मैकमास्टर यूनिवर्सिटी के एक नए अध्ययन ने चेतावनी दी है कि हर दिन जहरीली हवा में सांस लेना केवल फेफड़ों और दिल ही नहीं, बल्कि दिमाग को भी धीरे-धीरे खोखला कर रहा है।
स्टडी में सामने आया है कि वाहनों, उद्योगों और जंगल की आग से निकलने वाले पीएम2.5 जैसे महीन प्रदूषक लोगों की याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता और मानसिक सक्रियता पर असर डाल रहे हैं। इसका सबसे ज्यादा असर महिलाओं पर देखा गया है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि यह असर उन इलाकों में भी देखा गया जहां प्रदूषण का स्तर अंतरराष्ट्रीय मानकों के भीतर था।
अध्ययन के दौरान किए गए एमआरआई स्कैन में दिमाग को होने वाले महीन लेकिन स्पष्ट नुकसान के संकेत मिले। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह बदलाव बिना किसी बड़े लक्षण के वर्षों तक चुपचाप दिमाग को प्रभावित करते रहते हैं। विशेषज्ञों ने चेताया है कि डिमेंशिया जैसी बीमारियां अचानक नहीं होतीं, बल्कि दशकों तक चलने वाले ऐसे खतरों का परिणाम हो सकती हैं।
हैरान करने वाली बात यह है कि यह दिमागी नुकसान कनाडा जैसे बेहद साफ हवा वाले देश में पाया गया, जहां प्रदूषण का स्तर अंतरराष्ट्रीय मानकों के अंदर था। ऐसे में यह रिसर्च भारत के लिए किसी महा-संकट की चेतावनी है। भारत जैसे देश, जहां दिल्ली-एनसीआर, लखनऊ और कानपुर जैसे दर्जनों शहरों में प्रदूषण का स्तर अक्सर डब्ल्यूएचओ द्वारा निर्धारित मानकों से कई गुणा अधिक रहता है, उनके लिए यह अध्ययन गंभीर चेतावनी है।
देश की दो-तिहाई से ज्यादा आबादी राष्ट्रीय मानकों से भी बदतर हवा में सांस लेने को मजबूर है। ऐसे में सोचिए कि अगर कनाडा की अपेक्षाकृत साफ हवा भी दिमाग को नुकसान पहुंचा रही है, तो भारत की जहरीली हवा आने हमारे बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के दिमाग पर कितना गहरा असर डाल रही होगी?
क्या आप जानते हैं कि हम हर दिन जिस हवा में सांस लेते हैं, वह सिर्फ फेफड़ों और दिल को ही नहीं, बल्कि हमारे दिमाग को भी सुस्त बना सकती है।
इस बारे में कनाडा की मैकमास्टर यूनिवर्सिटी द्वारा किए एक नए अध्ययन में सामने आया है कि सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों, उद्योगों और जंगल की आग से निकलने वाले पीएम2.5 जैसे प्रदूषण के बेहद महीन कण लोगों की सोचने-समझने और फैसला लेने की मानसिक क्षमता को कमजोर कर सकते हैं।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल स्ट्रोक में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि जिन इलाकों में वायु प्रदूषण का स्तर अधिक था, वहां रहने वाले लोगों की याददाश्त, सोचने-समझने की क्षमता और मानसिक सक्रियता अपेक्षाकृत कमजोर पाई गई।
सालों तक दिमाग को खोखला करता रहता है धीमा जहर
चिंताजनक बात यह है कि यह असर उन क्षेत्रों में भी दिखा, जहां प्रदूषण का स्तर अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से तय सीमा के भीतर था। वहीं भारत की बात करें तो अक्सर ज्यादातर शहरों में प्रदूषण का स्तर तय मानकों से अधिक ही रहता है।
अध्ययन के दौरान किए एमआरआई स्कैन में यह भी सामने आया कि यातायात से होने वाला प्रदूषण दिमाग को महीन लेकिन स्पष्ट नुकसान पहुंच रहा है।
हैरान करने वाली बात यह है कि यह पुरुषों की तुलना में महिलाओं के दिमाग पर इसका असर ज्यादा स्पष्ट देखा गया। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि उच्च रक्तचाप, मधुमेह और मोटापे जैसे हृदय संबंधी बीमारियों को ध्यान में रखने के बाद भी वायु प्रदूषण और दिमागी नुकसान के बीच गहरा संबंध बना रहा।
यानी खतरा सिर्फ दिल तक सीमित नहीं है, जहरीली हवा सीधे हमारे मस्तिष्क पर असर डाल सकती है, और उसकी कार्यक्षमता को कमजोर कर सकती है।
रातों-रात नहीं होती भूलने की बीमारी
मैकमास्टर यूनिवर्सिटी और अध्ययन से जुड़े प्रमुख शोधकर्ता रसेल डिसूजा का इस बारे में कहना है, "डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) रातों-रात नहीं होता, इसे विकसित होने में दशकों लगते हैं। दिमाग को नुकसान पहुंचाने वाले इन बाहरी कारणों की समय रहते पहचान बेहद जरूरी है, ताकि बुढ़ापे में दिमागी सेहत को सुरक्षित रखा जा सके।"
