बीमारियों का खतरा बढ़ा सकते हैं। अब तक के ज्यादातर शोध इन इंटरमीडिएट और सेमी-वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स को नजरअंदाज करते रहे हैं, क्योंकि इनकी संख्या बेहद अधिक होती है और इन्हें मापना मुश्किल होता है।
इंसानी गतिविधियों जितना ही जहर
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने जंगलों की आग से निकलने वाले प्रदूषकों की तुलना इंसानी गतिविधियों से होने वाले उत्सर्जन से भी की है। इसमें पाया गया कि कुल मिलाकर फैक्ट्रियों, गाड़ियों और अन्य इंसानी गतिविधियों से होने वाला प्रदूषण ज्यादा है।
लेकिन हैरानी की बात यह रही कि इंटरमीडिएट और सेमी-वोलाटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स के मामले में जंगलों की आग और इंसानी गतिविधियां करीब-करीब बराबर मात्रा में जहर फैला रही हैं।
अध्ययन में तीन ऐसे इलाके भी सामने आए जहां हालात सबसे ज्यादा चिंताजनक हैं। इन हॉटस्पॉट में भूमध्यरेखीय एशिया, उत्तरी अफ्रीका, और दक्षिण-पूर्व एशिया शामिल हैं। इन क्षेत्रों के जंगलों में धधकती आग और इंसानी गतिविधियां मिलकर हवा को बेहद प्रदूषित कर रही हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि इन इलाकों में वायु प्रदूषण की चुनौती बेहद जटिल है और जंगलों की आग व इंसानी गतिविधियों, दोनों से होने वाले उत्सर्जन को कम करने के लिए अलग-अलग रणनीतियों की जरूरत है।
पर्यावरण के लिए खतरा बन रहा उत्सर्जन
जर्नल साइंस में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में सामने आया है कि 2001 के बाद से इस धधकते जंगलों से होने वाले कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ2) उत्सर्जन में 60 फीसदी की वृद्धि हुई है। वहीं जलवायु के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील उत्तरी बोरियल वनों में यह उत्सर्जन करीब तीन गुना बढ़ गया है।
रिसर्च से पता चला है कि उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से बाहर मौजूद वनों में भी कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इन क्षेत्रों में प्रति वर्ष करीब 50 करोड़ टन अतिरिक्त सीओ2 का उत्सर्जन हो रहा है। इसका मतलब है कि कहीं न कहीं उत्सर्जन का केन्द्र उष्णकटिबंधीय जंगलों से हटकर उष्णकटिबंधीय जंगलों के बाहरी क्षेत्रों की ओर शिफ्ट हो रहा है।
इसी कड़ी में तस्मानिया विश्वविद्यालय के एक अध्ययन से पता चला है कि इंसानी गतिविधियों ने जंगल की आग के मौसम को औसतन 40 दिन बढ़ा दिया है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक सबसे बड़ा बदलाव उष्णकटिबंधीय घासभूमि में देखने को मिला है, जहां इंसानी गतिविधियों ने आग के मौसम को करीब तीन महीने बढ़ा दिया है। अब यहां ज्यादातर आग इस मानवीय बदलाव वाले समय में लग रही है। यहां तक कि सुदूर बोरियल जंगल और टुंड्रा क्षेत्र भी अब आग के लंबे मौसम का सामना कर रहे हैं।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने भी अपनी रिपोर्ट में माना है कि गंगा के मैदानों की धुंध और अमेजन के जंगलों की आग से उत्पन्न धुआं वायु प्रदूषण को बढ़ा रहे हैं, जिससे स्वास्थ्य, कृषि और अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। बता दें कि 2024 में अमेजन के जंगल में लगी भीषण आग से निकले धुंए ने हजारों किलोमीटर दूर बसे शहरों की हवा भी खराब कर दी थी। इससे साफ है कि जंगल की आग केवल स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक खतरा भी है। अमेजन, कनाडा और साइबेरिया जैसे क्षेत्रों की आग ने प्रदूषण के महीन कणों (पीएम2.5) के स्तर को रिकॉर्ड उंचाई पर पहुंचा दिया।
रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि वायु गुणवत्ता और जलवायु के बीच गहरा संबंध है। इसमें सूक्ष्म कणों (एरोसॉल्स) की भूमिका पर जोर दिया गया है, जो जंगलों की आग, सर्दियों की धुंध, जहाजों के धुंए और शहरी प्रदूषण में अहम हिस्सा निभाते हैं।
अध्ययन का सन्देश बेहद स्पष्ट है, जंगलों की आग सिर्फ पर्यावरण की ही नहीं, बल्कि इंसानी सेहत की भी बड़ी दुश्मन बन चुकी है। अगर इन पर समय रहते काबू नहीं पाया गया, तो आने वाले वर्षों में सांस लेना और भी मुश्किल हो सकता है।