ग्लोबल ईवी आउटलुक 2026 के मुताबिक इस साल वैश्विक स्तर पर इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री 2.3 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है, जिसका मतलब है कि दुनिया भर में बिकने वाली हर दस नई कारों में से तीन पूरी तरह इलेक्ट्रिक होंगी। इलस्ट्रेशन: आईस्टॉक 
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तेल संकट के बीच ईवी बूम: 2026 में 2.3 करोड़ तक पहुंच सकती है इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री

बैटरियों की घटती कीमतों, वैश्विक तेल संकट और सरकारी प्रोत्साहन के चलते दुनिया तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ रही है, जबकि चीन वैश्विक ईवी बाजार पर अपना दबदबा बनाए हुए है

Lalit Maurya

  • वैश्विक तेल संकट, महंगे ईंधन और जलवायु संकट के बीच दुनिया तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की ओर रुख कर रही है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की ताजा रिपोर्ट बताती है कि 2026 में वैश्विक स्तर पर इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री 2.3 करोड़ तक पहुंच सकती है, यानी दुनिया में बिकने वाली हर तीन में से एक नई कार इलेक्ट्रिक होगी।

  • 2025 में पहली बार ईवी बिक्री 2 करोड़ के पार पहुंची और करीब 100 देशों ने रिकॉर्ड बिक्री दर्ज की। बैटरियों की गिरती कीमतों और सरकारी प्रोत्साहनों ने ईवी को आम लोगों के लिए पहले से अधिक किफायती बना दिया है।

  • रिपोर्ट के मुताबिक, चीन अभी भी वैश्विक ईवी बाजार और सप्लाई चेन का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। दुनिया में बनने वाली हर चार में से तीन इलेक्ट्रिक कारें चीन में तैयार हुईं, जबकि बैटरी सेल उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी 80 फीसदी से अधिक रही। दूसरी ओर, यूरोप, लैटिन अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे क्षेत्रों में भी ईवी बाजार तेजी से फैल रहा है।

  • भारत में भी इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री ने 2025 में 75 फीसदी की छलांग लगाई और 1.65 लाख यूनिट तक पहुंच गई।

  • टाटा और महिंद्रा जैसी कंपनियां इस बदलाव की अगुवाई कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यही रफ्तार बनी रही, तो आने वाले दशक में दुनिया की सड़कों और ऊर्जा व्यवस्था की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।

सड़क पर दौड़ती गाड़ियों की दुनिया धीरे-धीरे बदल रही है, पेट्रोल-डीजल की जगह अब बैटरी से चलने वाली इलेक्ट्रिक कारें तेजी से जगह बना रही हैं। कभी जो बदलाव दूर की कौड़ी लगता था, वह अब वैश्विक हकीकत बन चुका है।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) की ताजा रिपोर्ट 'ग्लोबल ईवी आउटलुक 2026' के मुताबिक दुनिया भर में इलेक्ट्रिक वाहनों का दबदबा तेजी से बढ़ रहा है।

मध्य पूर्व में संघर्ष से उपजे गंभीर वैश्विक ऊर्जा संकट और तेल आपूर्ति के झटकों के बीच, 2026 में इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री एक नया रिकॉर्ड बनाने की राह पर है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल मिली अभूतपूर्व कामयाबी के बाद 2026 में भी यह रफ्तार थमने वाली नहीं है। इस साल वैश्विक स्तर पर इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री 2.3 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है, जिसका मतलब है कि दुनिया भर में बिकने वाली हर दस नई कारों में से तीन पूरी तरह इलेक्ट्रिक होंगी।

बदल रही ऑटो बाजार की तस्वीर

यह क्रांतिकारी बदलाव मुख्य रूप से पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता और तकनीकी सुधारों के कारण हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, बैटरी की कीमतों में लगातार आ रही भारी गिरावट की वजह से अब इलेक्ट्रिक वाहन पेट्रोल और डीजल कारों के मुकाबले बेहद किफायती और प्रतिस्पर्धी हो गए हैं।

यही वजह है कि ईंधन की घटती-बढ़ती कीमतों से परेशान उपभोक्ता तेजी से ईवी का रुख कर रहे हैं।

बिना किसी नई सरकारी नीति के भी यह अनुमान लगाया गया है कि साल 2035 तक दुनिया की सड़कों पर दौड़ने वाले इलेक्ट्रिक वाहनों (दोपहिया और तिपहिया वाहनों को छोड़कर) की संख्या आज के 8 करोड़ के आंकड़े से बढ़कर 51 करोड़ के पार पहुंच जाएगी।