हालांकि स्पष्ट कर दें कि यह अध्ययन सीधे तौर पर यह साबित नहीं करता कि वायु प्रदूषण डिमेंशिया का कारण बनता है, लेकिन यह उन बढ़ते वैज्ञानिक प्रमाणों को मजबूत करता है जो बताते हैं कि खराब हवा उम्र बढ़ने के साथ याददाश्त और सोचने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है।
यह अध्ययन इसलिए भी बेहद चौंकाने वाला है क्योंकि यह भारत जैसे अत्यधिक प्रदूषित देश में नहीं, बल्कि कनाडा में किया गया, एक ऐसा देश जिसे दुनिया की सबसे साफ हवा वाले देशों में गिना जाता है।
साफ हवा ही एकमात्र इलाज
इस अध्ययन में कनाडा के पांच प्रांतों के करीब 7,000 मध्यम आयु वर्ग के लोगों को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने कई वर्षों तक लोगों के प्रदूषण के संपर्क और उनकी मानसिक क्षमता के परीक्षणों की तुलना की।
इस दौरान दो प्रमुख प्रदूषकों पीएम2.5 और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड पर ध्यान दिया गया। गौरतलब है कि पीएम2.5, प्रदूषण के बेहद महीन कण होते हैं, जो वाहनों, उद्योग और जंगल की आग के धुएं से निकलते हैं। वहीं नाइट्रोजन डाइऑक्साइड मुख्य रूप से वाहनों के धुएं से पैदा होती है।
मैकमास्टर यूनिवर्सिटी की असिस्टेंट प्रोफेसर और अध्ययन से जुड़ी सैंडी अजाब का कहना है, "कनाडा की हवा को अक्सर साफ कहा जाता है, लेकिन निष्कर्ष दर्शाते हैं कि प्रदूषण का कम स्तर भी दिमागी सेहत को बिगाड़ रहा है। ये ऐसे बदलाव हैं जो बिना किसी लक्षण के, सालों तक चुपचाप आपके दिमाग को खोखला करते रहते हैं।"
भारत के लिए भी खतरे की घंटी
ऐसे में यह समझना जरुरी है कि भारत के कई शहरों जैसे दिल्ली-एनसीआर, सिंगरौली, फरीदाबाद, मेरठ, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, जींद, कैथल, अंबाला, पंचकुला, बहादुरगढ़, चंद्रपुर, मानेसर, बर्नीहाट (असम), मंडीदीप, खन्ना, भिवानी, जयपुर, करनाल, लखनऊ, धारूहेड़ा, गुरुग्राम, वातवा, आगरा, कानपुर आदि शहरों में प्रदूषण का स्तर अक्सर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी मानकों से कई गुणा अधिक रहता है।
ऐसे में यह समस्या भारत के लिए कितनी गंभीर है उसका अंदाजा आप स्वयं ही लगा सकते हैं।
आंकड़ों को देखें तो वायु गुणवत्ता के लिहाज से भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान के बाद दुनिया का तीसरा सबसे प्रदूषित देश है। जहां 2023 में प्रदूषण के महीन कणों यानी पीएम2.5 का औसत स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा तय मानकों से दस गुणा ज्यादा था। देश में प्रदूषण की समस्या इतनी विकट है कि आज देश का हर इंसान ऐसी हवा में सांस लेने को मजबूर है जो उसे हर पल बीमार बना रही है।
इतना ही नहीं देश की 67.4 फीसदी आबादी आज ऐसे क्षेत्रों में रह रही है जहां प्रदषूण का स्तर देश के अपने स्वयं के राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता मानकों (40 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर) से भी ज्यादा है। इसका सीधा असर न केवल भारतीयों के शारीरिक बल्कि मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता पर भी पड़ रहा है।
गौरतलब है कि सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) और डाउन टू अर्थ लम्बे समय से बढ़ते प्रदूषण के खतरों को लेकर आगाह करता रहा है।
हालांकि इसके बावजूद दिल्ली, फरीदाबाद सहित देश के कई अन्य छोटे बड़े शहरों में वायु गुणवत्ता लोगों को बहुत ज्यादा बीमार बना रही है। देश में स्थिति किस कदर खराब है इसे इसी बात से समझ जा सकता है कि भारत में प्रदूषण के यह महीन कण (पीएम 2.5) हर साल दो लाख से ज्यादा अजन्मों को गर्भ में मार रहे हैं।
सच कहें तो यह रिसर्च भारत जैसे देश के लिए एक गंभीर चेतावनी है, जहां लोग बचपन से ही प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि अब इस दिशा में और बड़े अध्ययनों की जरूरत है, ताकि यह समझा जा सके कि लगातार जहरीली हवा में रहने से समय के साथ हमारे दिमाग को कितना बड़ा नुकसान हो रहा है।
भारत में वायु गुणवत्ता से जुड़ी ताजा जानकारी आप डाउन टू अर्थ के एयर क्वालिटी ट्रैकर से प्राप्त कर सकते हैं।