वायु प्रदूषण अब सिर्फ इंसानों के स्वास्थ्य का ही नहीं, बल्कि प्रकृति के सामाजिक तंत्र का भी बड़ा दुश्मन बनता जा रहा है। एक नए अध्ययन में सामने आया है कि हवा में बढ़ता ओजोन चींटियों की पहचान प्रणाली को बिगाड़ सकता है। चींटियां अपने साथियों को पहचानने के लिए शरीर से निकलने वाली खास गंध पर निर्भर करती हैं, लेकिन प्रदूषण इस गंध को बदल देता है।
प्रयोगों में पाया गया कि ओजोन के संपर्क में आने के बाद, एक ही कॉलोनी की चींटियां अपने साथियों को पहचान नहीं पाईं और उन पर हमला करने लगीं। यहां तक कि वे अपने लार्वा की देखभाल भी ठीक से नहीं कर सकीं, जिससे उनकी मौत हो गई।
चींटियां पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बेहद अहम हैं, वे मिट्टी को उपजाऊ बनाती हैं, बीज फैलाती हैं और पर्यावरण को साफ रखने में मदद करती हैं। ऐसे में उनका सामाजिक ढांचा टूटना गंभीर संकेत है।
अब तक कीटों के संकट के लिए कीटनाशक, जलवायु परिवर्तन और आवास नष्ट होना जिम्मेदार माने जाते थे, लेकिन यह अध्ययन बताता है कि वायु प्रदूषण भी कीट समाजों को अंदर से तोड़ रहा है। यह एक अनदेखा खतरा है, जो पूरे पारिस्थितिकी संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
सोचिए, आप अपने घर लौटें…और आपका अपना परिवार आपको पहचानने से इनकार कर दे। आपको घुसपैठिया समझकर आप पर हमला कर दे। यह कोई कोरी कहानी नहीं, बल्कि हकीकत है, बस फर्क इतना है कि यह इंसानों के साथ नहीं, बल्कि चींटियों के साथ हो रहा है।
जर्मनी के मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर केमिकल इकोलॉजी के वैज्ञानिकों ने अपने एक नए अध्ययन में खुलासा किया है कि हवा में बढ़ता प्रदूषण, खासकर ओजोन, चींटियों के बीच के भरोसे को तोड़ रहा है। ऐसे में जो साथी एक साथ रहते, काम करते और एक-दूसरे की रक्षा करते थे, अब वही एक-दूसरे के दुश्मन बनते जा रहे हैं।
अध्ययन के मुताबिक हवा में बढ़ता ओजोन चींटियों की पहचान प्रणाली को बिगाड़ सकता है, जिससे वे अपने ही साथियों को दुश्मन समझकर उन पर हमला करने लगती हैं।
दरअसल चींटियों की दुनिया पूरी तरह ‘गंध’ पर टिकी होती है। हर चींटी की अपनी तरह की एक खास तरह की गंध होती है। इसी रासायनिक संकेत की मदद से वो अपनी कॉलोनी के दूसरे सदस्यों को पहचानती है। लेकिन इंसानी गतिविधियों से बढ़ता ओजोन इस गंध को बदल देता है।
इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने छह अलग-अलग प्रजातियों की चींटियों पर प्रयोग किए। इनमें से पांच प्रजातियों में यह देखा गया कि जब चींटियां ओजोन के संपर्क में आकर अपनी कॉलोनी में लौटीं, तो बाकी चींटियों ने उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया और उन पर हमला कर दिया।
पहचान का विज्ञान: कैसे काम करता है सिस्टम
चींटियां आमतौर पर अपने साथियों को पहचानने के लिए शरीर में बनने वाले खास “हाइड्रोकार्बन” के मिश्रण का इस्तेमाल करती हैं। इसमें ज्यादातर “अल्केन” होते हैं, जबकि “अल्कीन” कम मात्रा में होते हैं, लेकिन यही कॉलोनी की पहचान तय करते हैं।
ये ऐसे यौगिक हैं जिनमें कार्बन-कार्बन डबल बॉन्ड होता है और जो आसानी से ऑक्सीडेशन की वजह से टूट सकते हैं। हालांकि वैज्ञानिकों के मुताबिक ‘अल्कीन’ बहुत कम मात्रा में होते हैं, लेकिन कॉलोनी की खास पहचान वाली गंध के लिए बेहद जरूरी होते हैं।
चींटियां जन्म के तुरंत बाद अपनी कॉलोनी की गंध सीख लेती हैं। बाद में जब वे दूसरी चींटियों से मिलती हैं, तो उनकी गंध की तुलना अपनी कॉलोनी की जानी-पहचानी गंध से करती हैं। अगर गंध मेल खा जाए, तो वे उसे अपना साथी मानकर दोस्ताना व्यवहार करती हैं। लेकिन अगर गंध अलग लगे, तो वे उसे बाहरी समझकर अक्सर आक्रामक हो जाती हैं।
क्यों हो रहा है ऐसा?