अगर आंकड़ों पर नजर डालें, तो पिछला साल यानी 2025 इस क्रांति का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ, जब दुनिया भर में 2 करोड़ से ज्यादा इलेक्ट्रिक कारें बिकीं और कुल ऑटो बाजार में इनकी हिस्सेदारी 25 फीसदी तक पहुंच गई। दुनिया के करीब 100 देशों ने पिछले साल ईवी की रिकॉर्ड बिक्री दर्ज की, जिनमें से करीब 40 देशों में तो बिकने वाली हर दस कारों में से एक कार इलेक्ट्रिक थी।

2025 बना टर्निंग पॉइंट, रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची ईवी बिक्री

कारों के साथ-साथ भारी वाहनों के बाजार में भी बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। साल 2025 में इलेक्ट्रिक ट्रकों की वैश्विक बिक्री पिछले साल के मुकाबले दोगुनी से भी अधिक हो गई, जिससे कुल बिकने वाले ट्रकों में अब हर दसवां ट्रक इलेक्ट्रिक हो चुका है।

इसी तरह सड़क परिवहन में सबसे तेजी से इलेक्ट्रिक होते दोपहिया और तिपहिया वाहनों की बिक्री भी 2025 में लगातार बढ़ती रही।

हालांकि, 2026 की शुरुआत में चीन और अमेरिका जैसे बड़े बाजारों में कुछ नीतिगत बदलावों के चलते पहली तिमाही की वैश्विक बिक्री में 2025 की पहली तिमाही की तुलना में 8 फीसदी की मामूली गिरावट जरूर दर्ज की गई, लेकिन इस गिरावट के पीछे दुनिया के बाकी हिस्सों में आया एक बड़ा उछाल छुपा था।

इस दौरान चीन को छोड़कर पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बिक्री में 80 फीसदी, लैटिन अमेरिका में 75 फीसदी और यूरोप में करीब 30 प्रतिशत की भारी सालाना वृद्धि देखी गई। अकेले मार्च के महीने में ही दुनिया के करीब 90 देशों ने शानदार बढ़त दर्ज की, जिनमें से 30 देशों ने मासिक बिक्री के अपने सारे पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए।

इस पूरी वैश्विक क्रांति के बीच दक्षिण-पूर्वी एशिया एक नए और सबसे बड़े हॉटस्पॉट के रूप में उभर रहा है। वियतनाम और थाईलैंड जैसे देशों में पिछले साल इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री दोगुनी से अधिक हो गई और वहां के बाजार में इलेक्ट्रिक कारों की हिस्सेदारी 20 फीसदी तक पहुंच गई।

90 देशों ने तोड़े बिक्री के रिकॉर्ड

सकारात्मक नीतियों और बेहतर कीमतों के दम पर साल 2035 तक इस क्षेत्र में यह हिस्सेदारी 60 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। वियतनाम जैसे देशों ने तो मौजूदा ऊर्जा संकट से निपटने के लिए ईवी पर मिलने वाली टैक्स छूट को और बढ़ाने का फैसला किया है।

आईईए के कार्यकारी निदेशक फातिह बिरोल ने इस ऐतिहासिक बदलाव पर टिप्पणी करते हुए कहा कि, “इलेक्ट्रिक कारों की बढ़ती लोकप्रियता न केवल कार बाजारों को बदल रही है, बल्कि पूरी ऊर्जा प्रणाली को एक नया रूप दे रही है। इतिहास के सबसे बड़े तेल संकट के बीच ईवी दुनिया को बड़ी राहत दे रही हैं।“

उन्होंने भरोसा जताया कि बैटरी की घटती कीमतें और सरकारों के सकारात्मक नीतिगत कदम आने वाले समय में ईवी बाजार को और अधिक रफ्तार देंगे।

चीन का दबदबा कायम, दुनिया की तीन-चौथाई ईवी वहीं बनीं

इस पूरी वैश्विक दौड़ में चीन आज भी इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की मैन्युफैक्चरिंग का सबसे बड़ा गढ़ बना हुआ है। पिछले साल दुनिया भर में बनी करीब 2.2 करोड़ इलेक्ट्रिक कारों में से तीन-चौथाई का निर्माण अकेले चीन में हुआ। घरेलू मांग से ज्यादा उत्पादन होने के कारण चीन का ईवी निर्यात भी दोगुना होकर 25 लाख के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।

स्थिति यह है कि चीन, यूरोप और अमेरिका जैसे बड़े बाजारों के बाहर दुनिया के बाकी देशों में बिकने वाली 55 फीसदी इलेक्ट्रिक कारें चीन से आयात की गईं। पांच साल पहले यह हिस्सेदारी पांच फीसदी से भी कम थी। इसके अलावा, ईवी की रीढ़ कहे जाने वाली बैटरी सेल के निर्माण में भी चीन की 80 फीसदी से ज्यादा की हिस्सेदारी है, जो सप्लाई चेन पर उसके एकछत्र आधिपत्य को दर्शाती है।

