साफ हवा अब केवल सांस लेने की जरूरत नहीं, बल्कि बच्चों के स्वस्थ भविष्य की सबसे बड़ी सुरक्षा बन गई है।
एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पता चला है कि बचपन में, खासकर स्कूल के आसपास, लंबे समय तक जहरीली हवा के संपर्क में रहने से बच्चों में मेटाबॉलिक सिंड्रोम का खतरा बढ़ सकता है। यह ऐसी स्थिति है, जो आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों की नींव रख सकती है।
अध्ययन के अनुसार, प्रदूषण का असर सिर्फ फेफड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शरीर के चयापचय (मेटाबोलिज्म), रक्त में शर्करा और वसा के संतुलन तथा रक्तचाप को नियंत्रित करने वाली प्रक्रियाओं को भी प्रभावित करता है।
शोध में यह भी सामने आया कि घर की तुलना में स्कूल के आसपास का प्रदूषण बच्चों के लिए अधिक नुकसानदायक हो सकता है, क्योंकि वहां वे अधिक शारीरिक गतिविधियां करते हैं और ज्यादा प्रदूषित हवा अंदर लेते हैं।
शोधकर्ताओं ने चेताया है कि बच्चों को स्वच्छ हवा उपलब्ध कराना केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को समय से पहले होने वाली गंभीर बीमारियों से बचाने का भी सवाल है।
बार्सिलोना इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ से जुड़े वैज्ञानिकों द्वारा किए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि घर और खासकर स्कूल के आसपास वायु प्रदूषण के अधिक संपर्क में रहने वाले बच्चों में आगे चलकर मेटाबोलिक सिंड्रोम का खतरा बढ़ सकता है।
इससे भविष्य में उनमें टाइप-2 डायबिटीज, उच्च रक्तचाप और हृदय सम्बन्धी रोगों की आशंका बढ़ जाती है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित साइंटिफिक जर्नल 'एनवायरमेंटल रिसर्च' में प्रकाशित हुए हैं।
बता दें कि मेटाबोलिक सिंड्रोम कोई एक बीमारी नहीं बल्कि कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का समूह है। इसमें पेट के आसपास चर्बी बढ़ना, उच्च रक्तचाप, रक्त शर्करा का बढ़ा स्तर और रक्त में असामान्य वसा (कोलेस्ट्रॉल/फैट) शामिल हैं। चिंता की बात है कि अगर बचपन में ही ये लक्षण पनपने लगें, तो आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज और दिल के दौरे का खतरा काफी बढ़ जाता है।
बच्चों पर क्यों पड़ता है ज्यादा असर?
वैज्ञानिकों के मुताबिक बच्चे वायु प्रदूषण के प्रति वयस्कों की तुलना में कहीं अधिक संवेदनशील होते हैं। इसका कारण यह है कि उनके शरीर के अंग और प्रतिरक्षा तंत्र अभी विकसित हो रहे होते हैं।
साथ ही, वे अपने वजन के अनुपात में सांस के जरिए ज्यादा हवा अंदर खींचते हैं। इतना ही नहीं वे खेल-कूद के साथ-साथ अन्य गतिविधियों के दौरान अक्सर खुली हवा में ज्यादा समय बिताते हैं। इसलिए दूषित हवा का असर उनके शरीर पर कहीं ज्यादा गहरा पड़ सकता है।
अपने इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने फ्रांस, ग्रीस, लिथुआनिया, नॉर्वे, स्पेन और यूनाइटेड किंगडम के 6 से 11 वर्ष आयु के 1,147 बच्चों से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण किया है। इन सभी बच्चों ने 2013 से 2016 के बीच हेलिक्स परियोजना में भाग लिया था।
वैज्ञानिकों ने बच्चों के घर, स्कूल और आने-जाने के रास्ते पर मौजूद दो प्रमुख प्रदूषकों पीएम2.5 और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (एनओ₂) के वार्षिक स्तर का आकलन किया। इसके लिए प्रमाणित मॉडलों की मदद ली गई। इसके साथ ही बच्चों के स्वास्थ्य, रक्तचाप, रक्त में वसा और इंसुलिन के स्तर के आधार पर उनके मेटाबोलिक सिंड्रोम जोखिम स्कोर का विश्लेषण किया गया।
वैज्ञानिकों ने इस दौरान यह समझने का प्रयास किया कि प्रदूषण के संपर्क में आने से बच्चों के मेटाबॉलिक हेल्थ पर क्या असर पड़ रहा है।
घर से ज्यादा खतरनाक साबित हो रहा स्कूल में प्रदूषण का संपर्क
इस स्टडी में सबसे हैरान करने वाली बात यह सामने आई कि घर की तुलना में स्कूल के वातावरण में मौजूद प्रदूषण का बच्चों की सेहत पर कहीं ज्यादा बुरा असर पड़ रहा है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि स्कूल में बच्चे अधिक दौड़ते-भागते और शारीरिक गतिविधियां करते हैं, जिससे उनकी सांस लेने की गति बढ़ जाती है। इससे जहरीले कण (पीएम2.5 और एनओ2) फेफड़ों के जरिए शरीर में ज्यादा गहराई तक समा जाते हैं। नतीजन स्वास्थ्य पर इनका प्रभाव भी बढ़ जाता है।
दिलचस्प बात यह रही कि स्कूल आने-जाने के रास्ते के प्रदूषण या जांच से कुछ दिन पहले के अल्पकालिक प्रदूषण का इस जोखिम से कोई स्पष्ट संबंध नहीं मिला। इससे संकेत मिलता है कि वायु प्रदूषण का नुकसान धीरे-धीरे लंबे समय तक संपर्क में रहने से विकसित होता है।
शरीर पर कैसे असर करता है प्रदूषण?
वैज्ञानिकों के अनुसार वायु प्रदूषण शरीर में सूजन (इन्फ्लेमेशन) और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को बढ़ा सकता है। यह रक्त में वसा और शर्करा के संतुलन तथा रक्तचाप को नियंत्रित करने वाली प्रक्रियाओं को भी प्रभावित करता है। यही बदलाव समय के साथ मेटाबोलिक सिंड्रोम के विकास का कारण बन सकते हैं।
ऐसे में शोधकर्ताओं का कहना है कि दुनिया भर में करोड़ों बच्चे प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। यह अध्ययन साफ संकेत देता है कि वायु प्रदूषण कम करना केवल फेफड़ों की सुरक्षा का नहीं, बल्कि बच्चों को भविष्य में डायबिटीज, हृदय रोग और अन्य चयापचय संबंधी बीमारियों से बचाने का भी महत्वपूर्ण कदम है।
सॉफ हवा बच्चों को आज स्वस्थ रखने के साथ-साथ उनके आने वाले जीवन को भी अधिक सुरक्षित बना सकती है।
यह अध्ययन साफ संकेत देता है कि वायु प्रदूषण का खतरा सिर्फ बच्चों के फेफड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके पूरे भविष्य पर मंडरा रहा है। अगर आज हम उन्हें साफ हवा नहीं दे सके, तो कल उन्हें कम उम्र में ही डायबिटीज, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों की कीमत चुकानी पड़ सकती है।
हमें नहीं भूलना चाहिए कि हमारे द्वारा आज उठाए कदम ही तय करेंगे कि हमारी आने वाली पीढ़ियां स्वस्थ होगी या बीमार। देश में वायु गुणवत्ता की ताजा जानकारी आप डाउन टू अर्थ के एयर क्वालिटी ट्रैकर से प्राप्त कर सकते हैं।