शोधकर्ताओं ने पाया है कि शहरों में ओजोन का स्तर 30 से 200 भाग प्रति बिलियन (पीपीबी) तक पहुंच जाता है, जो सामान्य से कई गुणा अधिक है। जब चींटियों को महज 20 मिनट के लिए ऐसे प्रदूषित माहौल में रखा गया, तो उनकी पहचान वाले रासायनिक संकेत तेजी से बिखरने लगे।
इसका नतीजा बेहद खतरनाक था, एक ही कॉलोनी की चींटियां अपने साथियों को पहचान नहीं पाईं और उन पर हमला कर दिया।
इतना ही नहीं, प्रदूषण ने चींटियों के ‘परिवार’ को भी तोड़ दिया। एक अलग प्रयोग में पाया गया कि ओजोन के संपर्क में आने पर चींटियां अपने लार्वा (बच्चों) की सही देखभाल नहीं कर पाईं, जिससे उनकी मौत हो गई। यह चिंता की बात इसलिए भी है क्योंकि दुनिया में करीब 30,000 प्रजातियों की चींटियां हैं और उनका कुल वजन पक्षियों और स्तनधारियों के बराबर माना जाता है।
एक अध्ययन के मुताबिक दुनिया में करीब 20,000 लाख करोड़ चींटियां हैं। इनके कुल वजन की बात करें तो यह करीब 12 मेगाटन कार्बन के बराबर है। मतलब की धरती पर इन नन्हें जीवों का कुल वजन जंगली पक्षियों और स्तनधारियों के कुल वजन से भी ज्यादा है। वहीं यदि इंसानों से इनकी तुलना की जाए तो वो इंसानों के कुल बायोमास का करीब 20 फीसदी के बराबर बैठता है।
ये जीव मिट्टी को उपजाऊ बनाते हैं, बीज फैलाते हैं और पर्यावरण को साफ रखने में अहम भूमिका निभाते हैं।
अब तक कीटनाशकों, जलवायु परिवर्तन और आवास नष्ट होने को ही कीटों की घटती आबादी के लिए जिम्मेदार माना जाता था। लेकिन यह अध्ययन बताता है कि वायु प्रदूषण भी कीट समाजों को अंदर से तोड़ रहा है। यह एक ऐसा खतरा है, जिस पर अभी तक बहुत कम ध्यान दिया गया था।
रासायनिक संकेतों का खेल
पिछले शोधों में यह भी सामने आया है कि ओजोन का बढ़ता स्तर फ्रूट फ्लाईज के प्रजनन संकेतों को बदल देता हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ओजोन, कीटों के “सेक्स फेरोमोन’ में मौजूद कार्बन-कार्बन के डबल बॉन्ड को तोड़ देता है।
इसका नतीजा यह हुआ कि ओजोन के संपर्क में आने के बाद नर मक्खियां मादा और दूसरे नर में फर्क नहीं कर पाईं। इससे उनके प्रजनन का सामान्य व्यवहार पूरी तरह गड़बड़ा गया।
इतना ही नहीं, ओजोन ने अलग-अलग प्रजातियों के बीच मौजूद प्राकृतिक बाधा को भी कमजोर कर दिया। इसके चलते अलग प्रजातियों के बीच मेल-जोल बढ़ा और ऐसे संकर (हाइब्रिड) पैदा हुए जो आगे प्रजनन करने में सक्षम नहीं थे। यह संकेत है कि वायु प्रदूषण का असर केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति के जटिल जैविक और सामाजिक तंत्र को भी प्रभावित कर रहा है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि ओजोन जैसे प्रदूषक न सिर्फ फूलों और परागण करने वाले कीड़ों के बीच संबंध को बिगाड़ते हैं, बल्कि कीटों के आपसी “संचार” को भी नष्ट कर देते हैं।
इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज में प्रकाशित हुए हैं।