इसी तरह ईवी बैटरियों में इस्तेमाल होने वाले अहम कच्चे माल के उत्पादन में भी चीन की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा बनी हुई है।

रिपोर्ट के मुताबिक भारत में इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री अभी भी सीमित है, लेकिन अब इसमें तेजी दिखने लगी है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र का दूसरा सबसे बड़ा कार बाजार होने के बावजूद भारत में इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री वियतनाम और थाईलैंड से भी कम रही। हालांकि, 2025 में इसमें बड़ा उछाल दर्ज किया गया।

टाटा-महिंद्रा के दम पर आगे बढ़ रहा भारत का ईवी बाजार

2025 में भारत में इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री सालाना आधार पर 75 फीसदी बढ़कर 1.65 लाख तक पहुंच गई, जो कुल कार बिक्री का करीब चार फीसदी हिस्सा है। इनमें से करीब 60 फीसदी इलेक्ट्रिक कारें भारतीय कंपनियों टाटा और महिंद्रा ने देश में ही तैयार कीं।

महिंद्रा ने 2025 में दो नए इलेक्ट्रिक मॉडल लॉन्च किए, जिसके बाद उसकी ईवी बिक्री 2024 के मुकाबले पांच गुना बढ़ गई।

देश में इलेक्ट्रिक कारों के बढ़ते बाजार को देखते हुए कई नई कंपनियों ने भी प्रवेश किया। 2024 से 2025 के बीच भारत में उपलब्ध इलेक्ट्रिक कार मॉडलों की संख्या 33 से बढ़कर 45 हो गई।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की एक अन्य रिपोर्ट ‘ग्लोबल एनर्जी रिव्यू 2026’ के मुताबिक 2025 में देश में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री 23 लाख यूनिट के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई, जबकि इस दौरान इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री में 75 फीसदी से ज्यादा की जबरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई।

भारत में इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री के जो आंकड़े आईईए ने 2024 में साझा किए थे उनसे पता चला है कि जहां 2019 में 680 इलेक्ट्रिक कारें बेची गई। वहीं 2023 में यह आंकड़ा 120 गुणा बढ़कर 82,000 पर पहुंच गया।

सरकार की नई नीति से ईवी निर्माण को मिलेगा बढ़ावा

एक अन्य रिपोर्ट के हवाले से पता चला है कि भारत इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर बाजार में वैश्विक नेता बनकर उभरा है। 2024 के दौरान दुनिया में जितने भी इलेक्ट्रिक थ्री-व्हीलर बिके थे, उनमें से 57 फीसदी अकेले भारत में बेचे गए थे।

इलेक्ट्रिक वाहन निर्माण को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने 2024 में “स्कीम टू प्रमोट मैन्युफैक्चरिंग ऑफ इलेक्ट्रिक पैसेंजर कार्स इन इंडिया” की घोषणा की थी। जून 2025 में इसके अंतिम नियम जारी किए गए।

इस योजना के तहत चुनी गई कंपनियां 35,000 डॉलर या उससे अधिक कीमत वाली पूरी तरह तैयार आयातित इलेक्ट्रिक कारों पर केवल 15 फीसदी आयात शुल्क देकर उन्हें भारत ला सकेंगी। सामान्य तौर पर ऐसे वाहनों पर 110 फीसदी तक शुल्क लगता है। यह छूट पांच साल तक लागू रहेगी।

हालांकि कई कंपनियों ने इस योजना में रुचि दिखाई, लेकिन 2025 में उन्होंने फैसला टाल दिया। कंपनियों का कहना है कि यूरोपियन यूनियन और भारत के बीच चल रही मुक्त व्यापार समझौता वार्ताओं तथा चीन द्वारा रेयर-अर्थ मैग्नेट के निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण अनिश्चितता बनी हुई है।

कुल मिलाकर, इलेक्ट्रिक वाहनों की यह तेजी से बढ़ती दुनिया केवल ऑटोमोबाइल बाजार का बदलाव नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा और अर्थव्यवस्था के नए दौर की शुरुआत है।

बैटरियों की सस्ती होती कीमतें, तेल संकट और जलवायु चिंताओं के बीच ईवी अब भविष्य का विकल्प नहीं, बल्कि वर्तमान की जरूरत बनते जा रहे हैं। हालांकि सप्लाई चेन, व्यापार तनाव और कच्चे माल पर निर्भरता जैसी चुनौतियां अभी बाकी हैं, लेकिन जिस रफ्तार से दुनिया ईवी की ओर बढ़ रही है, उससे साफ है कि आने वाले दशक में सड़कों की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है।